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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

१०४ प्राचीनलिपिमाला.
२०० के लिये १०० का चिह्न लिख उसकी दाहिनी ओर, कभी ऊपर कभी मध्य और कभी नीचे
की तरफ़, आड़ी ( सीधी, तिरछी या वक्र ) रेखा जोड़ी जाती थी१. ३०० के लिये १०० के चिह्न के साथ
वैसे ही दो लकीरें जोड़ी जाती थीं. ४०० से ९०० तक के लिये १०० का चिन्ह लिख उस के साथ क्रमशः ४ से ९
तक के अंक एक छोटी सी आड़ी लकीर२ से जोड़ देते थे. १०१ से ९९९ तक लिखने में सैकड़े के अंक
के आगे दहाई और इकाई के अंक लिखे जाते थे, जैसे कि १२९ के लिये १००, २०, ९; ९५५ के लिये
९००, ५०, ५. यदि ऐसे अंकों में दहाई का अंक नहीं हो तो सैकड़े के बाद इकाई का अंक रक्खा
जाता था, जैसे कि ३०१ के लिये ३००, १. ( देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक ).
२००० के लिये १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को एक छोटीसी सीधी आड़ी ( या नीचे
को मुड़ी हुई ) लकीर जोड़ी जाती थी और ३००० के लिये वैसी ही दो लकीरें. ४००० से ९०००
तक और १०००० से ९०००० तक के लिये १००० के चिह्न के आगे ४ से ९ तक के और १० से ९० तक
के चिह्न क्रमशः एक छोटी सी लकीर से जोड़े जाते थे ( देखो, लिपिपत्र ७५ ). ११००० के वास्ते
१०००० लिख, पास ही १००० लिखते थे. इसी तरह २१००० के लिये २००००, १०००; ९९०००
के लिये ९००००, ९००० लिखते थे. ऐसे ही ९९९९९ लिखने हो तो ९००००, ९०००, ९००,
९०, ९ लिखने थे. यदि सैकड़ा और दहाई के अंक न हों तो हज़ार के अंक के आगे इकाई का अंक
लिखा जाता था, जैसे कि ९००१ लिखना हो तो ९०००, १.
उपर्युक्त प्राचीन अंकों के चिह्नों में से १, २, और ३ के चिह्न तो क्रमशः -, = और ≡ आड़ी
लकीरें हैं जो अब तक व्यापारियों की बहियों में रुपयों के साथ आने लिखने में एक, दो और तीन के
लिये व्यवहार में आती हैं. पीछे से इन लकीरों में वक्रता आने लगी जिससे १ की लकीर से वर्तमान
नागरी आदि का १ बना, और २ तथा ३ की वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से वर्तमान नागरी आदि
के २ और ३ के अंक बने हैं. बाकी के चिह्नों में से कितने एक अक्षरों से प्रतीत होते हैं और जैसे समय
के साथ अक्षरों में परिवर्तन होता गया वैसे ही उनमें भी परिवर्तन होता रहा. प्राचीन शिलालेख
और दानपत्रों में ४ से १००० तक के चिह्नों के, अक्षरों से मिलते हुए, रूप नीचे लिखे अनुसार पाये
जाते हैं-
४-अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न 'क' के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर
गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति 'प्क' से कुछ कुछ मिलती होने
लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप 'प्क' जैसा मिलता है. क्षत्रपों और
आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में 'प्क' ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत
किये हुए चिह्नों में से चौथे में 'क' की खड़ी लकीर को बाईं तरफ़ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा
दिया है जिससे उसकी आकृति 'प्कृ' सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में 'क' की
दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, 'क' के मध्य
की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति
'प्र' के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के 'प्क' और
'प्र' से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी 'प्क' और 'प्र' से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन
वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत ९ चिह्नों में से पहिला 'प्क', दूसरा 'प्की', तीसरा और चौथा 'त्क',
१. यह रीति ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी और उसके पीछे के शिलालेखादि में मिलती है. अशोक के लेखों में इससे
कुछ भिन्नता पाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७४ के पूर्वार्द्ध में अशोक के लेखों से दिये हुए २०० के अंक के तीन रूप).
२. पिछले लेखों में कहीं कहीं यह लकीर नहीं भी लगाई जाती थी (देखो, लिपिपत्र ७४ के उत्तरार्द्ध में भिन्न भिन्न
लेखों से उद्धृत किये हुए अंकों में ४०० और ७०० तथा प्रतिहारों के दानपत्रों में ९००.)

अंक १०५
पांचवा 'द्रुक' और छठा 'म' के समान है. नेपाल के लेखों में 'प्क', और भिन्न भिन्न लेख व
दानपत्रों की पंक्ति में 'रुक्क' मिलता है (देखो, लिपिपत्र ७१ और ७२ के पूर्वार्द्ध की
तीन पंक्तियां). ४ का मूल चिह्न 'क' सा था जिस पर सिर की गोलाईदार या कोषदार रेखा
लगाने से उसकी आकृति कुछ कुछ 'प्क' से मिलती हुई बनी. लेखकों की भिन्न भिन्न लेखन-
शैली, सुंदरता लाने के यत्न और चलती कलम से पूरा अंक लिखने से उपर्युक्त भिन्न भिन्न रूप बने
हैं. आगे के अंकों का इस प्रकार का विवेचन करने में लेख बहुत बढ़ जाने की संभावना होने
के कारण बहुधा भिन्न भिन्न अक्षरों के नाम मात्र लिखे जायेंगे जिनको पाठक लिपिपत्र ७१ से
७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में दिये हुए अंकों से मिला कर देख लेवें.
५-इस अंक के चिह्न त, ता, पु, हु, रु, तृ, तृा, ना, न, ह, हू और ह अक्षरों से मिलते हुए
पाये जाते हैं.
६-के लिये 'ज', स (?), फ्र, फ्रा, फा, फ और हा से मिलते जुलते चिह्न मिलते हैं, तो
भी जग्गयपेट, गुप्तों और पल्लव आदि के लेखों से दिये हुए इस अंक के चिह्न ठीक तरह किसी
अक्षर से नहीं मिलते, वे अंकसंकेत ही हैं. उनको अक्षरों से मिलाने का यत्न करना खैंचतान
ही है.
७-के चिह्न ग्र, गु और ग से मिलते जुलते हैं.
८-के चिह्न ह्र, ह्रा, ह, हा, उ, पु, ट, टा, र, ब्र और द्वा से मिलते हुए हैं, परंतु कुछ चिह्न ऐसे
हैं जो अक्षर नहीं माने जा सकते.
९-नानाघाट के, कुशनवंशियों के और क्षत्रपों तथा आंध्रवंशियों के लेखों में जो ९ के चिह्न
मिलते हैं उनकी किसी प्रकार अक्षरों में गणना नहीं हो सकती. पीछे से अंतर पड़ने पर उसके
चिह्न ओ, उ और ओं (के कल्पित चिह्न) से बनते गये.
१०-नानाघाट के, कुशनवंशियों के, क्षत्रपों तथा आंध्रों के लेखों; क्षत्रपों के सिक्कों, जग्गयपेट
के लेखों तथा गुप्तादिकों के लेखादि में तो १० का अंकसंकेत ही है क्यों कि उसकी किसी अक्षर
से समानता नहीं हो सकती परंतु पीछे से उसकी आकृति यै, ह, दृ, ख और लृ से मिलती
हुई बन गई.
२०-का चिह्न 'थ' था जो पीछे के परिवर्तनों में भी उसी अक्षर के परिवर्तित रूपों के
सदृश बना रहा.
३०-का चिह्न 'ल' के सदृश ही मिलता है.
४०-का चिह्न 'प्त' और 'स' से मिलता हुआ मिलता है.
५०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. केवल भिन्न भिन्न लेखादि से उद्धृत किये
हुए इस अंक के चिह्नों में से दूसरा दक्षिणी शैली के 'ब' से मिलता है.
६०-का चिह्न 'प', 'पु' या 'प्र' से मिलता हुआ है.
७०-का चिह्न 'स', 'ग्र', रो, 'ग्रा', 'प्र' या 'हू' से मिलता है.
८०-का चिह्न उपध्मानीय के चिह्न से मिलता हुआ है (देखो, लिपिपत्र १७ में उदयगिरि के
लेख के अक्षरों में उपध्मानीय का चिह्न).
९०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. यदि उपध्मानीय के चिह्न के मध्य में एक आड़ी
लकीर और बढ़ा दी जावे तो उसकी आकृति क्षत्रपों के सिक्कों से उद्धृत किये हुए इस चिह्न के
दूसरे रूप से मिल जायगी.

