प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ प्राचीनलिपिमाला.
५-प. दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. दूसरे से बना (बाईं ओर की खड़ी लकीर
को चलती कलम से दाहिनी ओर बनाने से).
६-प. ७१ (अशोक के लेख); दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख).
७-प. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); दू. ७१ (क्षत्रपों के सिक्के); ती. ७१ (वलभी के
राजाओं के दानपत्र).
८-प. दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. ७१ (क्षत्रपों के सिक्के); चौ. ७१ (कुशन-
वंशियों के लेख); पां. ७१ (गुप्तों के लेख).
९-प. ७१ (नानाघाट का लेख); दू. ७१ (कुशनवंशियों के लेख); ती. ७१ (आंध्रों
के नासिक के लेख); चौ. ७५ (राष्ट्रकूट दंतिवर्मन् का दानपत्र); पां. चौथे के ऊपर की ग्रंथि को
उलटा लिखने से; छ. ७६ (कलचुरि कर्ण का लेख); सा. ७६ (चौलुक्य त्रिलोचनपाल का दानपत्र);
आ. ७६ (अजमेर का लेख).
६ के अंक के छठे, सातवें और आठवें रूपों में विशेष अंतर नहीं है.
२४-लेखनसामग्री.
ताड़पत्र.
ताड़पत्र—ताड़ (ताल, ताली) नामक वृक्ष की दो भिन्न जातियों के पत्ते हैं. ताड़ के वृक्ष
दक्षिण में तथा समुद्रतट के प्रदेशों में विशेष रूप से और राजपूताना, पंजाब आदि में कम होते
हैं. टिकाउ होने तथा थोड़े मूल्य में बहुत मिल आने के कारण प्रारंभिक काल से¹ ही ताड़ के पत्ते
पुस्तक आदि लिखने के काम में आते थे. ताड़ के पत्ते बहुत बड़े बड़े होते हैं; उन्हें संधियों में
से काट कर, अधिक लंबी परंतु चौड़ाई में एक से चार इंच तक की ही, पट्टियां निकाली जाती
हैं जिनमें से जितनी लंबाई का पन्ना बनाना हो उतना काट लेते हैं. पुस्तक लिखने के लिये जो
ताड़पत्र काम में आते थे उनको पहिले सुखा देते थे, फिर उनको पानी में उबालते या भिगो रखते
थे. पीछे उनको फिर सुखा कर शंख, कौड़े या चिकने पत्थर आदि से घोटते थे. मामूली कामों
के लिये जो पत्ते पहिले काम में लाये जाते थे या अब लाये जाते हैं वे इस तरह तय्यार नहीं
किये जाते. कश्मीर और पंजाब के कुछ अंश को छोड़ कर बहुधा सारे भारतवर्ष में ताड़पत्र का
बहुत प्रचार था. पश्चिमी और उत्तरी भारतवाले उनपर स्याही से लिखते थे परंतु दक्षिणवाले
१. बौद्धों की जातक कथाओं में 'पण्ण' (पत्र, पत्ता, पन्ना) का उल्लेख कई जगह मिलता है (देखो, ऊपर पृ. ५,
टिप्पण २, ३, ४) जो ताड़पत्र का ही सूचक होना चाहिये. हुएन्तसंग के जीवनचरित से, जो उसीके, शिष्य ह्वैली का बनाया
हुआ है, पाया जाता है कि बुद्ध के निर्वाण के वर्ष में बौद्धों का जो पहिला संघ एकत्र हुआ (देखो, ऊपर पृ. ४, टि-
प्पण ६) उसमें बौद्धों का 'त्रिपिटक' ताड़पत्रों पर प्रथम लिखा गया था (बील अनुवादित हुएन्तसंग का जीवनचरित, पृ.
११६-१७). ऐसा कह सकते हैं कि भारतवर्ष में लिखने के लिये सबसे पहिले ताड़पत्र ही काम में आया हो और प्रारंभ में
उसपर दक्षिणी शैली से लोहे की तीखे गोल मुंह की शलाका से अक्षर कुचरना ही प्रतीत होता है क्योंकि 'लिख' धातु का
मूल अर्थ कुचरना, रगड़ना या रेखा करना ही है. स्याही से लिखने के लिये 'लिप्' धातु (लीपना, रंग पोतना) अधिक
उपयुक्त है; अत एव संभव है कि ताड़पत्रों पर स्याही से लिखने की उत्तरी प्रथा पीछे की हो.
संस्कृत साहित्य के कई शब्द और मुहावरे सबसे प्राचीन पुस्तकों का ताड़पत्र पर ही होना सूचित करते हैं, जैसे कि
एक विषय का पुस्तक 'ग्रंथ' या 'सूत्र' कहलाता था जो ताड़पत्रों के एक गांठ या एक डोरी से बंधे हुए होने का स्मरण दि-
लाता है. वृक्ष के पत्तों के संबंध से ही पुस्तक के विषयों का विभाग स्कंध, कांड, शाखा, वल्ली आदि शब्दों से किया गया है.
पत्र (पन्ना) और पर्ण (पन्ना) शब्द भी वृक्षों के पत्तों के ही स्मारक हैं.