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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 318 में से

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पृष्ठ 137

१०८ प्राचीनलिपिमाला.
६०-जु, वु, घु, थु, र्धु, थू, र्धू, र्ध, र्धु और घु.
७०-चु, च्, थू, र्थी, घू और र्म्न.
८०-हृ, १ 𑀏, 𑀐, 𑀑, 𑀒 और पु.
९०-𑀓, 𑀔, 𑀕, 𑀖 और 𑀗.
१००-सु, सू, लु और अ.
२००-सु, सू, सु, आ, लू और र्घू.
३००-स्ता, स्त्रा, णा, सा, सु, सुं और स्वः
४००-सो, स्तो और स्ता.
ऊपर लिखे हुए अंकसूचक संकेतों में १, २ और ३ के लिये क्रमशः ए, द्वि और त्रि;
स्व, स्ति और श्री; और ओं, न और मः मिलते हैं; वे प्राचीन क्रम के कोई रूप नहीं है किंतु
पिछले लेखकों के कल्पित हैं. उनमें से ए, द्वि और त्रि तो उन्ही अंकों के वाचक शब्दों के पहिले
अक्षर हैं और स्व, स्ति और श्री तथा ओं, न और मः मंगल वाचक होने से इनको प्रारंभ के तीन
अंकों का सूचक मान लिया है. एक ही अंक के लिये हस्तलिखित पुस्तकों में कई भिन्न अक्षरों के होने
का कारण कुछ तो प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में और कुछ पुस्तकों से नक़ल करने में लेखकों की ग़लती
है, जैसे २० के अंक का रूप ‘थ’ के समान था जिसकी आकृति पीछे से ‘घ’ से मिलती हुई होने से
लेखकों ने ‘थ’ को ‘घ’, फिर ‘घ’ को ‘ध्व’ और ‘प’ पढ़ा होगा. इसी तरह दूसरे अंकों के लिये
भी अशुद्धियां हुई होंगी.
प्राचीन शिलालेखों और दानपत्रों में सब अंक एक पंक्ति में लिखे जाते थे परंतु हस्तलिखित पुस्तकों
के पन्नों में चीनी अक्षरों की नांई एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. ई. स. की छठी शताब्दी के
आस पास के मि. बावर के प्राप्त किये हुए पुस्तकों में भी पत्रांक इसी तरह एक दूसरे के नीचे लिखे
मिलते हैं. पिछले पुस्तकों में एक ही पन्ने पर प्राचीन और नवीन दोनों शैलियों से भी अंक लिखे मिलते
हैं. पत्रे की दूसरी तरफ़ के दाहिनी ओर के ऊपर की तरफ़ के हाशिये पर तो अक्षरसंकेत से,
जिसको अक्षरपल्ली कहते थे; और दाहिनी तरफ़ के नीचे के हाशिये पर नवीन शैली के अंकों से,
जिनको अंकपल्ली कहते थे. इस प्रकार के अंक नेपाल, पाटण (अणहिलवाड़ा), खंभात और उदयपुर
(राजपूताना में) आदि के पुस्तकमंडारों में रक्खे हुए पुस्तकों में पाये जाते हैं. पिछले हस्तलिखित पुस्तकों
में अक्षरों के साथ कभी कभी अंक, तथा खाली स्थान के लिये शून्य भी लिखा हुआ मिलता है,
जैसे कि ३३ = $\frac{ला}{३}$, १०० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
० \end{smallmatrix}}$, १०२ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
२ \end{smallmatrix}}$, १३१ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ला
१ \end{smallmatrix}}$, १५० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
५ \end{smallmatrix}}$, २०६ = $\frac{सू}{\begin{smallmatrix} ०
६ \end{smallmatrix}}$ आदि. नेपाल के बौद्ध, तथा
गुजरात, राजपूताना आदि के जैन पुस्तकों में यही अक्षरक्रम ई. स. की १६ वीं शताब्दी तक कहीं
कहीं मिल आता है और दक्षिण की मलयालम् लिपि के पुस्तकों ३ में अब तक अक्षरों से अंक
१. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र २१, २४, ४७).
२. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र ३८, ४२, ४४).
३. मलयालम् लिपि के पुस्तकों में बहुधा अब तक इस प्रकार अक्षरों में अंक लिखने की रीति चली आती है. डॉव.
गुंडर्ट ने अपने मलयालम् भाषा के व्याकरण (दूसरे संस्करण) में अक्षरों से बतलाये जाने वाले अंकों का ब्योरा इस तरह
दिया है—
१=न. २=ल. ३=न्य. ४=क्क. ५=ड्र. ६=हा (ह). ७=ग्र. ८=ट्रे (?). १०=म. २०=य. ३०=ल.
४०=प्त. ५०=व. ६०=च. ७०=रू (तु). ८०=च. ९०=ण. १००=ञ. (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६६, पृ. ७६०).
इनमें भी प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में गलती होना पाया जाता है जैसे कि ६ का सूचक ‘हा’, ‘फ’ को ‘ह’ पढ़ने से ही हुआ
है. उस लिपि में ‘फ’ और ‘ह’ की आकृति बहुत मिलती हुई है (देखो, लिपिपत्र ८१). ऐसे ही और भी अशुद्धियां हुई हैं.