प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ प्राचीनलिपिमाला.
के ढकनों पर खुदे हुए मिलते हैं. पत्थर पर खुदे हुए लेखों को 'शिलालेख,' और जिनमें
राजाओं आदि का प्रशंसायुक्त वर्णन होता है उनको 'प्रशस्ति' कहते हैं. जिस आधार पर लेख
खुदवाना होता वह यदि समान और चिकना न हो तो पहिले टांकियों से छील कर उसे समान बनाते
फिर पत्थर आदि से घोटकर वह चिकना बनाया जाता था १. जिस आशय का लेख लिखना होता
उसकी रचना कोई कवि, विद्वान्, राजकीय अधिकारी २ या अन्य पुरुष करता. फिर सुंदर अक्षर
लिखनेवाला लेखक ३ एक एक अथवा दो दो पंक्तियां स्याही से पत्थर पर लिखता और उनको कारी-
गर (सूत्रधार) खोदता जाता था. इस प्रकार क्रमशः सारा पत्थर खोदा जाता ४. इस प्रकार
से तैयार किये जाते हुए शिलालेख मैंने स्वयं देखे हैं. लिखने के पूर्व पंक्तियां सीधी लाने के लिये यदि
पत्थर अधिक लंबा होता तो सूत की पतली डोरी को गेरू में भिगो कर उससे पंक्तियों के
निशान बनाते, जैसे कि लकड़ी के लट्ठे को चीर कर तख्ते निकालनेवाले खाती लोग लट्ठे पर बनाते .
हैं, और पत्थर कम लंबाई का होता तो गज़ या लकड़ी की पट्टी रख कर उसके सहारे टांकी आदि
से लकीर का निशान बना लेते. मंदिर, बावडी आदि की भींतों में लगाये जानेवाले लेख पत्थर
की छोटी बड़ी पट्टियों (शिलाओं) पर खुदवाये जाकर बहुधा ताकों में, जो पहिले बना लिये जाते
थे, लगाये जाते थे. ऐसे लेखों के चारों ओर पुस्तकों के पत्रों की नांई हाशिआ छोड़ा जाता था.
कभी कभी खोदे जानेवाले स्थान के चारों ओर लकीरें ५ खुदी हुईं मिलती हैं. कभी वह स्थान
पाव इंच से एक इंच या उससे भी अधिक खोद कर हाशिये से नीचा ६ किया हुआ मिलता है.
अधिक सावधानी से खुदवाये हुए लेखों में कभी पत्थर की चटक उड़ गई तो उसमें पत्थर के रंग की
मिश्रधातु भर कर उस स्थान को समान बनाते थे और यदि अक्षर का कोई अंश चटक के साथ
उड़ जाता तो उसको पीछा उस धातु पर खोद लेते थे ७. बहुधा शिलालेखों के प्रारंभ में
और कभी अंत में कोई मंगल सूचक सांकेतिक चिह्न ८, शब्द ९ या किसी देवता के प्रणामसूचक
१. यह हाल सावधानी के साथ तय्यार किये हुए लेखों का है. कई लेख खरदरे पत्थरों पर बेपरवाही के साथ खोदे
हुए भी मिलते हैं.
२. जिन शिलालेखों में राजा की तरफ़ की किसी आज्ञा आदि का उल्लेख होता उन्हें राजकर्मचारी ही तय्यार करते थे.
३. लेखक बहुधा ब्राह्मण, कायस्थ, जैन साधु या सूत्रधार (सिलावट) लोग होते थे.
४. हिंदुओं के शिलालेखों के अक्षर पत्थर के भीतर खांदे जाते हैं परंतु मुसल्मानों के अरबी या फ़ारसी के लेखों के अक्षर
उभडे हुए होते हैं और पत्थर का वह अंश जहां पर अक्षर नहीं होता टांकियों से तोड़कर उड़ा दिया जाता है. कोई कोई हिंदू मुसल्-
मानों का अनुकरण कर उभड़े हुए अक्षरवाले लेख भी बनाने लग गये परंतु ऐसे लेख बहुत ही कम मिलते हैं. अब तक ऐसे केवल दो
ही लेख मेरे देखने में आये हैं. एक तो मथुरा के म्यूज़िअम में और दूसरा बाड़ी(धौलपुर राज्य में) में. ये दोनों मुसल्मानों के समय के हैं.
५. अशोक के गिरनार के लेख की १४ धर्माज्ञाओं में से प्रत्येक के चारों ओर लकीरें खुदी हुई हैं. वि. सं. १३७३
(ई. स. १३१६) के लाडनू (जोधपुर राज्य में) से मिले हुए लेख (जो राजपूताना म्यूज़िअम, अजमेर, में रक्खा हुआ है)
के चारों ओर लकीरें हैं (पें. इं; जि. १२, पृ. २४ के पास का प्लेट)
६. वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ (ई. स. १०४२) के लेख का, जो
राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खा हुआ है, खुदा हुआ अंश हाशिये से करीब पाव इंच नीचा है और वहीं रक्खे हुए अर्थूणा (बांसवाड़ा
राज्य में) के दो शिलालेखों का खुदा हुआ अंश प्रायः एक इंच नीचा है. उनमें से एक (खंडित) परमार राजा चामुंडराज के समय
का वि. सं. ११५७ (ई. स. ११०१) का और दूसरा परमार राजा विजयराज के समय का वि. सं. ११६६ (ई. स. १११०) का है.
७. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) रचित 'हरकेलिनाटक',
की तथा सोमेश्वर पंडितरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो दो शिलाएं रक्खी हुई हैं. इन चारों शिलाओं में कई जगह
धातु भरी हुई है और कहीं उसपर अक्षर का अंश भी खुदा हुआ है.
८. चिह्नों में स्वस्तिक (आ. स. स. ई; जि. १, प्लेट ६६; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ५, ६, ७, ८, ११,
१३, १४ आदि), चक्र (धर्मचक्र) पर रहा हुआ त्रिशूल (त्रिरत्न; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ८, १०, १५ आदि),
'ओं' का सांकेतिक चिह्न (देखो, लिपिपत्र १६, २१, २३ आदि के साथ दी हुई मूल पंक्तियों के आरंभ में) तथा कई अन्य
चिह्न मिलते हैं जिनका आशय ठीक ठीक ज्ञात नहीं हुआ (आ. स. वे. इं; जि ४, सेट ४४, भाजा का लेख ७; प्लेट ४५, कूडा
के लेख १, ६, १६; सेट ४६, कुड (के लेख २०, २२, २७, २६).
९. शब्दों में 'सिद्धम्' (पें. इं; जि. १२, पृ. ३२० के पास का सेट. लिपिपत्र ७, ८, ११, १२, १५ आदि के साथ दी हुई