१०६ प्राचीनलिपिमाला.
१००-नानाघाट के लेख में इस अंक का चिह्न 'सु' अथवा 'अ' से मिलता हुआ है क्योंकि उक्त
दोनों अक्षरों की आकृति उस समय परस्पर बहुत मिलती हुई थी. पिछले लेखों में सु, अ,
लु, से, सो और सौ से मिलते हुए रूप मिलते हैं, परंतु नासिक के लेखों और क्षत्रपों के सिक्कों
में इसके जो रूप मिलते हैं उनकी उस समय के किसी अक्षर से समानता नहीं है.
२००-अशोक के लेखों में मिलनेवाले इस अंक के तीन चिह्नों में से पहिला 'सु' है,
परंतु दूसरे दो रूप उस समय के किसी अक्षर से नहीं मिलते. नानाघाट के लेख का रूप 'आ'
के समान है. गुप्तों आदि के लेखों का दूसरा रूप 'ला' से मिलता हुआ है और भिन्न भिन्न
लेखादि से उद्धृत किये हुए इस अंक के दो रूपों में से दूसरा 'सू' से मिलता है. नासिक के
लेखों, क्षत्रपों के सिक्कों, वलभी के राजाओं तथा कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों में मिलनेवाले
इस अंक के रूप किसी अक्षर से नहीं मिलते.
३००-का अंक १०० के अंक की दाहिनी ओर २ आड़ी या गोलाईदार लकीरें लगाने से
बनता है. १०० के सूचक अक्षर के साथ ऐसी दो लकीरें कहीं नहीं लगती, इसलिये इसकी
किसी मात्रासहित अक्षर के साथ समानता नहीं हो सकती. ४०० से ६०० तक के चिह्न, १००
के चिह्न के आगे ४ से ६ तक के अंकों के जोड़ने से बनते थे, उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
१०००-का चिह्न नानाघाट के लेख में 'रो' के समान है. नासिक के लेखों में 'धु' अथवा
'चु' से मिलता हुआ है और वाकाटकवंशियों के दानपत्रों में उनकी लिपि के 'थु' के समान है.
२००० और ३००० के चिह्न, १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को क्रमशः एक और
दो आड़ी लकीरें जोड़ने से बनते थे. इसलिये उनकी किसी अक्षर से समानता नहीं हो सकती.
४००० से ६००० तक के अंक, १००० के चिह्न के आगे क्रमशः ४ से ६ तक के, और १००००
से ६०००० तक के अंक, १००० के आगे १० से ६० तक की दहाइयों के चिह्न जोड़ने से बनते थे
इसलिये उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
ऊपर प्राचीन शैली के अंकों की जिन जिन अक्षरों से समानता बतलाई गई है उसमें सब के
सब अक्षर उक्त अंकों से ठीक मिलते हुए ही हों ऐसा नहीं है. कोई कोई अक्षर ठीक मिलते
हैं बाकी की समानता ठीक वैसी है जैसी कि नागरी के वर्तमान अक्षरों के सिर हटाने के बाद उनका
नागरी के वर्तमान अंकों से मिलान करके यह कहा जाय कि २ का अंक 'र' से, ३ 'रू'
से, ५ 'प' से, ६ 'द' से, ७ 'उ' की मात्रा से और ८ 'ट' से मिलता जुलता है. १, २, ३,
५०, ८० और ६० के प्राचीन उपलब्ध रूपों और अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के
दूसरे व तीसरे रूपों (देखो, लिपिपत्र ७४) से यही पाया जाता है कि ये चिह्न तो सर्वथा
अक्षर नहीं थे किंतु अंक ही थे. ऐसी दशा में यही मानना पड़ेगा कि प्रारंभ में १ से १०००
तक के सब अंक वास्तव में अंक ही थे. यदि अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों, का सूचक माना
होता तो उनका कोई क्रम अवश्य होता और सब के सब अंक अक्षरों से ही बतलाये जाते,
परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि प्रारंभ में ये सब अंक ही थे. अनायास से किसी अंक का
रूप किसी अक्षर से मिल जाय यह बात दूसरी है; जैसे कि वर्तमान नागरी का २ का अंक
उसी लिपि के 'र' से, और गुजराती के २ (२) और ५ (५) के अंक उक्त लिपि के र (२) और
१. एक, दो और तीन के प्राचीन चिह्न तो स्पष्ट ही संख्यासूचक हैं और अशोक की लिपि में चार का चिह्न जो 'क'
अक्षर से मिलता हुआ है वह संभव है कि चौराहे या स्वस्तिक का सूचक हो. ऐसे ही और अंकों के लिए भी कोई
कारण रहा होगा.

प (५) से बिलकुल मिलते हुए हैं. कभी कभी अक्षरों की नांई अंकों के भी सिर बनाने से उनकी
आकृतियां कहीं कहीं अक्षरों सी बनती गईं१. पीछे से अंकचिह्नों को अक्षरों के से रूप देने की
चाल बढ़ने लगी और कितने एक लेखकों ने और विशेषकर पुस्तकलेखकों ने उनको सिरसहित
अक्षर ही बना डाला जैसा कि बुद्धगया से मिले हुए महानामन् के शिलालेख२, नेपाल
के कितने एक लेखों३ तथा प्रतिहारवंशियों के दानपत्रों४ से पाया जाता है. तो भी १, २, ३, ५०,
८० और ६० तो अपने परिवर्तित रूपों में भी प्राचीन रूपों से ही मिलते जुलते रहे और किन्हीं
अक्षरों में परिणत न हुए.
शिलालेखों और ताम्रपत्रों के लेखक जो लिखते थे वह अपनी जानकारी से लिखते थे, परंतु
पुस्तकों की नक़ल करनेवालों को तो पुरानी पुस्तकों से ज्यों का त्यों नक़ल करना पड़ता था. ऐसी
दशा में जहां वे मूल प्रति के पुराने अक्षरों या अंकों को ठीक ठीक नहीं समझ सके वहां वे अवश्य
चूक कर गये. इसीसे हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों में जो अंकसूचक अक्षर मिलते हैं उनकी संख्या
अधिक है जिनमें और कई अशुद्ध रूप दर्ज हो गये हैं.
[L13

१०८ प्राचीनलिपिमाला.
६०-जु, वु, घु, थु, र्धु, थू, र्धू, र्ध, र्धु और घु.
७०-चु, च्, थू, र्थी, घू और र्म्न.
८०-हृ, १ 𑀏, 𑀐, 𑀑, 𑀒 और पु.
९०-𑀓, 𑀔, 𑀕, 𑀖 और 𑀗.
१००-सु, सू, लु और अ.
२००-सु, सू, सु, आ, लू और र्घू.
३००-स्ता, स्त्रा, णा, सा, सु, सुं और स्वः
४००-सो, स्तो और स्ता.
ऊपर लिखे हुए अंकसूचक संकेतों में १, २ और ३ के लिये क्रमशः ए, द्वि और त्रि;
स्व, स्ति और श्री; और ओं, न और मः मिलते हैं; वे प्राचीन क्रम के कोई रूप नहीं है किंतु
पिछले लेखकों के कल्पित हैं. उनमें से ए, द्वि और त्रि तो उन्ही अंकों के वाचक शब्दों के पहिले
अक्षर हैं और स्व, स्ति और श्री तथा ओं, न और मः मंगल वाचक होने से इनको प्रारंभ के तीन
अंकों का सूचक मान लिया है. एक ही अंक के लिये हस्तलिखित पुस्तकों में कई भिन्न अक्षरों के होने
का कारण कुछ तो प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में और कुछ पुस्तकों से नक़ल करने में लेखकों की ग़लती
है, जैसे २० के अंक का रूप ‘थ’ के समान था जिसकी आकृति पीछे से ‘घ’ से मिलती हुई होने से
लेखकों ने ‘थ’ को ‘घ’, फिर ‘घ’ को ‘ध्व’ और ‘प’ पढ़ा होगा. इसी तरह दूसरे अंकों के लिये
भी अशुद्धियां हुई होंगी.
प्राचीन शिलालेखों और दानपत्रों में सब अंक एक पंक्ति में लिखे जाते थे परंतु हस्तलिखित पुस्तकों
के पन्नों में चीनी अक्षरों की नांई एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. ई. स. की छठी शताब्दी के
आस पास के मि. बावर के प्राप्त किये हुए पुस्तकों में भी पत्रांक इसी तरह एक दूसरे के नीचे लिखे
मिलते हैं. पिछले पुस्तकों में एक ही पन्ने पर प्राचीन और नवीन दोनों शैलियों से भी अंक लिखे मिलते
हैं. पत्रे की दूसरी तरफ़ के दाहिनी ओर के ऊपर की तरफ़ के हाशिये पर तो अक्षरसंकेत से,
जिसको अक्षरपल्ली कहते थे; और दाहिनी तरफ़ के नीचे के हाशिये पर नवीन शैली के अंकों से,
जिनको अंकपल्ली कहते थे. इस प्रकार के अंक नेपाल, पाटण (अणहिलवाड़ा), खंभात और उदयपुर
(राजपूताना में) आदि के पुस्तकमंडारों में रक्खे हुए पुस्तकों में पाये जाते हैं. पिछले हस्तलिखित पुस्तकों
में अक्षरों के साथ कभी कभी अंक, तथा खाली स्थान के लिये शून्य भी लिखा हुआ मिलता है,
जैसे कि ३३ = $\frac{ला}{३}$, १०० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
० \end{smallmatrix}}$, १०२ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
२ \end{smallmatrix}}$, १३१ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ला
१ \end{smallmatrix}}$, १५० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
५ \end{smallmatrix}}$, २०६ = $\frac{सू}{\begin{smallmatrix} ०
६ \end{smallmatrix}}$ आदि. नेपाल के बौद्ध, तथा
गुजरात, राजपूताना आदि के जैन पुस्तकों में यही अक्षरक्रम ई. स. की १६ वीं शताब्दी तक कहीं
कहीं मिल आता है और दक्षिण की मलयालम् लिपि के पुस्तकों ३ में अब तक अक्षरों से अंक
१. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र २१, २४, ४७).
२. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र ३८, ४२, ४४).
३. मलयालम् लिपि के पुस्तकों में बहुधा अब तक इस प्रकार अक्षरों में अंक लिखने की रीति चली आती है. डॉव.
गुंडर्ट ने अपने मलयालम् भाषा के व्याकरण (दूसरे संस्करण) में अक्षरों से बतलाये जाने वाले अंकों का ब्योरा इस तरह
दिया है—
१=न. २=ल. ३=न्य. ४=क्क. ५=ड्र. ६=हा (ह). ७=ग्र. ८=ट्रे (?). १०=म. २०=य. ३०=ल.
४०=प्त. ५०=व. ६०=च. ७०=रू (तु). ८०=च. ९०=ण. १००=ञ. (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६६, पृ. ७६०).
इनमें भी प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में गलती होना पाया जाता है जैसे कि ६ का सूचक ‘हा’, ‘फ’ को ‘ह’ पढ़ने से ही हुआ
है. उस लिपि में ‘फ’ और ‘ह’ की आकृति बहुत मिलती हुई है (देखो, लिपिपत्र ८१). ऐसे ही और भी अशुद्धियां हुई हैं.

