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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 318 में से

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पृष्ठ 170

नागरी अंकों की उत्पत्ति. १३१
तामिळ लिपि की उत्पत्ति.
तामिळ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं; इस लिये उनको छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन किया
जायगा.
अ—चौ. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख); पां. ६० (कूरम् का दानपत्र).
इ—दू. ६; ती. १२ (जग्गय्यपेट के लेख); चौ. ६० (कूरम् का दानपत्र; दूसरे की तीनों वक्र
रेखाओं को चलती कलम से मिला कर लिखने से).
ई—प. ६२; दू. पहिले से बना. उ—ग्रंथ लिपि के समान.
ए—ती. १४; चौ. ६० (कशाकूडि का दानपत्र).
ऐ—दू. ३ (हाथीगुंफा का लेख); ती. ४५ ('ए' के साथ 'ऐ' की मात्रा जोड़ने से, लिपि-
पत्र ३८ के 'ऐ' की नांई).
ओ—ती. ६० (उदयेदिरम् का दानपत्र); चौ. ६२ (तिरुमलै के चट्टान का लेख).
क—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (वेल्लोर का लेख); चौ. ६२ (जंबुकेश्वर का लेख).
ङ—दू. पहिले से बना; ती. दूसरे से बना; चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
च—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
ञ—ती. ३८ (सिंहादित्य के दानपत्र के 'झा' में); चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
ट—दू. ६० (उदयेदिरम् का दानपत्र). ण—ग्रंथ लिपि के समान. त—ग्रंथ लिपि के समान.
न—चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र). प—दू. ७.
म—दू. ६; ती. ५८ (देवेंद्रवर्मन् का दानपत्र); चौ. तीसरे से बना.
य—ग्रंथ लिपि के समान. र—चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख).
ल—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख).
व—ग्रंथ लिपि के समान.
२३—वर्तमान नागरी अंकों की उत्पत्ति.
(लिपिपत्र ८४ के उत्तराई का द्वितीय खंड).
जैसे वर्तमान नागरी लिपि ब्राह्मी लिपि में परिवर्तन होते होते बनी है वैसे ही वर्तमान नागरी
के अंक भी प्राचीन ब्राह्मी के अंकों के परिवर्तन से बने हैं.
१—प. ७१ (नानाघाट का लेख); दू. ७१ (गुप्तों के लेख); ती. चौ. ७२ (बौद्ध पुस्तक);
पां. ७५ (प्रतिहार भोजदेव का दूसरा लेख).
२—प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ७१ (गुप्तों के लेख); ती. ७२ (मि. बावर के
पुस्तक).
३—प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ती. ७१ (गुप्तों के लेख); चौ. ७२ (मि. बावर
के पुस्तक; तीनों वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से).
४—प. ७१ (अशोक के लेख); दू. ७१ (नानाघाट का लेख); ती. ७१ (कुशनवंशियों के
लेख); चौ. ७१ (गुप्तों के लेख).