प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३५
उ-दू. ६; ती. में नीचे के अंत को अधिक मोड़ा है; चौ. १८.
ए-दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. १६ (महानामन् का लेख); चौ. १७ (करंडांडा
का लेख); पां. २५ (कूर्भशतक).
क-दू. कुशनवंशियों के लेखों से; ती. ८; चौ. १६; पां. २३.
ख-प. २ (खालसी); दू. ६; ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २६ (जाजल्लदेव का लेख).
ग-दू. और ती. ६; चौ. १६.
घ-दू. ८; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. २५ (उदेपुर का लेख); पां. २५ (उज्जैन
का लेख).
ङ-प. बुद्धगया के स्तंभ से; दू. १८ ('ङ्ग्शो' में); ती. २५ (उज्जैन का लेख).
च-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख)
छ-दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. तीसरे से बना.
ज-दू. ७; ती. २१ (झालरापाटन का लेख); चौ. २५ (उज्जैन का लेख.)
झ-'झ' का यह रूप जैन शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र
का लेख); ती. २१ (कोटा का लेख).
झ-'झ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है. इसके पहिले तीन रूप
पूर्व के 'झ' के समान हैं. चौ. २६ (हस्तलिखित पुस्तकों से); पां. चौथे से बना.
ञ-दू. ८; ती. १६ ('ञ्ज' में) ट-दू. १६; ती. २१ (झालरापाटन का लेख).
ठ-प. २ (अशोक का देहली का लेख); दू. ती. २५ (उज्जैन का लेख).
ड-'ड' का यह रूप जैन शैली की नागरी में प्रचलित है. दू. ८; ती. १६; चौ. १८; पां.
चौथे से बना; छ. २७ (सूंधा के लेख की पंक्ति के अंत में).
ड-पहिले तीन रूप पूर्व के 'ड' के समान; चौ. २७.
ढ-नागरी लिपि की वर्णमाला में केवल यही अक्षर ऐसा है जो अपने मूल रूप में बना
रहा है. केवल सिर की आड़ी लकीर बढ़ी है.
ण-दू. ६; ती. दूसरे से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में 'ण' का चौथा रूप); चौ. १८; पां.
१६ (उष्णीषविजयधारणी).
ण-'ण' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है और नागरी के 'ण' के 'ए'
जैसे अंश को चलती क़लम से मिलवां लिखने से बना है.
त-दू. पहिले का रूपांतर (देखो, लिपिपत्र ४); ती. २७.
थ-दू. ती. १८; चौ. २५ (उज्जैन का लेख).
द-दू. ५ ('पभोसा का लेख); ती. ५ (शोडास का मथुरा का लेख); चौ. ६; पां. १८;
छ. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
ध-दू. २०; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. २७ (ओरिशा का लेख).
न-दू. ६; ती. २०. प-दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६.
फ-दू. १८; ती. १७ (पाली का दानपत्र); चौ. सीयदॊनी के लेख से.
ब-दू. २०; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. १६; पां. चौलुक्य भीमदेव के दानपत्र से.
'व' और 'ब' में भेद न रहने से 'ब' को स्पष्ट बतलाने के लिये 'व' के भीतर बिंदी लगाई जाने
लगी जो पीछे से कुछ तिरछी लकीर के रूप में परिणत हो गई.