बतलाने का प्रचार बना हुआ है; परंतु उनके देखने से पाया जाता है कि उनके लेखक सर्वथा
प्राचीन क्रम को भूले हुए थे और 'मक्षिकास्थाने मक्षिका' की नांई केवल प्राचीन पुस्तकों के अनु-
सार पत्रांक लगा देते थे.
शिलालेख और दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो केवल
प्राचीन क्रम से ही अंक लिखे मिलते हैं. पहिले पहिल गुर्जरवंशी किसी राजा के ताम्रपत्र के
दूसरे पत्रे में, जो [कलचुरि] संवत् ३४६ (ई. स. ५९५) का है, नवीन शैली से अंक दिये हुए
मिलते हैं अर्थात उसमें क्रमशः ३, ४ और ६ के अंक हैं. उक्त संवत के पीछे कहीं प्राचीन शैली
से और कहीं नवीन शैली से अंक लिखे जाने लगे और १० वीं शताब्दी के मध्य तक प्राचीन शैली
का प्रचार कुछ कुछ रहा१; फिर तो उठ ही गया२ और नवीन शैली से ही अंक लिखे जाने लगे.
उसके पीछे का केवल एक ही लेख ऐसा मिला है, जो नेपाल के मानदेव के समय का
[नेवार] सं. २५६ (ई. स. ११३६) का है और जिसमें अंक प्राचीन शैली से दिये हैं३.
भारतवर्ष में अंकों की यह प्राचीन शैली कब से प्रचलित हुई इसका पता नहीं चलता परंतु
अशोक के सिद्धापुर, सहस्राम और रूपनाथ के लेखों में इस शैली के २००, ५० और ६ के अंक मिलते
हैं जिनमें से २०० का अंक४ तीनों लेखों में बिलकुल ही भिन्न प्रकार का है और ५० तथा ६ के दो दो
प्रकार के रूप मिलते हैं. २०० के भिन्न भिन्न तीन रूपों से यही कहा जा सकता है कि ई. स. पूर्व
की तीसरी शताब्दी में तो अंकों की यह शैली कोई नवीन बात नहीं किंतु सुदीर्घ काल से चली आती
रही होगी. यदि ऐसा न होता तो अशोक के लेखों में २०० के अंक के एक दूसरे से बिलकुल ही
भिन्न तीन रूप सर्वथा न मिलते. अशोक से पूर्व उक्त अंकों के चिह्न कैसे थे और किन किन
परिवर्तनों के बाद वे उन रूपों में परिणत हुए इस विषय में कहने के लिये अब तक कोई साधन
उपलब्ध नहीं हुआ.
कई विद्वानों ने जैसे ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न भिन्न कल्पनाएं की हैं वैसे ही
इन प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति के विषय में भी की हैं जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है-
प्रथम ई. स. १८३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने यह अनुमान किया कि ये अंक उनके सूचक शब्दों के
प्रथम अक्षर हैं, जिसको वोप्के आदि कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने स्वीकार भी किया.


१. यद्यपि शिलालेखों और दानपत्रों में प्राचीन शैली के अंकों का प्रचार १०वीं शताब्दी के मध्य तक कुछ न कुछ
पाया जाता है तो भी ताम्रपत्रों के लेखक ई. स. की आठवीं शताब्दी से ही उस शैली के अंकों के लिखने में ग़लतियां
करने लग गये थे. वलभी के राजा शीलादित्य (छठे) के गुप्त सं. ४४१ के दानपत्र में १०० के साथ जुड़नेवाले ४ के अंक के
स्थान में ४० का अंक जोड़ दिया है (इं. ऐं; जि. ६ पृ. १६ के पास का सेट), और पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् के
गांगेय सं. १८३ के दानपत्र में ८० के स्थान पर ८ का और ३ के स्थान पर ३० का चिह्न ('लो', 'ल' का घसीट रूप) लिखा
है और २० के लिये २ के आगे बिंदी लगा कर एक ही दानपत्र में प्राचीन और नवीन शैली का मिश्रण भी कर दिखाया
है (ए. इं; जि. ३, पृ. १३३ के पास का सेट).
२. तामिळ लिपि में अब तक अंक प्राचीन शैली से ही लिखे जाते हैं; नवीन शैली के अंकों का प्रचार अब होने लगा है.
थोड़े समय पूर्व के छपे हुए पुस्तकों में पत्रांक प्राचीन शैली से ही दिये हुए मिलते हैं परंतु अब नवीन शैली से देने लगे हैं.
तामिळ अंकों के लिये देखो, लिपिपत्र ८१ में तामिळ लिपि.
३. बें; ज. ने; पृ. ८१.
४. अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के अंक के भिन्न भिन्न ३ चिह्नों के लिये देखो लिपिपत्र ७४ का पूर्वार्द्ध. उक्त
चिह्नों में से दूसरा सहस्राम के लेख से है. करीब ८०० वर्ष पीछे उसीका किंचित् बदला हुआ रूप फिर मथुरा से मिली
हुई गुप्त सं. २३० (ई. स. ५४६) की एक बौद्ध मूर्ति के नीचे के लेख (सी; गु; इं; सेट४० D) में मिलता है; बीच में कहीं नहीं
मिलता. कभी कभी लेखकों को अक्षरों या अंकों के प्राचीन चिह्नों की स्मृति रहने का यह अद्भुत उदाहरण है.

११० प्राचीनलिपिमाला.
पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इन अंकों के उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर होने न होने
के विषय में कुछ न कह कर भारतवर्ष के प्राचीन अंकों के विषय के अपने लेख में ई. स. १८७७ में
लिखा है कि 'अंकों की उत्पत्ति के विषय में मेरा विश्वास है कि मैं निश्चय के साथ यह प्रतिपादन
कर सकता हूं कि पहिले तीन अंकों को छोड़ कर बाकी सब के सब अक्षरों या संयुक्ताक्षरों के सूचक हैं
और भिन्न भिन्न वंशों के लेखों और [भिन्न भिन्न] शताब्दियों में उन (अंकों) की आकृतियों में
जो अंतर पाया जाता है उसका मुख्य कारण उक्त समय और वंशों के अक्षरों का अंतर ही है'१.
डॉ. बूलर ने उक्त लेख के साथ ही अपनी संमति प्रकट करते समय लिखा है कि 'प्रिन्सेप का यह
पुराना कथन, कि अंक उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर हैं, छोड़ देना चाहिये. परंतु अब
तक इस प्रश्न का संतोषदायक समाधान नहीं हुआ. पंडित भगवानलाल ने आर्यभट और
गंवशास्त्र की अक्षरों द्वारा अंक सूचित करने की रीति को भी जांचा परंतु उसमें सफलता न हुई
(अर्थात् अक्षरों के क्रम की कोई कुंजी न मिली); और न मैं इस रहस्य की कोई कुंजी प्राप्त करने का
दावा करता हूं. मैं केवल यही बतलाऊंगा कि इन अंकों में अनुनासिक, जिह्वामूलीय और उपध्मा-
नीय का होना प्रकट करता है कि उन (अंकों) को ब्राह्मणों ने निर्माण किया था, न कि वाणियाओं
(महाजनों) ने और न बौद्धों ने जो प्राकृत को काम में लाते थे'२.
प्रो. कर्न ने ई. स. १८७७ में 'इंडियन ऐंटिक्केरी' के संपादक को एक पत्र के द्वारा यह सूचित
किया कि 'मैं सामान्यतः बूलर के इस कथन से सहमत हूं कि अंक ब्राह्मणों ने निर्माण किये थे'३.
ई. स १८७८ में बर्नल ने लिखा कि 'अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षरों से इन [अंक]
चिह्नों की उत्पत्ति मानना बिलकुल असंभव है क्योंकि उनकी दक्षिणी अशोक (ब्राह्मी) अक्षरों
से, जो अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षर हैं, बिलकुल समानता नहीं है'४. परंतु बर्नल ने ब्राह्मी
अक्षरों की उत्पत्ति फिनिशियन अक्षरों से होना तो मान ही रक्खा था; इससे इन अंकों की उत्पत्ति
भी बाहरी स्रोत से होना अनुमान करके लिखा कि 'इस (अंक) क्रम की इजिप्ट (मिसर) के
डेमोटिक् अंकक्रम से सामान्य समानता, मेरे विचार में, इस कामचलाऊ अनुमान के लिये बस
होगी कि अशोक के अंकक्रम की उत्पत्ति उसी (डिमोटिक्) क्रम से हुई है, परंतु इसका विकास
भारतवर्ष में हुआ है'५.
फिर इ. सी. बेले ने 'वर्तमान अंकों का वंशक्रम' नामक विस्तृत लेख ६ में यह बतलाने का यत्न
किया कि 'भारतीय अंकशैली का सिद्धान्त मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से निकला है, तो भी
भारतीय अंकचिह्नों में से अधिकतर फिनिशियन, बाक्ट्रिअन और अक्केडिअन अंकों या अक्षरों से
लिये हुए हैं; परंतु कुछ थोड़ेसों की विदेशी उत्पत्ति प्रमाणित नहीं हो सकती'.
इस पर ई. स. १८८६ में बूलर ने लिखा कि 'बेले का कथन, यह मानने से बड़ी आपत्ति उपस्थित
करता है कि हिंदुओं ने [अंक] भिन्न भिन्न चार या पांच स्रोतों से लिये, जिनमें से कुछ तो बहुत
प्राचीन और कुछ बहुत अर्वाचीन हैं. परंतु उसके लेख के साथ प्रकट किया हुआ मिसर और भारत
के अंकों के मिलान का नक्शा और उन दोनों में सैंकड़ों के अंकों के बनाने की रीति की समानता के
बारे में उसका कथन, भगवानलाल की कल्पना को छोड़ देने और कुछ परिवर्तन के साथ बर्नल के
कथन को, जिससे बार्थ भी सहमत है, स्वीकार करने को प्रस्तुत करता है. मुझे यह संभव प्रतीत
१. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४४. २. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४८. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. १४२. ४. ब; सा. इं. पे; पृ. ६०.
५. ब; सा. इं. पे; पृ. ६५. ६. ज. रॉ. ए. सो. (न्यू सीरीज़) जि. १४, पृ. ३३५ से और जि. १५, पृ. १ से.

