प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेखनसामग्री. १४७
जिससे उनपर के हरताल के अक्षर पक्के हो जाते हैं. फिर विद्यार्थी लोग खड़िया को पानी में
घोल कर नड (बरू) की कलम से उनपर लिखने का अभ्यास करते हैं जिसको 'पाटी घोटना'
कहते हैं. इस तरह कुछ समय तक उनपर लिखने से विद्यार्थियों के अक्षर सुंदर बनने लग जाते हैं.
प्राचीन पुस्तकों की नक़ल करनेवाले अर्थात् पुस्तकलेखक लकड़ी की सादी या रंगीन पाटी
पर, ऊपर से करीब ४ इंच छोड़ कर, डोरी लपेटते हैं और उसमें चार पांच इंच लंबी पतली लकड़ी
लगा देते हैं, जिससे मूल प्रति का पन्ना दबा रहता है. उस पाटी को घुटनों पर रख ज़मीन पर बैठ
कर पुस्तकों की नक़ल करते हैं.
रेशमी कपड़ा.
रेशमी कपड़ा भी सूती कपड़े की नांईं प्राचीन काल में लिखने के काम में लाया जाता था
परंतु उसके बहुत महंगे होने के कारण उसका उपयोग बहुत कम ही होता होगा. अलबेरुनी लिखता
है कि 'मैंने यह सुना कि रेशम पर लिखी हुई काबुल के शाहियावंशी हिंदू राजाओं की वंशावली
नगरकोट के क़िले में विद्यमान है. मैं उसे देखने को बहुत उत्सुक था परंतु कई कारणों से वह
न बन सका''. डॉ. बूलर ने जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में रेशम की
एक पट्टी पर स्याही से लिखी हुई जैन सूत्रों की सूची देखी थी२.
चमड़ा.
यूरोप तथा अरब आदि एशिया के देशों में प्राचीन काल में लेखनसामग्री की सुलभता न
होने से वहां क लोग जानवरों के चमड़ों को साफ़ कर उनपर भी लिखते थे परंतु भारतवर्ष में ताड़पत्र,
भोजपत्र आदि प्राकृतिक लेखनसामग्री की प्रचुरता तथा सुलभता एवं जैनों में चर्मपात्र, तथा वैदिक
काल के पीछे के ब्राह्मणों के मृगचर्म के अतिरिक्त और चमड़ा, अपवित्र माना जाने के कारण लिखने
में उसका उपयोग शायद ही होता हो. तो भी कुछ उदाहरण ऐसे मिल आते हैं जिनसे पाया जाता
है कि चमड़ा भी लिखने के काम में कुछ कुछ आता होगा. बौद्ध ग्रंथों में चमड़ा लेखनसामग्री में गिनाया
गया है३. सुबंधु ने अपनी 'वासवदत्ता' में अंधकारयुक्त आकाश में रहे हुए तारों को स्याही से काले
किये हुए चमड़े पर चंद्रमा रूपी खड़िया के टुकड़े से बनाये हुए शून्यबिंदुओं (बिंदियों) की उपमा दी
है४. जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में बिना लिखे हुए एक चर्मपत्र का
हस्तलिखित पुस्तकों के साथ मिलना डॉ. बूलर बतलाता है५.
पत्थर.
ताड़पत्र, भूर्जपत्र (भोजपत्र) या काग़ज़ पर लिखा हुआ लेख बहुत काल तक बचा नहीं रहता इस
लिये जिस घटना की यादगार चिरस्थायी करना होता उसको लोग पत्थर पर खुदवाते थे और अब
भी खुदवाते हैं. ऐसे लेख चट्टान, स्तंभ, शिला, मूर्तियों के आसन या पीठ, पत्थर के पात्रों या उन-
१. सं; अ. इं; जि. २, पृ ११. २. बूं; इं पे; पृ ६३. ३. कच्चायन की भूमिका, पृ. २७. बूं; इं. पे; पृ. ६५.
४. विश्वं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव नभसि संसारस्यातिशून्यत्वाच्छून्यबिन्दव इव (वासव-
दत्ता; हॉल का संस्करण, पृ. १८२).
५. बूं; इं. पे; पृ. ६५.