प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंबंगला लिपि—बंग ( बंगाल ) देश की लिपि होने के कारण इसको बंगला कहते हैं. प्राचीन
बंगला लिपि प्राचीन पूर्वी नागरी से निकली है (देखो, ऊपर पृ. ४३) और उसीमें परिवर्तन होते होते
वर्तमान बंगला लिपि बनी. इस लिपि में नागरी के समान अक्षर पूर्ण हैं और इसका साहित्य भारतवर्ष
की सब भाषाओं के साहित्य से बढ़ा हुआ है जिसका कारण यही है कि भारतवर्ष में सर्कार अंग्रेज़ी
का राज्य सब से पहिले बंगाल में हुआ जिससे विद्या का सूर्य वहां सबसे पहिले फिर उदय हुआ.
यह लिपि सारे बंगाल और आसाम में प्रचलित है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसमें छपने लग
गये थे परंतु अब वे बहुधा नागरी में ही छपते हैं. बंगभाषा के पुस्तक आदि ही इसमें छपते हैं.
मैथिल लिपि—मिथिला (तिरहुत) देश के ब्राह्मणों की लिपि, जिसमें संस्कृत ग्रंथ लिखे जाते हैं,
'मैथिल' कहलाती है. यह लिपि वस्तुतः बंगला का किंचित् परिवर्तित रूप ही है और इसका
बंगला के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि कैथी का नागरी से है. मिथिला प्रदेश के अन्य लोग
नागरी या कैथी लिखते हैं.
लिपिपत्र ७६ वां.
इस लिपिपत्र में उड़िया, गुजराती और मोडी ( मराठी ) लिपियां दी गई हैं.
उड़िया लिपि—उड्र ( उड़िया वा उड़ीसा ) देश की प्रचलित लिपि को उक्त देश के नाम
पर से उड़िया कहते हैं. यह लिपि पुरानी बंगला से निकली हो ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि
इसके अधिकतर अक्षर हन्नाकोल के लेख के अक्षरों से मिलते हुए हैं और ए, ऐ, ओ
और औ तो वर्तमान बंगला ही हैं. इस लिपि के अक्षर सरसरी तौर से देखनेवालों को विलक्षण
मालूम देंगे परंतु इस विलक्षणता का मुख्य कारण कुछ तो अक्षरों को चलनी कलम से लिखना
और कुछ उनके गोलाईदार लंबे सिर ही हैं जिनका दाहिनी ओर का अंश नीचे को झुका हुआ
रहता है. ये सिर भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पंडिघी और कामरूप के वैद्यदेव के दान-
पत्रों में मिलनेवाले ८ ऐसे सिरों ( देखो, लिपिपत्र ३३ ) के परिवर्द्धित रूप या विकास मात्र हैं. इन
सिरों को हटा कर देखा जावे तो मूल अक्षर बहुत ही सरल हैं. इस लिपि में स्वरों की मात्राओं के
चिह्न भी बंगला शैली के ही हैं.
गुजराती लिपि—गुजरात देश में प्रचलित होने के कारण इसको गुजराती कहते हैं. सारे
गुजरात, काठियावाड़ और कच्छ में इसका प्रचार है. काठियावाड़ के हालार विभाग के बहुत से
लोगों की भाषा कच्छी से मिलती हुई हालारी है और कच्छवालों की कच्छी है परंतु उन लोगों की
लिपि गुजराती ही है. यह लिपि भी कैथी की नांई नागरी का किंचित् विकृत रूप ही है. अ, इ,
ख, च, ज, झ, फ और ब ये आठ अक्षर त्वरा से लिखे जाने के कारण नागरी से अब भिन्न बन गये हैं.
उनमें से 'ख' तो 'ष' से बना है और 'इ' तथा 'झ' जैन शैली की नागरी से लिये हैं. इन आठों
अक्षरों का विकासक्रम नीचे बतलाये अनुसार है—
अ= अ अ अ અ. इ= इ इ ई ઈ. ख= ष ष ख ખ. च= च च च ચ.
ज= ज ज ज જ. झ= झ झ झ ઝ. फ= फ फ् फ્ ફ. ब= ब व ब બ.
गुजराती लिपि के अक्षर पहिले सिर की लकीर खींच कर लिखे जाते थे और व्यौपारी लोग
अब तक अपनी बहियों तथा पत्रों में वैसे ही लिखते हैं, परंतु टाइप बनानेवालों ने सरलता के लिये
सिरों के चिह्न मिटा दिये तब से वे बिना लकीर भी लिखे जाते हैं.
मोडी लिपि—इसकी उत्पत्ति के विषय में पूना की तरफ के कोई कोई ब्राह्मण ऐसां प्रसिद्ध
करते हैं कि हेमाडपंत अर्थात् प्रसिद्ध हेमाद्रि पंडित ने इसको लंका से लाकर महाराष्ट्र देश में प्रब-
लित किया, परंतु इस कथन में कुछ भी सत्यता नहीं पाई जाती क्योंकि प्रसिद्ध शिवाजी के पहिले