होता है कि ब्राह्मी अंकों के चिह्न मिसर के हिएरेटिक अंकों से निकले हैं और हिंदुओं ने उनका अक्षरों
में रूपांतर कर दिया, क्योंकि उनको शब्दों से अंक प्रकट करने का पहिले ही से अभ्यास था तो भी
ऐसी उत्पत्ति का विवेचन अभी तक बाधा उपस्थित करता है और निश्चयात्मक नहीं कहा जा सकता.
परंतु दूसरी दो महत्त्व की बातें निश्चय समझना चाहिये कि—
(१) अशोक के लेखों में मिलने वाले [अंकों के] भिन्न रूप यही बतलाते हैं कि इन अंकों
का इतिहास ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी से बहुत पूर्व का है;
(२) इन चिह्नों का विकास ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा हुआ है क्योंकि उनमें उपध्मानीय
के दो रूप मिलते हैं जो निःसंशय शिक्षा के आचार्यों के निर्माण किये हुए हैं१.
ई. स. १८९८ में फिर बूलर ने डा. बर्नल के मत को ठीक बतलाया परंतु उसमें इतना
बदलने की संमति दी कि भारतीय अंक मिसर के डिमोटिक क्रम से नहीं किंतु हिएरेटिक से निकले
हुए अनुमान होते हैं, और साथ में यह भी लिखा कि ‘डॉ. बर्नल के मत को निश्चयात्मक बनाने
के लिये ई. स. पूर्व की तीसरी और उससे भी पहिले की शताब्दियों के और भी [भारतीय] अंकों
की खोज करने, तथा भारतवर्ष और मिसर के बीच के प्राचीन संपर्क के विषय में ऐतिहासिक अथवा
परंपरागत वृत्तान्त की खोज, की अपेक्षा है. अभी तो इसका सर्वथा अभाव है और यदि कोई
मिसर के अंकों का भारत में प्रचार होना बतलाने का यत्न करे तो उसको यही अटकल लगाना होगा
कि प्राचीन भारतीय नाविक और व्यौपारी मिसर के अधीनस्थ देशों में पहुंचे होंगे अथवा अपनी
समुद्रयात्रा में मिसर के व्यौपारियों से मिले होंगे. परंतु ऐसी अटकल अवश्य संदिग्ध है जब तक
कि उसका सहायक प्रमाण न मिले.’२
इस तरह डॉ. बर्नल भारतवर्ष के प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति मिसर के डिमोटिक
अंकों से; बेले उनका क्रम तो मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से और अधिकतर अंकों की उत्पत्ति
फिनिशियन्, बाक्ट्रियन् और अक्केडियन् अंकों से, और बूलर मिसर के हिएरेटिक अंकों से बत-
लाता है. इन विद्वानों के कथनों का भारतीय अंकों के क्रम और आकृतियों से मिलान करने से
पाया जाता है कि—
हिएरोग्लिफिक अंकों का क्रम भारतीय क्रम से, जिसका विवेचन ऊपर पृ. १०३-४ में किया
गया है, सर्वथा भिन्न है, क्योंकि उसमें मूल अंकों के चिह्न केवल तीन, अर्थात् १, १० और १०० थे.
इन्हीं तीन चिह्नों को बारंबार लिखने से ९९९ तक के अंक बनते थे. १ से ९ तक के अंक, एक के
अंक के चिह्न (खड़ी लकीर) को क्रमशः १ से ९ बार लिखने से बनते थे. ११ से १९ तक के
लिये १० के चिह्न की बाईं ओर क्रमशः १ से ९ तक खड़ी लकीरें खींचते थे. २० के लिये १० का
चिह्न दो बार और ३० से ९० तक के लिये क्रमशः ३ से ९ बार लिखा जाता था. २०० बनाने के
लिये १०० के चिह्न को दो बार लिखते थे, ३०० के लिये तीन बार आदि (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ
नकशा). इस क्रम में १००० और १०००० के लिये भी एक एक चित्र था३ और १००००० के लिये
१. बू; इं. पे; पृ. ८२.
२. बू; इं. सू; संख्या ३, पृ. ११६ (द्वितीय संस्करण). इससे पूर्व उक्त पुस्तक से जहां जहां हवाले दिये हैं
वे प्रथम संस्करण से हैं.
३. ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५.

पश्चिमी व मध्य भारतीय कुटिल, नागरी एवं शारदा लिपियों का विकास

११२ प्राचीनलिपिमाला.
मेंढक और १०००००० के लिये हाथ फैलाये हुए पुरुष का चित्र १ बनाया जाता था. मिसर का
सब से पुराना अंकक्रम यही था जो बहुत ही जटिल और गणना की बिलकुल प्रारंभिक दशा
का सूचक है. इसीसे फिनिशियन् अंक निकले हैं जिनका क्रम भी ऐसा ही है, केवल १० के
चिह्न को बारंबार लिखने की जटिल रीति को कुछ सरल बनाने के लिये उसमें २० के अंक के लिये
नवीन चिह्न बनाया गया, जिससे ३० के लिये २० और १०; ६० के लिये २०, २०, २०, २० और
१० लिखने पड़ते थे. इस क्रम के ४ मूल अंकों में से १ का चिह्न तो एक खड़ी लकीर है और
१०, २० और १०० के तीन चिह्नों में से एक भी उक्त अंकों के सूचक भारतीय अंक चिह्नों से
नहीं मिलता ( देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा ). इस लिये बेले का कथन किसी प्रकार स्वीकार
नहीं किया जा सकता और इसीसे बूलर को भी यह लिखना पड़ा था कि बेले का कथन बड़ी
आपत्ति उपस्थित करता है.
पीछे से मिसरवालों ने किसी विदेशी सरल अंकक्रम को देख कर अथवा अपनी बुद्धि से
अपने भद्दे हिएरोग्लिफिक् क्रम को सरल करने के लिये भारतीय अंकक्रम जैसा नवीन क्रम बनाया,
जिसमें १ से ६ तक के लिये ६, १० से ६० तक की दहाइयों के लिये ६, और १०० तथा १००० के
लिये एक एक चिह्न स्थिर किया. इस अंकक्रम को 'हिएरेटिक' कहते हैं और इसमें भी अंक दाहिनी
ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं. हिएरेटिक् और भारतीय अंकों की आकृतियों का परस्पर
मिलान किया जावे तो अंकों के २० चिह्नों में से केवल ६ का चिह्न दोनों में कुछ मिलता हुआ
है; बाकी किसी में समानता नहीं है. दूसरा अंतर यह है कि हिएरेटिक अंकों में २००
से ४०० तक के अंक १०० के अंक की बाईं तरफ़ क्रमशः १ से ३ खड़ी लकीरें रखने से बनते
हैं परंतु भारतीय अंकों में २०० और ३०० के लिये क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें १०० के
अंक के साथ दाहिनी ओर जोड़ी जाती हैं और ४०० के लिये वैसी ही ३ लकीरें १०० के अंक
के साथ जोड़ी नहीं जातीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा जाता है. तीसरा अंतर यह है कि
हिएरेटिक में २००० से ४००० बनाने के लिये १००० के अंक के कुछ विकृत रूप को आड़ा
रख कर उसके ऊपर क्रमशः २ से ४ तक खड़ी लकीरें जोड़ी जाती हैं परंतु भारतीय अंकों में
२००० और ३००० के अंक तो १००० के अंक की दाहिनी ओर क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें
जोड़ने से बनते हैं परंतु ४००० के लिये वैसी ही तीन लकीरें नहीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा
जाता है (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा.)
डेमोटिक अंक हिएरेटिक से ही निकले हैं और उन दोनों में अंतर बहुत कम है (देखो,
पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा ) जो समय के साथ हुआ हो. इन अंकों को भारतीय अंकों से
मिलाने से यही पाया जाता है कि इनमें से केवल ६ का अंक नानाघाट के ६ से ठीक मिलता है.
बाकी किसी अंक में कुछ भी समानता नहीं पाई जाती.
ऊपर के मिलान से पाया जाता है कि मिसर के हिएरेटिक और उससे निकले हुए
डिमांटिक अंकों का क्रम तो भारतीय क्रमसे अवश्य मिलता है। क्योंकि १ से १००० तक के
लिये २० चिह्न दोनों में हैं परंतु उक्त २० चिह्नों की आकृतियों में से केवल ६ की आकृति के
सिवाय किसीमें समानता नहीं है, और २०० तथा ३००, एवं २००० और ३००० बनाने की
रीति में भी अंतर है और ४०० तथा ४००० बनाने की रीति तो दोनों में बिलकुल ही
भिन्न है.
१. एन्सा. ब्रि ; जि. १७, पृ. ६२५.

हिएरोग्लिफिक आदि सेमिटिक अंकों से भारतीय प्राचीन शैली के अंकों के
मिलान का नक्शा.

अंकहिएरोग्लिफिकफिनिशियनहिएरेटिकडेमोटिकअशोक के लेखों सेनानाघाट के लेख सेकुशनवंशियों के लेखों सेक्षत्रपों तथा आंध्रों के लेखों से
१।।१, २, ।, ।।———
२॥॥२, ५५===
३
४
५
६
७
८
९
१०∩—b λ λ/ λ∝ ∝∝ ∝ Ɛ∝ ∝ ∝
११∩।⸢λ
१६∩
२०∩∩०, ३, z, =३4 5०𝜽 𝜽 𝜽𝜽
३०∩∩∩𐤘H५५𝛎 𝛎 𝛎
४०∩∩∩∩HH┴corner५ ५ ५
५०∩∩∩∩∩𐤘HH२२𝟔 𝚯𝟔 𝟔 𝟔
६०∩∩∩ ∩∩∩HHH२५५𝜈 𝜈 𝜈
७०∩∩∩ ∩∩∩∩𐤘HHH३३𝒳 ५☨
८०∩∩∩∩ ∩∩∩∩HHHH२५२𝚽𝚽 𝚽 𝚽
९०∩∩∩ ∩∩∩ ∩∩∩𐤘HHHH२५५⊕ ⊕
१००𓍢 (१)५, H, 101, λ⤹𝜍H𝜂
२००𓍢𓍢 (११)(५) 1011⤹𝜍५ 𝜐 Ɛ HH𝜂
३००𓍢𓍢𓍢 (१११)⤹𝜍H
४००⤹𝜍𝜏H
५००⤹𝜍☨
७००𝜍𝜏H
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२०००𝜍𝜍𝑞 𝑞
३०००𝜍𝜍𝑞
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CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

५ ); Wait,एhas the shape of Devanagariए! Look at ए. ब्रि: एthen dot.. Then बwith्रandि=ब्रि! Not त्रि! Look at the loop of ब: it is ब्रि! ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५= Encyclopaedia Britannica, Vol. 17, p. 625! YES! Brilliant deduction. In Hindi scholarship of that era, "Encyclopaedia Britannica" =एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका-> abbreviatedए. ब्रि.! And जि.=जिल्द(Volume)! पृ.=पृष्ठ(Page)! Let's re-verify: अंक ( ए. ब्रि ; जि. १७, पृ. ६२५); तीसरी में फिनिशिअन अंक ( ए. ब्रि ; जि. १७, पृ. Yes! It isए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५`!

