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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 318 में से

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पृष्ठ 172

तीखे गोल मुख की शलाका को उनपर दबा कर अक्षर कुरेदते थे. फिर पत्रों पर कज्जल फिरा
देने से अक्षर काले बन जाते थे. कम लंबाई के पत्रों के मध्य में एक, और अधिक लंबाईवालों के
मध्य से कुछ अंतर पर दाहिनी और बांई ओर एक एक, छिद्र किया जाता था. पुस्तकों के नीचे
और ऊपर उसी अंदाज़ के सूराखवाली लकड़ी की पाटियां रहती थीं. इन सूराखों में डोरी डाली
जाने से एक माप की एक या अधिक पुस्तकें एकत्र बंध सकती थीं. पढ़ने के समय डोरी को
ढीला करने से प्रत्येक पन्ना दोनों ओर से आसानी के साथ उलटाया तथा पढ़ा जा सकता था. सुंदर सस्ते
कागज़ों के प्रचार के साथ ताड़पत्रों का प्रचार कम होता गया और अब तो बंगाल में कोई कोई 'दुर्गा-
पाठ' लिखने में ही उन्हें काम में लेते हैं. भारत के सब से दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी हिस्सों की
प्रारंभिक पाठशालाओं में विद्यार्थियों के लिखने में या रामेश्वर, जगदीश आदि के मंदिरों में जमा
कराये हुए रुपयों की रसीदें देने आदि में ताड़पत्र अब भी काम में आते हैं. दक्षिण की अधिक
उष्ण हवा में ताड़पत्र के पुस्तक उतने अधिक समय तक रह नहीं सकते जितने कि नेपाल आदि
शीत देशों में रह सकते हैं.
अब तक मिले हुए स्याही से लिखे ताड़पत्र के पुस्तकों में सब से पुराना एक नाटक का
कुछ त्रुटित अंश है जो ई. स. की दूसरी शताब्दी के आस पास का है १. मि. मॅकार्टने के काशगर से भेजे
हुए ताड़पत्रों के टुकड़े ई. स. की चौथी शताब्दी के हैं २. जापान के होरियूज़ि के मठ में रक्खे हुए
'प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र' तथा 'उष्णीषविजयधारणी' नामक बौद्ध पुस्तक ३, जो मध्य भारत से वहां पहुंचे
थे, ई. स. की ६ठी शताब्दी के आस पास के लिखे हुए हैं. नेपाल के ताड़पत्र के पुस्तक्संग्रह
में ई. स. की ७वीं शताब्दी का लिखा हुआ 'स्कंदपुराण' ४, कैंब्रिज के संग्रह में हर्ष संवत् २५२
(ई. स. ८५६) का लिखा हुआ 'परमेश्वरतंत्र' ५ और नेपाल के संग्रह में नेवार सं. २८ (ई. स.
६०६-७) ६ का लिखा हुआ 'लंकावतार' नामक पुस्तक हैं. ई. स. की ११ वीं शताब्दी और उसके पीछे के
तो अनेक ताड़पत्र के पुस्तक गुजरात, राजपूताना, नेपाल आदि के एवं यूरोप के कई पुस्तक्संग्रहों
में रक्खे हुए हैं. दक्षिणी शैली के अर्थात् लोहे की तीक्ष्ण अग्रभागवाली शलाका से दबा कर
बनाये हुए अक्षरवाले पुस्तक ई. स. की १५ वीं शताब्दी से पहिले के अब तक नहीं मिले जिसका
कारण दक्षिण की उष्ण हवा से उनका शीघ्र नष्ट होना ही है.
भूर्जपत्र (भोजपत्र).
भूर्जपत्र (भोजपत्र) — 'भूर्ज' नामक वृक्ष की, जो हिमालय प्रदेश में बहुतायत से होता है,
भीतरी छाल है. सुलभता तथा नाममात्र के मूल्य से बहुत मिलने के कारण प्राचीन काल में
वह पुस्तक, पत्र आदि के लिखने के काम में बहुत आता था. अलबेरूनी लिखता है कि 'मध्य
और उत्तरी भारत के लोग 'तूज़' (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं. उसको 'भूर्ज' कहते
हैं. वे उसके प्रायः एक गज़ लंबे और एक बालिश्त चौड़े पत्रे लेते हैं और उनको भिन्न भिन्न
प्रकार से तय्यार करते हैं. उनको मज़बूत और चिकना बनाने के लिये वे उनपर तेल लगाते हैं
और [घोट कर] चिकना करते हैं, फिर उनपर लिखते हैं*.' भूर्जपत्र लंबे चौड़े निकल आते हैं
जिनको काट कर लेखक अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पत्रे बनाते और
१. देखो, ऊपर पृ. २, टिप्पण २. २. ज. प. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१८; प्लेट ७, संख्या १, टुकड़े ६ (a से i तक).
३. ऐं. ऑ. (आर्यन सीरीज); प्लेट १-४.
४. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२, और अंत का प्लेट. ५. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२.
६. ह; कँ. पा; पृ. १४०. * सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७१.

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