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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 318 में से

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पृष्ठ 166

वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति. १३७
न कर बाकी का ही किया जायगा.
अ—चौ. तीसरे से बना (बाईं ओर का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल जाने से).
इ—दू. १८; ती. २४; चौ. तीसरे से बना (ऊपर की दोनों बिंदियों को चलती कलम से
लिखने से); पां. ३१ (अथर्ववेद).
ई—प. १० ('ई' से मिलता हुआ); दू १६ (आसीरगढ़ की मुद्रा); ती. ३० (बैजनाथ की
प्रशस्ति).
उ—नागरी के समान.
ए—ती. २८; चौ. ३१ (अथर्ववेद).
ओ—प. १; दू. ६; ती. दूसरे का रूपांतर; चौ. १७ (देखो, 'औ' में); पां. चौथे का
नीचे का अंश ऊपर की ओर अधिक बढ़ जाने से बना.
क—पां. २९. ख—चौ. २८. ग—नागरी के समान.
घ—ती. दूसरे से बना. ङ—दू. पहिले से बना. च—ती. चौ. २६.
छ—दू. ६. ज—ती. २८; चौ. २६. झ—चौ. तीसरे से बना; पां. ३१ (शाकुंतल).
ञ—ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे को चलती कलम से लिखने से नीचे गांठ बन गई.
ट—ती. २१ (दुर्गगण का लेख). ठ—मूल रूप में बना रहा.
ड—जैन शैली की नागरी के 'ङ' के समान.
ढ—दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. ३० (सोमवर्मन् का दानपत्र).
ण—चौ. २६. त—दू. ती. ८, चौ २८. थ—चौ. ३१. द—पां. १८.
ध—दू. ती. १६. न—नागरी के समान (प्रारंभ की ग्रंथि को छोड़ कर).
प—नागरी के समान. फ—दू. ३१ (शाकुंतल). ब—नागरी के समान.
भ—चौ. १८. म—नागरी के समान (सिररहित).
य, र, ल, व—चारों नागरी के समान. श—चौ तीसरे से बना.
ष—नागरी के समान. स—चौ. तीसरे से बना. ह—ती. दूसरे से बना.
वर्तमान शारदा लिपि के अक्षर अपने प्राचीन रूपों से नागरी की अपेक्षा अधिक मिलते
हुए हैं और उनमें पूरे स्वर वर्ण उनके प्राचीन चिह्नों से ही बने हैं.
लिपिपत्र ८३ वां.
इस लिपिपत्र में बंगला और कनड़ी लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
बंगला लिपि की उत्पत्ति.
बंगला लिपि प्राचीन नागरी की पुत्री है इस लिये उसकी उत्पत्ति में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के
भिन्न भिन्न रूपों में से कितने एक नागरी के उक्त रूपों से मिलते हैं अत एव उनको छोड़ कर
बाकी का ही विवेचन किया जायगा और जो अक्षर नागरी के समान हैं वा जिनके वर्तमान
रूप के पूर्व के सब रूप नागरी की उत्पत्ति में बतलाये हुए रूपों के सदृश हैं उनको भी
नागरी के समान कहेंगे.
अ—दक्षिणी शैली की नागरी के समान (मध्य की आड़ी लकीर तिरछी).
इ—पां. जैन शैली से. उ—नागरी के समान.
ए—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ओ—चौ. १८.
क—पां. चौथे से बना.