Line 35 (Footnote line 3):
६२५); चौथी में हिएरटिक अंक ( १ से ३०० तक ए. ब्रि ; जि. १७, पृ. ६२५ से और ४०० से ४००० तक वू ; इं. सू ; संख्या ३,
Wait, let's look at

अंक. ११५
नवीन शैली के अंक.
नवीन शैली के अंकक्रम में १ से ६ तक के लिये ६ अंक और खाली स्थान का सूचक
शून्य ० है. इन्हीं १० चिह्नों से अंकविद्या का समस्त व्यवहार चलता है. इस शैली में
प्राचीन शैली की नांई प्रत्येक अंक नियत संख्या का ही सूचक नहीं है किंतु प्रत्येक अंक इकाई,
दहाई, सैंकड़े आदि प्रत्येक स्थान पर आ सकता है और स्थान के अनुसार दाहिनी ओर
से बाईं ओर हटने पर प्रत्येक अंक का स्थानीय मुख्य दसगुना बढ़ता जाता है, जैसे ११११११
में छहों अंक १ के ही हैं परंतु पहिले से (दाहिनी ओर से लेने से) १, दूसरे से १०,
तीसरे से १००, चौथे से १०००, पांचवें से १०००० और छठे से १००००० का बोध होता
है. इसीसे इस संख्यासूचकक्रम को दशगुणोत्तर संख्या कहते हैं, और वर्तमान समय में
बहुधा संसार भर का अंकक्रम यही है.
यह अंकक्रम भारतवर्ष में कब से प्रचलित हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता.
प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो
प्राचीन शैली से ही अंक लिखे मिलते हैं. नवीन शैली से लिखे हुए अंक पहिलेपहल कलचुरि
सं. ३४६ १ (ई. स. ५६५) के दानपत्र में मिलते हैं, जिसके पीछे ई. स. की १० वीं शताब्दी
के मध्य के आस पास तक कहीं प्राचीन और कहीं नवीन शैली के अंकों का व्यवहार है.
उसके बाद नवीन शैली ही मिलती है. परंतु ज्योतिष के पुस्तकों में ई. स. की छठी शताब्दी
से बहुत पूर्व इस शैली का प्रचार होना पाया जाता है क्योंकि शक सं. ४२७२ (ई. स. ५०५)
में वराहमिहर ने 'पंचसिद्धांतिका' नामक ग्रंथ लिखा जिसमें सर्वत्र नवीन शैली से ही
अंक दिए हैं. यदि उस समय नवीन शैली का व्यवहार सामान्य रूप से न होता तो वराहमिहर
अपने ग्रंथ में नवीन शैली से अंक न देता. इससे निश्चित है कि ई. स. की पांचवीं शताब्दी के अंत
के आसपास तो नवीन शैली से अंक लिखने का प्रचार सर्वसाधारण में था परंतु शिलालेख और
दानपत्रों के लिखनेवाले प्राचीन शैली के ढर्रे पर ही चलते रहे हों जैसा कि इस देश में हर
बात में होता आया है. वराहमिहर ने 'पंचसिद्धांतिका' में पुलिश, रोमक, वसिष्ठ, सौर (सूर्य)
१. संखेडा से मिले हुए गुर्जरवंशी किसी राजा के उक्त दानपत्र में संवत् 'संवत्सरशतत्रयं (ये) षट्चत्वारिंशो-
(शदु) त्तरके । ३४६' दिया है. जी. आर. के ने अपनी 'इंडिअन् मॅथेमॅटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र) नामक पुस्तक में
उक्त ताम्रपत्र के विषय में लिखा है कि 'वह संदेहरहित नहीं है' और टिप्पण में लिखा है कि 'ये अंक पीछे से जोड़े गये
हैं' (पृ. ३१). मि. के का यह कथन सर्वथा स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उक्त दानपत्र को संदिग्ध मानने के
लिये कोई कारण नहीं है और न कोई कारण मि. के ने ही बतलाया है. इसी तरह अंकों के पीछे से जोड़ने का कथन भी
स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि जब संवत् शब्दों में दिया ही था तो पीछे से फिर उसको अंकों में बनाने की आवश्यकता ही
न थी. हरिलाल हर्षदराय ध्रुव ने, जिसने उसका संपादन किया है, मूल ताम्रपत्र को देखा था परंतु उक्त विद्वान् को उन
अंकों का पीछे से बनाया जाना मालूम न हुआ और न उसके फोटो पर से ऐसा पाया जाता है. मि. के की भारतीय
गणितशास्त्र को नवीन ठहराने की खैंचतान ने ही इस और ऐसी ही और प्रमाणशून्य कल्पनाओं की सृष्टि कर दी है जिस-
का कुछ परिचय आगे दिया जायगा. शब्दों और अंकों दोनों में संवत् देने की परिपाटी प्राचीन है और कई लेखादि में
मिलती है, जैसे कि छार (चार) गांव से मिले हुए राजा हुविष्क के लेख में हुविस्क (ष्क) स्य स(सं)वत्सर चत(तु)र्विंश
४०' (आ. स. रि; ई. स. १९०८-६, प्लेट ५६); गिरनार के पास के चट्टान पर खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख में 'वर्षे
द्विसप्ततितमे ७० २' (एं. इं. जि. ८, पृ. ४२) आदि.
२. ड; कौ. ई; पृ. ३८. सु; ग. त; पृ. १३. 'खंडखाद्य' की टीका में आमराज ने वराहमिहर की मृत्यु शक सं. ५०६
(ई. स. ५८७) में होना लिखा है वह विश्वास योग्य नहीं है (सु; ग. त; पृ. १३).
३. सप्ताश्विवेद (४२७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका, अध्याय १, आर्या ८). रोमकसूर्यो व्युष्णात्
खतिथि (१५०) युजातः पंचकतुं (६५) परिवींजात । सप्ताष्टकप्रमक्तंत्रिधो (५४७८०) हुतानाममार्कः सः (पंच; ८ । ९) आदि.

११६ प्राचीनलिपिमाला.
और पितामह इन पांच सिद्धांत ग्रंथों का तो करणरूप से वर्णन किया है; और लाटाचार्य¹
(लाटदेव), सिंहाचार्य,² सहाचार्य के गुरु³ (जिसका नाम नहीं दिया), आर्यभट⁴, प्रद्युम्न⁴ और
विजयनंदिन्⁴ के प्रसंगवशात् नाम तथा मत दिये हैं, जिससे पाया जाता है कि ये ज्योतिष के
आचार्य 'पंचसिद्धांतिका' की रचना से पूर्व के हैं, परंतु खेद की बात यह है कि न तो वराह-
मिहिर के वर्णन किये हुए पांच सिद्धांतों में से एक भी अब उपलब्ध⁵ है और न आर्यभट⁴
(प्रथम) के सिवाय लाटाचार्य आदि किसी आचार्य का कोई ग्रंथ मिलता है, जिससे उनकी अंकशैली
का निर्णय हो सके. इस समय 'पुलिशसिद्धांत' नामक कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है परंतु भट्टोत्पल
ने वराहमिहिर की बृहत्संहिता की टीका में कई जगह 'पुलिशसिद्धांत' से वचन उद्धृत किये हैं और
एक स्थल में 'मूलपुलिशसिद्धांत' के नाम से एक श्लोक भी उद्धृत किया है. उन दोनों में
अंक वर्तमान⁷ शैली से ही मिलते हैं. इससे पाया जाता है कि वराहमिहिर से पूर्व भी इस
शैली का प्रचार था. बख्शाली (युसफ़ज़ई जिले, पंजाब में) गांव से अंकगणित का एक
भोजपत्र पर लिखा हुआ प्राचीन पुस्तक ज़मीन से गड़ा हुआ मिला है जिसमें अंक नवीन शैली से
ही दिये हैं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने उसकी रचना का काल ई. स. की तीसरी अथवा
चौथी शताब्दी⁸ होना अनुमान किया है. इस पर डॉ. बूलर ने लिखा है कि 'यदि होर्नले का
अंकगणित की प्राचीनता का यह बहुत संभावित अनुमान ठीक हो तो उस [अंकक्रम] के
निर्माण का समय ई. स. के प्रारंभकाल अथवा उससे भी पूर्व का होगा'⁹. अभी तक तो नवीन
शैली के अंकों की प्राचीनता का यहीं तक पता चलता है.
१. पंचभो द्वावाद्यौ व्याख्यातौ लाटदेवेन (पंच० १।३).
२. लाडाचार्येणोक्तो यवनपुरे चास्तगे सूर्ये। रव्युदये लंकायां सिंहाचार्येण दिनगणोऽभिहितः। (१४।४४).
३. यवनानां निशि दशभिर्गतैर्मुहूर्तैश्च तद्गुरुणा। लंकाधीरात्रसमये दिनप्रवृत्तिं जगाद चार्यभटः (१४।४५).
४. प्रद्युम्नो भूतनयं जीवे सौरे च विजयनंदी (१४।५६).
५. जो 'सूर्यसिद्धांत' इस समय उपलब्ध है वह वराहमिहिर का वर्णन किया हुआ उक्त नाम का सिद्धांत नहीं किंतु
उससे भिन्न और पिछला है.
६. आर्यभट (प्रथम) ने, जिसका जन्म ई. स. ४७६ में (ड; क्रॉ. इं; पृ. ३४. सु; ग. त; पृ. २) हुआ था, 'आर्य-
भटीय' (आर्यसिद्धांत) नामक ग्रंथ बनाया, जिसको डॉ. कर्न ने ई. स. १८७४ में हॉलैंड देश के लेडन नगर में छपवाया है.
उसमें अंक न तो शब्दों में और न अंकों में दिये हैं किंतु सर्वत्र अक्षरों से दिये हैं जिनका क्रम नवीन शैली से ही है.
७. तिथ्यंशापाः खवह्न्यदिकलह्यात्मकमुव्यग्मरपचाः (२५०८२९८०); खंबरगगनवियच्छून्यिगखविवरमगंजैडुभिः (१०६९००००) शशिरुव तस्य
(शंकर बालकृष्ण दीक्षितरचित 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र, पृ. १६२) आदि; ये वचन 'पुलिशसिद्धांत' से भट्टोत्पल ने
उद्धृत किये हैं. खखाष्टमुनिरामाश्विन भावस्वररा चियाः (१७८२२९२६००) । भानां चतुर्युगेनैते परिवर्त्तः प्रकीर्त्तितः (वही, पृ. १६३).
यह वचन भट्टोत्पल के अनुसार, 'मूलपुलिशसिद्धांत' से है.
८. इं. ऐं; जि. १७, पृ. ३६.
९. बू; इं. पे; पृ. ८२. मि. के ने ई. स. १८०७ के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के जर्नल में (पृ. ४७५-५०८) 'नोट्स ऑन इंडि-
यन् मेथैमैटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र पर टिप्पण) नामक विस्तृत लेख में यह बतलाने का यत्न किया है कि भारतीय गणित
शास्त्र अब तक जितना प्राचीन माना गया है उतना प्राचीन नहीं है और उसी लेख में भारतवर्ष के नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों
के विषय में लिखा है कि 'हम पूरी सत्यता के साथ कह सकते हैं कि हिंदुओं के गणित शास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के
पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (पृ. ४६३). मि. के के इस कथन
में कुछ भी वास्तविकता नहीं है केवल हठधर्मी ही है क्योंकि ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ के आचार्य वराहमिहिर *

