प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३६
ज—दू. ७; ती. ४४ ( 'ज्ञा' में ) ; चौ. ४८ ( 'ज्ञा' में ).
ट—दू. ४५ ( बादामी का लेख ); ती. दूसरे से बना; चौ. ४८; पां. ५१ (दोनेपुंडी का दानपत्र ).
ठ—दू. ५१. ड—प. २ ( खालसी ); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५०.
ढ—दू. ती. ४७; चौ. ५०. ण—दू. १२; ती. ४५; चौ. ४८; पां. ४६.
त—दू. ६; ती. ४७; चौ. ४८. थ—दू. ४४ ( काकुस्थवर्मन् का दानपत्र ); ती. ४७.
द—प. २ ( जौगड़ ) ; दू. ७; ती. ४३ ( पिकिर का दानपत्र ); चौ. ४८; पां. ५०.
ध—दू. ६ ( गौतमीपुत्र शातकर्णी के लेख ) ; ती. १३ ; चौ. ४६; पां. ५०.
न—दू. ४३ ( उरुवुपल्लि का दानपत्र ) ; ती. ४५ ( चेंडलूर का दानपत्र ) ; चौ. ५०.
प—दू. ६ ( वासिष्ठीपुत्र के लेख) ; ती ४५ ; चौ. ५० ; पां. ५१ ( राजा गणदेव का दानपत्र ).
फ—दू. ८; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ५०.
ब—दू. ४३ ( विष्णुगोपवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४३ ( सिंहवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४७.
भ—दू. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; ती. ४८; चौ. ४६; पां. ५०.
म—दू. ६; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ); चौ. ४६; पां. ५०.
य—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४५; पां. ४८. र—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ४८.
ल—दू. ८; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४८. व—दू. ६; ती. १३; चौ ४६; पां. ५०.
श—प. २ ( खालसी ) ; दू. ७; ती. ४४ ( मृगेशवर्मन् का दानपत्र ) ; चौ ४५; पां. ५०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के 'र्षं' में ) ; दू. ४४; ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१.
स—दू. ४७; ती. ४८. ह—दू. ७; ती. ४३; चौ. ५०; पां. ५१.
ळ—प. ७; दू. ४७; ती. ५०; चौ. ५१ ( वनपल्ली का दानपत्र ).
वर्तमान कनड़ी लिपि का 'उ' प्राचीन 'उ' से नहीं बना किंतु 'अ' के साथ 'उ' की मात्रा जोड़ने
से बना है. उसी 'उ' से 'ऊ' बना है. 'ऋ' का कोई प्राचीन रूप नहीं मिलता. संभव है कि उष्णी-
षविजयधारणी के अंत की वर्णमाला के 'ऋ' जैसे ही अक्षर में विकार हो कर वह बना हो. 'ऐ' और
'औ' उनके प्राचीन रूपों से ही बने हैं. 'ऐ' लिपिपत्र ३८ के 'ऐ' से, और 'औ' लिपिपत्र ४३ और
५० में मिलनेवाले 'औ' से बना है १.
लिपिपत्र ८४ वां.
इस लिपिपत्र में ग्रंथ और तामिळ लिपियों की उत्पत्ति दी गई है.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो कनड़ी
लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं, इस लिये ऐसे रूपों को छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन
किया जायगा.
अ—ती. ५२ ( मामल्लपुरम् के लेख ); चौ. ५४ ( उदयेंदिरम् का दानपत्र ) ; पां. ५६.
इ—पां. ५३ ( नंदिवर्मन् का दानपत्र ).
१. वर्तमान तेलुगु लिपि कनड़ी से बहुत मिलती हुई है. जिन अक्षरों में विशेष अंतर है वे उ, ऋ, क, त, श और
ह हैं. इनमें से 'उ' उसके प्राचीन रूप से बना है (विकासक्रम के लिये देखो, क्रमशः लिपिपत्र ४४, ४७ और ५० में मिलने
वाले उक्त अक्षर के रूप). 'क' कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षर के पांचवें रूप की आड़ी लकीर और नीचे के वृत्त
को चलती कलम से कुछ अंतर के साथ लिखने से बना है. 'त' के बाईं ओर के अंत में ग्रंथि और लगा दी है. 'श' और
'ह' भी कनड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षरों के उपांत्य रूपों के विकार मात्र हैं.