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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 318 में से

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पृष्ठ 175

१४६ प्राचीनलिपिमाला.
मंडलों के पट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं
जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा
रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग
रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों
में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर
अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली
की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं
जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के
पुराने सैंकड़ों कड़िते शृंगेरी के मठ में मिले हैं, जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-
पत्तों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक
जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित,
१३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है१. कपड़े के पत्रे
बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.
लकड़ी का पाटा और पाटी.
भारतवर्ष में पत्थर की स्लेटों के प्रचार के पहिले प्राचीन काल से ही विद्यार्थी लोग पाटों पर
लिखना सीखते थे. ये पाटे लकड़ी के होते थे और चारों कोनों पर चार पाये उसी लकड़ी में से
निकाले हुए होते थे. पाटों पर मुलतानी मिट्टी या खड़िया पोत कर सुखा देते थे. फिर उनपर
ईंटों की सुरखी बिछा कर तीखे गोल मुख की लकड़ी की कलम से, जिसको राजपूताने में 'बरतना'
या 'बरथा' (वर्त्तक) कहते हैं, लिखते थे. अब पाटों के स्थान में स्लेटों का प्रचार हो गया है तो
भी कितने ही ग्रामीण पाठशालाओं के विद्यार्थी अब तक पाटों पर ही 'पहाड़े', 'हिसाब' आदि
लिखते हैं. ज्योतिषी लोग अब तक बहुधा जन्मपत्र और वर्षफल आदि का गणित ३ पाटों पर करने
के बाद कागजों पर उतारते हैं. बच्चों की जन्मकुंडलियां तथा विवाह के समय लग्नकुंडलियां
प्रथम पाटे पर गुलाल बिछा कर उसपर ही बनाई जाती हैं. फिर वे कागज़ पर लिखी जाकर
यजमानों को दी जाती हैं.
लकड़ी की बनी हुई पतली पाटी (फलक) पर भी प्राचीन काल में विद्यार्थी लिखते थे. बौद्धों
की जातक कथाओं में विद्यार्थियों के फलक का उल्लेख मिलता है ४. अब भी उसपर मुलतानी
मिट्टी या खड़िया पोतने बाद स्याही से लिखते हैं. अब तक राजपूताना आदि के बहुत से दुका-
नदार बिक्री या रोकड़ का हिसाब पहिले ऐसी पाटियों पर लिख लेते हैं, फिर अवकाश के समय
उसे बहियों में दर्ज करते हैं. विद्यार्थियों को सुंदर अक्षर लिखना सिखलाने के लिये ऐसी पाटियों
को बहुधा एक तरफ़ लाल और दूसरी ओर काली रंगवाते हैं. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाले से उन-
पर हरताल से वर्णमाला, बारहखड़ी (द्वादशाक्षरी) आदि लिखवा कर उनपर रोगन फिरा देते हैं
सब से छोटा १ फुट ५ १/२ इंच लंबा और उतना ही चौड़ा, और सबसे बड़ा १५ १/२ फुट लंबा और ५ फुट ७ १/२ इंच चौड़ा है.
कितने ही अन्य स्थानों में भी ऐसे अनेक पट देखने में आये हैं.
१. माइसोर राज्य की आर्किआलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट, ई. स. १६१६, पृ. १८.
२. पी. पीटर्सन की बंबई इहाते के संस्कृत पुस्तकों की खोज की पांचवीं रिपोर्ट, पृ. ११३.
३. इस प्रकार गणित करने की चाल को ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में 'धूलीकर्म' कहा है.
४. देखो, ऊपर पृ. ३, और उसी पृष्ठ का टिप्पण २.