  • द्विवनं शशिरस(६१)भक्तं द्वादशहीनं दिवसमानं (पंचसिद्धान्तिका १२।५). सप्ताब्धिवेद(४२७)संख्यं शककालमपास्य चैत्रशु-
    क्लादौ (पं. सि; १।८). रोमक्रहणे द्वागणात खतिथ्य (१५०) भजात पंचकृतुं (६५) परिशोध्यातः । सप्ताष्टकषट्तर्केंदियो (४७८८०) हता-
    न्मासाकंसः (पं. सि; ८।१). रोमक्रयुग्मकं दोषंर्व्याख्यानगणंचचतुष्पंचः (२८५०) । संदियदिशो (१५०) घिमासाः खरकुसविषयाद्य-
    (३६५४०) प्रजयाः (पं. सिं; १।१५). आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्द्विकपंचद्वियुतः (२५२६) शककालस्तस्य
    राज्ञश्च (वाराहीसंहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३). क्या उपर्युक्त उदाहरण, जिनमें कई जगह शून्य (०) का भी प्रयोग हुआ
    है, वराहमिहिर के समय अर्थात् ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ में नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना नहीं बतलाते?
    CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri

अंक ११७
शून्य की योजना कर नव अंकों से गणित शास्त्र को सरल करनेवाले नवीन शैली के
अंकों का प्रचार पहिलेपहल किस विद्वान् ने किया इसका कुछ भी पता नहीं चलता. केवल
यही पाया जाता है कि नवीन शैली के अंकों की सृष्टि भारतवर्ष में हुई. फिर यहां से अरबों
ने यह क्रम सीखा और अरबों से उसका प्रवेश यूरोप में हुआ, जिसके पहिले चाल्डिअन्,
हिब्रू, ग्रीक, अरब आदि एशिया और यूरोप की जातियां वर्णमाला के अक्षरों से अंकों का
काम लेती थीं. अरबों के यहां खलिफ़ वलीद के समय ( ई. स. ७०५-७१५ ) तक अंकों का
प्रचार न था^१ जिसके बाद उन्होंने भारतवासियों से अंक लिये.
इस विषय में 'एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोश में लिखा
है कि 'यह सर्वथा निःसंशय है कि हमारे (अंग्रेज़ी) वर्तमान दशगुणोत्तर अंकक्रम की उत्पत्ति
भारतीय है. संभवतः खगोलसंबंधी उन सारणियों के साथ, जिनको एक भारतीय राजदूत
ई. स. ७७३ में बगदाद में लाया था, भारतवासियों से उसका प्रवेश अरबों में हुआ. वस्तुतः
और सातवीं शताब्दी के लल्ल^† तथा ब्रह्मगुप्त^‡ के ग्रंथों में सैकड़ों जगह नवीन शैली से दिये हुए अंक
मिलते हैं जिनको देखे बिना ही यह मनमानी कल्पना की गई है. प्राचीन लेख और दानपत्रों में यद्यपि अंक
विशेष कर शब्दों में दिये जाते हैं तो भी ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास से कहीं नवीन शैली से दिये हुए भी
मिलते हैं. मि. के ने ई. स. ५६४ से लगा कर ८८२ तक के १६ लेखों की सूची अपने उक्त लेख में दी है जिनमें अंक नवीन
शैली से दिये हुए हैं परंतु उनमें से प्रत्येक के अंकों में कुछ न कुछ दूषण लगा कर एक का भी ठीक होना स्वीकार नहीं किया
(पृ. ४८२-८६) जिसका कारण यही है कि वे लेख उक्त कथन के विरुद्ध १० वीं शताब्दी से बहुत पूर्व के लेखों में भी नवीन
शैली के अंकों का प्रचार होना सिद्ध करते हैं. कोई कोई ताम्रपत्र जाली भी बने होते हैं क्योंकि उनसे भूमि पर अधिकार रहता
है परंतु शिलालेखों का बहुधा भूमि से संबंध होता ही नहीं इस लिये उनको कृत्रिम बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहती.
शेरगढ़ (कोटाराज्य में) के दरवाज़े के पास की तिबारी की सीढ़ियों के पास एक ताक़ में लगे हुए सामंत देवदत्त के वि.
सं. ८४७ (ई. स. ७६१) के लेख को मैंने देखा है उसमें नवीन शैली के संवत् के अंक बहुत स्पष्ट हैं. डॉ. फ़्लीट ने उसके
संवत् के अंश की प्रतिकृति छापी है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३५१) जिसमें भी संवत् के अंक स्पष्ट हैं (डॉ. फ़्लीट ने ८४६ पढ़ा
है वह अशुद्ध है). प्रतिहार नागभट के समय के बुचकला (जोधपुर राज्य में) के वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) के शिला-
लेख के संवत् के अंक (ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट), ग्वालियर से मिले हुए प्रतिहार भोजदेव के समय के
ई. स. ८७० के आस पास के शिला लेख के (जिसमें संवत् नहीं दिया) १ से २६ तक श्लोकांक (आ. स. ई; ई. स. १८०३-
४, सेट ७२) और वहीं से मिले हुए उसी राजा के समय के वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७६) के शिलालेख में दिये हुए ६३३,
१८७ और ५० के अंक सब के सब नवीन शैली से ही हैं (ऐं. इं; जि. १, पृ. १६० के पास का सेट). इन सब लेखों की उत्तम
प्रतिकृतियां छपी हैं. उनमें दिये हुए अंकों को कोई विद्वान् संशययुक्त नहीं कह सकता. ऐसी दशा में मि. के की उपर्युक्त
“पूर्ण सत्यता” में वास्तविक सत्यता का अंश कितना है इसका पाठक लोग स्वयं विचार कर सकेंगे.
१. पहिले ६ अक्षरों से १ से ६ तक के अंक, उनके बाद के ६ अक्षरों से १० से ६० तक की दहाइयों के अंक और
बाकी के अक्षरों से १००, २०० आदि के अंक बतलाये जाते थे. जब वर्णमाला के अक्षर पूरे हो जाते तब फिर उन्हीं के
ऊपर चिह्न लगा कर १००० तक सूचित करने के लिये उनको काम में लाते थे. ग्रीक लोगों में १०००० तक के लिये अक्षर
संकेत थे परंतु रोमन लोगों में १००० तक के ही. रोमन अक्षरों से अंक लिखने का प्रचार अब तक यूरोप में कुछ कुछ बना
हुआ है और बहुधा घड़ियों में घंटों के अंकों और पुस्तकों में कभी कभी सन् के अंक तथा सेटों की संख्या आदि में उसका
व्यवहार होता है. अरबों में भारतीय अंक ग्रहण करने के पहिले अक्षरों से ही अंक बतलाये जाते थे, जिसको 'अबजद'
(हिब्रू वर्णमाला के पहिले ४ अक्षरों के उच्चारणों-अ, ब, ज और द-से) कहते हैं. उन्होंने यह अक्षरसंकेत ग्रीकों से सीखा
था. अरबी से फ़ारसी में उसका प्रयोग होने लगा और हिंदुस्तान के मुसलमानों के समय के फ़ारसी लेखों तथा पुस्तकों में
कभी कभी अंकसूचक अक्षरों से शब्द बना कर सन् का अंक बतलाया हुआ मिलता है, जैसे कि 'वफ़ात् फीरोज़ (फ़ीरोज़
का देहांत) = हिजरी सन् ७६०; 'मस्जिद जामिउल् शर्क=हिजरी सन् ८५२ आदि (क; ई. इं; पृ. २२६).
२. ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२४, टिप्पण २.
† शाके नखाब्धि (४२०) रचिते शशिनी चदस्रै (२५) स्तत्तुं गतः कतशिवै (११४) समसः षडंकैः (६६) । शैलाग्निभिः (३७) सुरगुरोर्गणि ते
सितोऽक्षान् प्रोध्यं त्रिपंचकु (१५३) द्धते ऽशराश्वि (२५) भक्ते ॥ १८ ॥ स्तंबरसांबुधि (४८) हते क्षितिनंदनस्य सूर्यात्मजस्य गणितं खरलोचने-
(२०) घ्न । व्योमाग्निवेद (४३०) निहते विदधीत लब्धं शीतांशुकून चल तुंग कलासुवृद्धिं ॥ १६ ॥ ( शिष्यधीवृद्धिदतंत्र, उत्तराधिकार).
‡ पंचांबराणि गुणगुण पंचसु निक्षर शरे (५००५५६०००००) सिंगताः शशिनः । भौमस्य द्वियसशराल्पच व सुरसनवद्वियमाः (२२६६८२८५२२)
॥ १६ ॥ ( ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, मध्यमाधिकार ).

