प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३३
५६ तक में दी हुई प्राचीन ग्रंथ लिपि से निकली है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसी लिपि में छपने लग
गये थे परंतु अब बहुधा नागरी में छपने लगे हैं.
लिपिपत्र ८१ वां.
इस लिपिपत्र में मलयाळम्, तुळु और तामिळ लिपियां दी गई हैं.
मलयाळम् लिपि—मलयाळम् अर्थात् केरल देश की लिपि होने से इसको मलयाळम् या केरल
लिपि कहते हैं. यह लिपि ग्रंथ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर घसीट रूप में
भी ग्रंथ लिपि से मिलते हुए हैं. इसका प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के दक्षिणी विभाग, सारे
मलबार और कोचीन एवं त्रावनकोर राज्य के अधिकतर हिस्से (त्रिचेंद्रम् से उत्तर के) में है.
तामिळ भाषा बोलनेवाले बहुधा संस्कृत पुस्तक लिखने में ग्रंथ लिपि की नांई इसका प्रयोग
करते हैं.
तुळु लिपि—ग्रंथ लिपि से निकली हुई मलयाळम् लिपि का ही यह किंचित् परिवर्तित रूप है.
इस लिपि का प्रचार दक्षिणी कन्नड़ा प्रदेश के तुळु भाषाभाषी लोगों में संस्कृत ग्रंथ लिखने में ही है.
तामिळ लिपि—यह लिपि लिपिपत्र ६०-६२ में दी हुई प्राचीन तामिळ लिपि से बनी है.
'तामिळ' शब्द की उत्पत्ति देश और जातिसूचक 'द्रमिळ' (द्रविड़) शब्द से हुई है. तामिळ
भाषा आर्य लोगों की संस्कृत भाषा से बिलकुल भिन्न है तो भी उसके अक्षर आर्य लिपियों से ही
लिये गये हैं (देखो, ऊपर पृ. ४४, ६५). इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ होने से संस्कृत भाषा इस
में लिखी नहीं जा सकती इसलिये संस्कृत शब्दों का जहां प्रयोग होता है वहां वे ग्रंथ लिपि में लिखे
जाते हैं. इसमें 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. ६१).
इसका प्रचार मद्रास इहाते के, मद्रास से कुछ ऊपर तक के, दक्षिणपूर्वी हिस्से अर्थात् उत्तरी आर्काट,
चिंग्लेपट, दक्षिणी आर्काट, सलेम्, कोईम्बाटोर, त्रिचिनापोली, तंजौर, मदुरा और तिन्नैवल्लि जिलों एवं
त्रावनकोर राज्य के दक्षिणी अंश (त्रिचेंद्रम् से नीचे नीचे) और पदुक्कोटा राज्य में है.
२२-भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति.
(लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक).
भारतवर्ष की नागरी, शारदा, बंगला, तेलुगु, कन्नड़ी, ग्रंथ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान
(उर्दू को छोड़ कर) लिपियों का मूल 'ब्राह्मी' लिपि है, परंतु ये लिपियां अपनी मूल लिपि से इतनी
भिन्न हो गई हैं कि जिनको प्राचीन लिपियों से परिचय नहीं है वे सहसा यह स्वीकार भी न करेंगे
कि ये सब लिपियां एक ही मूल लिपि से निकली हैं. लेखनप्रवाह सदा एक ही स्रोत में नहीं
बहता किंतु लेखकों की लेखनरुचि के अनुसार समय के साथ भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण करता रहता
है; इसीसे सब देशों की प्राचीन लिपियां पलटती रही हैं. हमारे यहां की भिन्न भिन्न लिपियां एक
ही मूल स्रोत की शाखा प्रशाखाएं हैं जिनके विकास के मुख्य कारण ये हैं—
(अ) अक्षरों को भिन्न भिन्न प्रकार से सुंदर बनाने का यत्न करना.