प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेखनसामग्री. १४५
थे तभी उनपर पुस्तक लिखे जाते थे. जैन लेखकों ने कागज़ की पुस्तकें लिखने में ताड़पत्र पर
लिखी हुई पुस्तकों का अनुकरण किया है, क्यों कि उनकी लिखी हुई पुरानी पुस्तकों में ताड़पत्रों की
पुस्तकों की नांई प्रत्येक पत्ते का मध्य का हिस्सा, जहां डोरी डाली जाती थी, बहुधा खाली छोड़ा
हुआ मिलता है जिसमें कहीं हिंगलू का वृत्त और चतुर्मुख वापी आदि के रंगीन या खाली चित्र
मिलते हैं. इतना ही नहीं, ई. स. की १४ वीं शताब्दी की लिखी हुई पुस्तकों१ में प्रत्येक पत्ते
और ऊपर नीचे की पाटियों तक में छेद किये हुए भी देखने में आये हैं यद्यपि उन छेदों की कोई
आवश्यकता न थी.
भारतवर्ष के जलवायु में कागज बहुत अधिक काल तक नहीं रह सकता. काग़ज पर लिखी
हुई पुस्तकों में, जो अब तक इस देश में मिली हैं, सब से पुरानी ई. स. १२२३-२४ की बतलाई जाती है२,
परंतु मध्य एशिया में यारकंद नगर से ६० मील दक्षिण 'कुगियर' स्थान से ज़मीन में गड़े हुए
भारतीय गुप्त लिपि के ४ पुस्तक मि. वेबर को मिले जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी३ के आस पास
के होने चाहिये. इसी तरह मध्य एशिया के काशगर आदि से जो जो पुराने संस्कृत पुस्तक४
मिले हैं वे भी उतने ही पुराने प्रतीत होते हैं.
रूई का कपड़ा.
रूई का कपड़ा जिसको 'पट' कहते हैं प्राचीन काल से लिखने के काम में कुछ कुछ आता
था और अब तक भी आता है. उसे भी कागजों की तरह पहिले आटे की पतली लेई लगा कर
सुखाते हैं, फिर शंख आदि से घोट कर चिकना बनाते हैं तब वह लिखने के काम में आता है.
जैनों के मंदिरों की प्रतिष्ठा के समय अथवा उत्सवों पर रंगीन चावल आदि अन्नों से जो भिन्न
भिन्न मंडल बनाये जाते हैं उनके पटों पर बने हुए रंगीन नक्शों का संग्रह जैन मंदिरों या उपासरों
में पुस्तकों के साथ जगह जगह मिलता है५. ब्राह्मणों के यहां 'सर्वतोभद्र,' 'लिंगतोभद्र' आदि
१. अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां हस्तलिखित प्राचीन जैन एवं अन्य पुस्तकों का बड़ा संग्रह है. उसमें
ज्योतिषसंबंधी पुस्तकों तथा विषयों के संग्रह का २६२ पत्रों का एक पुस्तक है जिसके पत्रांक प्राचीन और नवीन शैली दोनों
तरह से दिये हुए हैं. उसके प्रारंभ में दो पत्रों में उक्त संग्रह की पत्रांकसहित विषयसूची भी लगी हुई है जो वि. सं. १४२६
(ई. स. १३७२) में उक्त संग्रह के लेखक श्रीलोकहिताचार्य ने ही तैयार की थी. उक्त पुस्तक के प्रत्येक पत्रे के मध्य के खाली
छोड़े हुए हिस्से में बने हुए हिंगलू के वृत्त में सूराख बना हुआ है और ऊपर नीचे की पाटियों में भी. वहीं के २३५ पत्रों के
एक दूसरे पुस्तक में, जिसमें भिन्न भिन्न पुस्तकों का संग्रह है और जो १४ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत
होता है (संवत् नहीं दिया), इसी तरह सूराख बने हुए हैं.
२. गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, सिंध और खानदेश के खानगी पुस्तकसंग्रहों की सूचियां, बूलर संगृहीत, भाग १,
पृ. २३८; पुस्तकसंख्या १४७.
३. देखो, ऊपर पृ. २, टि. ४.
४. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१३-२६०. इन पुस्तकों में से जो मध्य एशिया की गुप्तकाल की लिपि में हैं वे तो
मध्य एशिया के ही लिखे हुए हैं, परंतु कितने एक जो भारतीय गुप्त लिपि के हैं (सेट ७, संख्या ३ के a, b, c, e, f टुकड़े;
संख्या ५-८, ११. सेट १३, १५, १६) उनका भारतवर्ष से ही वहां पहुंचना संभव है जैसे कि होर्युज़ी के मठ के ताड़पत्र के
और मि० बावर के भोजपत्र के पुस्तक यहीं से गये हुए हैं. बूलर आदि कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने यूरोप की नांई
भारतवर्ष में भी काग़ज़ों का प्रचार मुसलमानों ने किया ऐसा अनुमान कर मध्य एशिया से मिले हुए भारतीय गुप्त लिपि
के पुस्तकों में से एक का भी यहां से वहां पहुंचना संदेहरहित नहीं माना परंतु थोड़े समय पूर्व डॉ० सर् ऑरल स्टाइन
को चीनी तुर्कस्तान से चींथड़ों के बने हुए ई. स. की दूसरी शताब्दी के जो काग़ज़ मिले उनके आधार पर डा० बार्नेट ने
लिखा है कि 'यह संभव है कि मुगलों (? मुसलमानों) के आने से बहुत पहिले हिंदुस्तान में काग़ज़ का प्रचार होगा परंतु
उसका उपयोग कम होता था (बा; ऐं. ई; पृ. २२६-३०).
५. अजमेर के बीसपंथी आम्नाय के बड़े धड़े के दिगंबर जैन मंदिर में २० से अधिक पट रक्खे हुए हैं, जिनपर ढाई
द्वीप, तीन लोक, तेरह द्वीप, जंबू द्वीप आदि के विवरणसहित रंगीन चित्र हैं. उनमें से कितने एक पुराने और कुछ नये हैं.