११८ प्राचीनलिपिमाला.
ई. स. की नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में प्रसिद्ध अबुजफ़र मुहम्मद अल् ख़्वारिज़्मी ने अरबी
में उक्त क्रम का विवेचन किया और उसी समय से उसका प्रचार...अरबों में बढ़ता रहा.'
'यूरोप में शून्यसहित यह पूरा [अंक] क्रम ई. स. की १२ वीं शताब्दी में अरबों से
लिया गया और इस क्रम से बना हुआ अंकगणित 'अल्गोरिद्मस्' (अल्गोरिथम्) नाम से
प्रसिद्ध हुआ. यह (अल्गोरिद्मस्) विदेशी शब्द 'अल्ख्वारिज़्मी' का अक्षरांतर मात्र है जैसा
कि रेनॉड ने अनुमान किया था, और उक्त अरब गणितशास्त्रवेत्ता के अनुपलब्ध अंकगणित के
पुस्तक के कैंब्रिज से मिले हुए अद्वितीय हस्तलिखित लैटिन अनुवाद के, जो संभवतः बाथ-
निवासी ऐडेलहर्ड का किया हुआ है, प्रसिद्ध होने के बाद वह (अनुमान) प्रमाणित हो गया
है. ख़्वारिज़्मी के अंकगणिन के प्रकारों को पिछले पूर्वीय विद्वानों ने सरल किया और उन
अधिक सरल किये हुए प्रकारों का पश्चिमी यूरोप में पीसा के लेओनार्डो ने और पूर्वी में
मॅक्सिमस् प्लॅनुडेस ने प्रचार किया. 'ज़िरो' शब्द की उत्पत्ति अरबी के 'सिफ़र' शब्द से,
लिओनार्डो के प्रयुक्त किये हुए 'ज़िफ़िरो' शब्दद्वारा, प्रतीत होती है२'.
भारतीय अंकों से अरबों के और उनसे यूरोप के अंकों की सर्वमान्य उत्पत्ति के विरुद्ध
मि. के ने उपर्युक्त लेख के प्रारंभ में ही लिखा है कि 'यह कहा जाता है कि हमारे अंकगणित
के अंकों की उत्पत्ति भारतीय है. पीकॉक, चॅसल्स, वोप्के, कँटोर, बेले, बूलर, मॅकडोनेल और दूसरे
लेखक प्रायः निश्चय के साथ यही कहते हैं और विश्वकोशों तथा कोशों का यही कथन है.
तो भी इस समय जो सामग्री उपलब्ध है उसकी सावधानी के साथ परीक्षा करने से यह
पाया जाता है कि उन (अंकों) की भारतीय उत्पत्ति की कल्पना उचित प्रमाण से रहित है.
वैसी परीक्षा यही बतलाती है कि उन कथनों में से बहुत से निस्सार हैं' (बंगा.ए.सो.ज;
ई. स. १६०७, पृ. ४७५). अरबी में अंकों को 'हिंदसे' कहते हैं जिसका अबतक के विद्वान्
हिंद (हिंदुस्तान) से लिये जाने के कारण ऐसा कहलाना मानते हैं, परंतु मि. के का कथन
है कि 'शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र का बड़ा ज्ञाता फ़ीरोज़ आबादी (ई. स. १३२६-१४१४) 'हिंदसह'
शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' से होना बतलाता है, जिसका अर्थ परिमाण है. हरेक आदमी
विचार सकता है कि यह काफ़ी अच्छा प्रमाण है परंतु भारतवर्ष के विषय में लिखनेवालों में
से अधिकतर ने इसे स्वीकार नहीं किया' (पृ. ४८६). इसी तरह इब्न सिना के वर्गसंख्या-
विषयक नियम में लिखे हुए 'फ़ी अलतरीक अल्हिंदसे' और उसीके घनसंख्याविषयक
नियम में दिये हुए 'अल्हिसाब अल्हिंदसे' में 'हिंदसे' शब्दों का हिंद (हिंदुस्तान) से कोई
संबंध न बतलाने का यत्न किया है (पृ. ४६०). मि. के का यह कथन भी स्वीकार करने
योग्य नहीं है और वैसा ही है जैसा कि उपर्युक्त यह कथन कि 'हिंदुओं के गणितशास्त्र भर में
ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना
का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण ६). ऐसे कथनों का प्रतिवाद कर
लेख को बढ़ाने की हम आवश्यकता नहीं समझते. प्रसिद्ध विद्वान् अल्बेरूनी ने, अपनी भारतवर्ष
संबंधी तहक़ीक़ात की अरबी पुस्तक में, जो ई. स. १०३० के आस पास लिखी गई थी, लिखा


१. अरबों के द्वारा भारतीय अंकों का यूरोप में प्रवेश हुआ उससे बहुत पहिले अर्थात् ई. स. की ४ थी शताब्दी के
आस पास 'नियो-पिथागोरियन' नामक अध्यात्म विद्या के उपदेशक, संभवतः अलेक्ज़ेंड्रिया (मिसर में) की तरफ़ भारतीय
अंकों का ज्ञान प्राप्त कर, उनको यूरोप में ले गये परंतु उनका प्रचार अधिक न बढ़ा और वे सार्वदेशिक न हुए. यूरोप में
भारतीय अंकों का वास्तविक प्रचार स्पेन पर अरबों का अधिकार होने के बाद अरबों के द्वारा ही हुआ. इसीसे यूरोप के
वर्तमान अंकों को 'अरेबिक़ (अरबों के) अंक' कहते हैं.
२. प. ब्रि.; जि. १७, पृ. ६२६.

अंक. ११६
है कि 'हिंदूलोग अपनी वर्णमाला के अक्षरों को अंकों के स्थान में काम में नहीं लाते जैसे कि हम
हिब्रु वर्णमाला के क्रम से अरबी अक्षरों को काम में लाते हैं. हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों
में जैसे अक्षरों की आकृतियां भिन्न हैं वैसे ही संख्यासूचक चिह्नों की भी, जिनको अंक कहते
हैं, भिन्न हैं. जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये
गये हैं...जिन भिन्न भिन्न जातियों से मेरा संपर्क रहा उन सबकी भाषाओं के संख्यासूचक
क्रम के नामों ( इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि ) का मैंने अध्ययन किया है जिससे मालूम हुआ
कि कोई जाति हज़ार से आगे नहीं जानती. अरब लोग भी हज़ार तक [नाम] जानते हैं...इस
विषय में मैंने एक अलग पुस्तक लिखा है. अपने अंकक्रम में जो हज़ार से अधिक जानते हैं
वे हिंदू हैं...वे संख्यासूचक क्रम को १८ वें स्थान तक ले जाते हैं जिसको 'परार्द्ध' कहते हैं.
.......अंकगणित में हिंदू लोग अंकों का उसी तरह प्रयोग करते हैं जैसे कि हम करते हैं. मैंने
एक पुस्तक लिख कर यह बतलाया है कि इस विषय में हिंदू हमसे कितने आगे बढ़े हुए हैं'१.
अलबेरूनी का, जो अरबों तथा हिंदुओं के ज्योतिष और गणितशास्त्र का अपूर्व ज्ञाता था
और जिसने कई बरस तक हिंदुस्तान में रहकर संस्कृत पढ़ा था इतना ही नहीं किंतु जो संस्कृत में
अनुष्टुभ छंद भी बना लेता था और जिसको इस देश का व्यक्तिगत अनुभव था, यह कथन कि
'जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं,' मि. के
के विचार में ठीक न जचा परंतु १५ वीं शताब्दी के आसपास के शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र के ज्ञाता
फ़ीरोज़ अबादी का, जो गणितशास्त्र का ज्ञाता न था, 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह'
शब्द से बतलाना ठीक जच गया जिसका कारण यही है कि पहिले का लेख मि. के के विरुद्ध
और दूसरे का अनुकूल था. 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोष की
१७ वीं जिल्द के ६२६ वें पृष्ठ पर नानाघाट के लेख के, भारतीय गुफ़ाओं के लेखों के और १० वीं
शताब्दी के नागरी के अंक दिये हैं और उनके नीचे ही शीराज़ में लिखी हुई १० वीं शताब्दी की एक अरबी
पुस्तक के भी अंक दिये हैं जो वस्तुतः प्राचीन नागरी ही हैं; उनमें केवल ४ के अंक को टेढ़ा और ७
को उलटा लिखा है बाकी कोई अंतर नहीं है. अरबी, फारसी और उर्दू तक के अंक, उन लिपियों
की लेखनशैली तथा सेमेटिक अंकों के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर न लिखे जा कर हिंदू रीति
से ही बाईं ओर से दाहिनी ओर अब तक लिखे जाते हैं. ऐसी दशा में अलबेरूनी और मि. के में
से किसका कथन यथार्थ है यह पाठक लोग स्वयं जान सकेंगे.
शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली.
आर्य लोगों में वेदमंत्रों में स्वरों की अशुद्धि यजमान के लिये नाश का हेतु मानी जाती.
थी इस लिये वेदों का पठन गुरु के मुख से ही होता था और वे रट रट कर स्वरसहित कंठस्थ
किये जाते थे (देखो, ऊपर पृ. १३-१४). उसी की देखादेखी और शास्त्र भी कंठस्थ किये जाने
लगे और मुखस्थ विद्या ही विद्या मानी जाने लगी. इसी लिये सूत्रग्रंथों की संक्षिप्त शैली से
रचना हुई कि वे आसानी से कंठ किये जा सकें और इसी लिये ज्योतिष, गणित, वैद्यक और
कोश आदि के ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे जाने लगे. अन्य विषय के ग्रंथों में तो अंकों का
विशेष काम नहीं रहता था परंतु ज्योतिष और गणित संबंधी ग्रंथों में लंबी लंबी संख्याओं को
१. सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७४, १७७.

