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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 318 में से

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पृष्ठ 163

१३४ प्राचीनलिपिमला.
(आ) अक्षरों पर सिर की आड़ी लकीर लगाना.
(इ) कलम को उठाये बिना अक्षर को पूरा लिखना.
(ई) त्वरा से लिखना.
लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक में भारतवर्ष की ६ मुख्य लिपियों का
विकासक्रम बतलाया गया है जिसमें प्रत्येक अक्षर के जो रूपांतर दिये हैं उनमें से अधिकतर
लिपिपत्र १ से ६४ तक से ही लिये गये हैं.
लिपिपत्र ८२ वां.
इस लिपिपत्र में वर्तमान नागरी और शारदा (कश्मीरी) लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
नागरी लिपि की उत्पत्ति.
नागरी आदि जितनी लिपियों की उत्पत्ति लिपिपत्र ८२ से ८४ में दी है उनमें पहिले
वर्तमान लिपि का प्रत्येक अक्षर दे कर उसके बाद = चिह्न दिया है. उसके पीछे अशोक के समय से
लगा कर वर्तमान रूप बनने तक के सब रूपांतर दिये हैं. प्रत्येक रूप अनेक लेखादि में मिलता है
और प्रत्येक लेखादि का पता देने से विस्तार बहुत बढ़ जाता है अतएव केवल एक स्थल का पता
दिया जायगा.
अ—इसका पहिला रूप अशोक के गिरनार के पास के चट्टान के लेख (लिपिपत्र १) से लिया
गया है (बहुधा प्रत्येक लिपि के प्रत्येक अक्षर का पहिला रूप उसी लेख से लिया गया है इस लिये आगे
पहिले रूप का विवेचन केवल वहीं किया जायगा जहां वह रूप किसी दूसरे स्थल से लिया गया है).
दूसरा रूप मथुरा के लेखों (लिपिपत्र ६) से लिया है जिसमें 'अ' की बाईं ओर के नीचे के
अंश में दो बार कोण बनाये हैं. तीसरा रूप कोटा के लेख (लिपि पत्र २१) से है जिसमें 'अ' की
बाईं ओर के नीचे के अंश को अर्द्धवृत्त का सा रूप देकर मूल अक्षर से उसे विलग कर दिया है.
चौथा रूप देवल के लेख (लिपिपत्र २५) से और पांचवां चीरवा के लेख (लिपिपत्र २७) से लिया
गया है. छठा रूप वर्तमान नागरी है. (लिपिपत्र ८२ से ८४ तक में प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति
में अंतिम रूप वर्तमान अक्षर ही है इसलिये उसका भी आगे विवेचन न किया जायगा).
इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति का विवेचन करने से विस्तार बढ़ जाता है इस लिये
आगे 'पहिला रूप', 'दूसरा रूप' आदि के लिये केवल उनकी संख्या के पहिले अक्षर 'प', 'दू'
आदि लिखे जायंगे और उनके आगे जिस लिपिपत्र या लेख से वह रूप लिया है उसका अंक
या नाम मात्र दिया जायगा और जहां बहुत ही आवश्यकता होगी वहीं विवेचन किया जायगा.
प्रत्येक रूप में क्या अंतर पड़ा यह उक्त रूपों को परस्पर मिला कर देखने से पाठकों को मालूम
हो जायगा.
अ—'अ' का यह रूप दक्षिण में लिखा जाता है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के 'अ'
के समान हैं; चौ. १८ (इसमें बाईं ओर का नीचे का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल गया
है); पां. चौथे का रूपांतर ही है.
इ—दू. १७ (जयनाथ का दानपत्र—इसमें ऊपर की बिंदी के स्थान में सिर की आड़ी
लकीर, और नीचे की दोनों बिंदियों को भीतर से खाली बनाया है); ती. २६; चौ. २७; पां. चौथे
के समान.