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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 318 में से

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पृष्ठ 165

१३६ प्राचीनलिपिमाला.
भ—दू. ३ ( नानाघाट का लेख ); ती. ५ ( शोडास का लेख ); चौ. १६; पां. २६ ( जाजल्ल-
देव का लेख ).
भ—'भ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. पूर्व के 'भ' के
पांचवें रूप में बाईं ओर के अंश में ऊपर की तरफ़ ग्रंथि लगाने से यह बना है.
म—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. १६; चो. १८ ('म्' में).
य—दू. १; ती. दूसरे रूप को चलती कलम से पूरा लिखने से बना ( देखो, लिपिपत्र ६
में मथुरा के लेखों के 'र्थ्य' और 'श्य' में ); चौ. १६ ( बुद्धगया का लेख ).
र—दू. १८; ती. २०; चौ. २३ ( जोधपुर का लेख ).
ल—दू. ६; ती २१ ( दुर्गगण का लेख ); चो. २१ ( ओसिआ का लेख ).
व—दू. ती. ५ ( मथुरा के चार जैन लेख ); चौ. २३; पां. २४.
श—प. २ ( अशोक का खालसी का लेख ); दू. ६; ती. १८; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी );
पां. २०.
ष—प. ३ ( घोसुंडी के लेख के 'र्षे' में ); दू. ६; ती. १८; चौ. तोरमाण के लेख से.
स—दू. ५ ( मथुरा के जैन लेख ); ती. १७ ( करंडांडा का लेख ); चौ. बिलसद के लेख से;
पां. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ).
ह—दू. ५ ( शोडास का लेख ); ती. ८; चौ. अप्सद के लेख से; पां. २५ ( उज्जैन का लेख ).
ळ—दू. ७; ती. दूसरे का रूपांतर ( देखो लिपिपत्र ५० में चेन्नोलू के लेख का 'ळ' ).
क्ष—प. ७; दू. ८; ती. १६; चौ. १६ ( उष्णीषविजयधारणी ); पां. २७ ( चीरवा का लेख ).
ज्ञ—प. ८; दू. पहिले का रूपांतर ; ती. २१ ( ओसिआ का लेख ).
वर्तमान नागरी लिपि के ई, ॡ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर
नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ॡ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़
कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं.
'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा
पाया जाता है ( देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला
का 'ऋ' ). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का
रूपांतर है ( देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ' ), परंतु उज्जैन के
लेख के अंत की पूरी वर्णमाला ( लिपिपत्र २५ ) म 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे
अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के
स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग
गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.
शारदा ( कश्मीरी ) लिपि की उत्पत्ति.
शारदा लिपि नागरी की बहिन होने से उसके उत्पत्तिक्रम में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
रूपों में से कुछ ठीक वे ही हैं जो नागरी की उत्पत्ति में दिये हैं. इसलिये उन रूपों का वर्णन
१ नागरी में इस प्रकार के 'ई' की कल्पना का कुछ कुछ पता ई. स. की ६ ठी शताब्दी से लगता है. 'उष्णीषविजय-
धारणी' के अंत की वर्णमाला में 'इ' पर बिंदी ( लिपिपत्र १६ ) और राजा भोज के 'कूर्मशतक' में रेफ सा चिह्न
मिलता है ( लिपिपत्र २४ ).