१२० प्राचीनलिपिमाला.
श्लोकों में लाने में कठिनता रहती थी जिसको सरल करने के लिये संभवतः उक्त शास्त्रों के आचार्यों ने
संख्यासूचक सांकेतिक शब्द स्थिर किये हों. ये सांकेतिक शब्द मनुष्य के अंग, छंदों अथवा उनके
चरणों के अक्षर, देवता, साहित्य के अंग, ग्रह, नक्षत्र आदि एवं संसार के अनेक निश्चित पदार्थों
की संख्या पर से कल्पित किये गये हैं. प्रत्येक नाम के लिये संस्कृत भाषा में अनेक शब्द होने
से प्रत्येक संख्या के लिये कई शब्द मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं—
०=शून्य, ख, गगन, आकाश, अंबर, अभ्र, वियत, व्योम, अंतरिक्ष, नभ, पूर्ण, रंध्र आदि.
१=आदि, शशि, इंदु, विधु, चंद्र, शीतांशु, शीतरश्मि, सोम, शशांक, सुधांशु, अब्ज, भू, भूमि,
क्षिति, धरा, उर्वरा, गो, वसुंधरा, पृथ्वी, क्ष्मा, धरणी, वसुधा, इला, कु, मही, रूप, पितामह, नायक,
तनु आदि.
२=यम, यमल, अश्विन, नासत्य, दस्र, लोचन, नेत्र, अक्षि, दृष्टि, चक्षु, नयन, ईक्षण, पक्ष,
बाहु, कर, कर्ण, कुच, ओष्ठ, गुल्फ, जानु, जंघा, द्वय, द्वंद्व, युगल, युग्म, अयन, कुटुंब, रविचंद्रौ आदि.
३=राम, गुण, त्रिगुण, लोक, त्रिजगत्, भुवन, काल, त्रिकाल, त्रिगत, त्रिनेत्र, सहोदराः,
अग्नि, वह्नि, पावक, वैश्वानर, दहन, तपन, हुताशन, ज्वलन, शिखिन्, कृशानु, होतृ आदि.
४=वेद, श्रुति, समुद्र, सागर, अब्धि, जलधि, उदधि, जलनिधि, अंबुधि, केंद्र, वर्ण, आश्रम,
युग, तुर्य, कृत, अय, आय, दिश् (दिशा) बंधु, कोष्ठ, वर्ण आदि.
५=बाण, शर, सायक, इषु, भूत, पर्व, प्राण, पांडव, अर्थ, विषय, महाभूत, तत्व, इंद्रिय,
रत्न आदि.
६=रस, अंग, काय, ऋतु, मासार्ध, दर्शन, राग, अरि, शास्त्र, तर्क, कारक आदि.
७=नग, अग, भूभृत्, पर्वत, शैल, अद्रि, गिरि, ऋषि, मुनि, अत्रि, वार, स्वर, धातु, अश्व, तुरग,
बाजि, छंद, धी, कलत्र, आदि.
८=वसु, अहि, नाग, गज, दंति, दिग्गज, हस्तिन्, मातंग, कुंजर, द्विप, सर्प, तक्ष, सिद्धि, भूति,
अनुष्टुभ्, मंगल आदि.
९=अंक, नंद, निधि, ग्रह, रंध्र, छिद्र, द्वार, गो, पवन आदि.
१०=दिश, दिशा, आशा, अंगुलि, पंक्ति, ककुभ, रावणशिरम्, अवतार, कर्मन् आदि.
११=रुद्र, ईश्वर, हर, ईश, भव, भर्ग, शूलिन्, महादेव, अक्षौहिणी आदि.
१२=रवि, सूर्य, अर्क, मार्तंड, द्युमणि, भानु, आदित्य, दिवाकर, मास, राशि, व्यय आदि.
१३=विश्वेदेवाः, काम, अतिजगती, अघोष आदि.
१४=मनु, विद्या, इंद्र, शक्र, लोक आदि.
१५=तिथि, घस्र, दिन, अहन्, पक्ष आदि.
१६=नृप, भूप, भूपति, अष्टि, कला आदि.
१७ = अत्यष्टि. १८ = धृति. १९ = अतिधृति. २० = नख, कृति.
२१ = उत्कृति, प्रकृति, स्वर्ग. २२ = कृती, जाति. २३ = विकृति.
२४ = गायत्री, जिन, अर्हत्, सिद्ध आदि. २५ = तत्व. २७ = नक्षत्र, उड्डु, भ आदि.
३२ = दंत, रद आदि. ३३ = देव, अमर, त्रिदश, सुर आदि.
४० = नरक. ४८ = जगती. ४६ = तान.

... wait:
"शरऋषिरसाः" or "शरऋषिरुद्राः"?
Wait, look at the letters:
"शर"
then: "ऋ" or "हृ"? "ऋषि"
then: "रसाः"?
Wait, look at the end of line 34:
"शरऋषिरसाः" or "शरऋषिरगाः"?
Wait, look at the top right of L34:
"शरऋषिरसाः (सुवदना की"
Then L35:
"यति). वसुग्रहर्त्तषयः" or "वसुग्रहर्क्षयः"?
Wait, let's check Bhujangavijrimbhita:
Bhujangavijrimbhita has 26 syllables:
यति at: 8 (वसु), 9 (ग्रह), 9? Or 8, 9, 9 = 26?
8 = वसु
9 = ग्रह
Wait, what is 9? अर्क? No, 8 + 9 + 9 = 26? Or 8 + 8 + 10?
In L35: "वसुग्रह..." let's look at the letters:
व - सु - ग्र - ह - र्क्ष - यः? Or "वसुग्रहर्त्तयः"?
Wait, what is the word before (भुजंगविजृंभित की यति)?
"वसुग्रहर्क्षयः" or "

१२२ प्राचीनलिपिमाला.
क् = १. ख् = २. ग् = ३. घ् = ४. ङ् = ५. च् = ६. छ् = ७. ज् = ८. झ् = ९. ञ् = १०.
ट् = ११. ठ् = १२. ड् = १३. ढ् = १४. ण् = १५. त् = १६. थ् = १७. द् = १८. ध् = १९.
न् = २०. प् = २१. फ् = २२. ब् = २३. भ् = २४. म् = २५. य् = ३०. र् = ४०. ल् = ५०.
व् = ६०. श् = ७०. ष् = ८०. स् = ९०. ह् = १००. अ = १. इ = १००. उ = १००००.
ऋ = १००००००. ऌ = १००००००००. ए = १००००००००००. ऐ = १००००००००००००.
ओ = १००००००००००००००. औ = १००००००००००००००००.

इस शैली में स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है. व्यंजन के साथ जहां स्वर मिला हुआ होता
है वहां व्यंजनसूचक अंक को स्वरसूचक अंक से गुणना १ होता है और संयुक्त व्यंजन के साथ जहां
स्वर मिला होता है वहां उक्त संयुक्त व्यंजन के प्रत्येक घटक व्यंजन के साथ वही स्वर माना जाता है
[L

अंक. १२३

१२३४५६७८९०
क्ख्ग्घ्ङ्च्छ्ज्झ्ञ्
ट्ठ्ड्ढ्ण्त्थ्द्ध्न्
प्फ्ब्भ्म्
य्र्ल्व्श्ष्स्ह्[ळ्]¹
इस क्रम में केवल व्यंजनों से ही अंक सूचित होते हैं, स्वर निरर्थक या शून्यसूचक समझे
जाते हैं² और संयुक्त व्यंजन के घटक व्यंजनों में से प्रत्येक से एक एक अंक प्रकट होता है .
संस्कृत लेखकों की शब्दों से अंक प्रकट करने की सामान्य परिपाटी यह है कि पहिले शब्द से इकाई,
दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा आदि अंक सूचित किये जाते हैं (अंकानां वामतो गतिः), परंतु
आर्यभट ने अपने इस क्रम में उक्त परिपाटी के विरुद्ध अंक बतलाये हैं अर्थात् अंतिम अक्षर से
इकाई, उपांत्य से दहाई इत्यादि. इस क्रम में १ का अंक क, ट, प, या य अक्षर से प्रकट होता है
जिससे इसको 'कटपयादि' क्रम कहते हैं.
कभी कभी शिलालेखों³, दानपत्रों⁴, तथा पुस्तकों⁵ के संवत् लिखने में अंक 'कटपयादि'
क्रम से दिये हुए मिलते हैं परंतु उनकी और आर्यभट (दूसरे) की उपर्युक्त शैली में इतना अंतर
है कि उनमें 'अंकानां वामतो गतिः' के अनुसार पहिले अक्षर से इकाई, दूसरे से दहाई आदि के
अंक बतलाये जाते हैं और संयुक्त व्यंजनों में केवल अंतिम व्यंजन° अंक सूचक होता है न कि
प्रत्येक व्यंजन
१. आर्यसिद्धांत में 'ळ' नहीं है, परंतु दक्षिण में इस शैली के अंकों में उसका प्रयोग होता (इं. ऐँ. जि. ४, पृ. २०७)
है इस लिये यहां दिया गया है.
२. सप्तधीर्णा कपाधसञ्झिस्सा (१५८८८८३) मद्यसिन्नधा (५८२७०८) यनाखस्य (आ. सि. २ । ६).
३. कनकणैः (१२१५) सरर्घ (७२८) विंभजेद्वण (आ. सि; १ । ४०). स्फुटभुक्ताक्का (११) कन (१०) घनं खने (२०) रभिसे (२४४०) हृते बिंबं
(आ. सि; ५ । ५).
४. राघवाय (१४४२) गणिते शकवर्षे..॥ राघवाय १४४२ चत्तरसंज्ञ। शकाब्दे (ऐ. इं; जि. ६, पृ. १२१). ओमतोलंघवर्वे
भवति (६६४) गणसणि श्रेष्ठिराष्ट्रित्यवर्गा वचीपालो (इं. ऐँ; जि. २, पृ. ३६०). राकालोके (१३१२) शक। ब्दे सुरपतिसचिवे सिंचयाते
(इं. ऐँ; जि. २, पृ ३६१).
५. भक्त्यालोके (१३१५) शकाब्दे परिसमप्त[तिं] गन्मे श्रीमुखापा[ठ]मासे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. २२६). तत्वलोके (१३४६)
शकस्याब्दे क्रोधिंसंवत्सरे शुभे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. ३८).
६. खगोम्यान्मनवसाप (१५६५१३२) ति कलयुगधने सति । सर्वानुक्रमणीतिज्जाता वेदार्थदीपिका ॥ लक्षाणि पञ्चदश वै पञ्चषष्टिसह-
स्त्रकं । सप्तात्रिंशच्छतं चेति दिनवाक्यार्थ ईरितः ॥ (इं. ऐँ; जि. २१, पृ. ५०). इन दो श्लोकों में षड्गुरुशिष्य ने अपनी 'वेदार्थ-
दीपिका' नामक 'सर्वानुक्रमणी' की टीका की रचना कलियुग के १५६५१३२ दिन व्यतीत होने पर करना बतलाया है.
इस गणना के अनुसार उक्त टीका की रचना कलियुग संवत् ४२८५ = शक सं. ११०६ = वि. सं. १२४१ (तारीख २४ मार्च, ई.
स. ११८४) में होना पाया जाता है.
°. इसी पत्र के टिप्पण ८ में 'शक्त्यालोके' के 'क्त्या' में 'य्' के लिये १ का अंक लिया गया है और 'क्' तथा
'त्' को छोड़ दिया है. ऐसे ही उसी टिप्पण में 'तत्वलोके' के 'त्व' के 'व्' के लिये ४ का अंक लिया है, 'त्' के लिये
कुछ नहीं. ऐसे ही टिप्पण ६ में 'न्त्या' और 'न्मे' में 'य्' और 'म्' के लिये क्रमशः १ और ५ के अंक लिये हैं बाकी के
अक्षरों को छोड़ दिया है.