प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंक. ११६
है कि 'हिंदूलोग अपनी वर्णमाला के अक्षरों को अंकों के स्थान में काम में नहीं लाते जैसे कि हम
हिब्रु वर्णमाला के क्रम से अरबी अक्षरों को काम में लाते हैं. हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों
में जैसे अक्षरों की आकृतियां भिन्न हैं वैसे ही संख्यासूचक चिह्नों की भी, जिनको अंक कहते
हैं, भिन्न हैं. जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये
गये हैं...जिन भिन्न भिन्न जातियों से मेरा संपर्क रहा उन सबकी भाषाओं के संख्यासूचक
क्रम के नामों ( इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि ) का मैंने अध्ययन किया है जिससे मालूम हुआ
कि कोई जाति हज़ार से आगे नहीं जानती. अरब लोग भी हज़ार तक [नाम] जानते हैं...इस
विषय में मैंने एक अलग पुस्तक लिखा है. अपने अंकक्रम में जो हज़ार से अधिक जानते हैं
वे हिंदू हैं...वे संख्यासूचक क्रम को १८ वें स्थान तक ले जाते हैं जिसको 'परार्द्ध' कहते हैं.
.......अंकगणित में हिंदू लोग अंकों का उसी तरह प्रयोग करते हैं जैसे कि हम करते हैं. मैंने
एक पुस्तक लिख कर यह बतलाया है कि इस विषय में हिंदू हमसे कितने आगे बढ़े हुए हैं'१.
अलबेरूनी का, जो अरबों तथा हिंदुओं के ज्योतिष और गणितशास्त्र का अपूर्व ज्ञाता था
और जिसने कई बरस तक हिंदुस्तान में रहकर संस्कृत पढ़ा था इतना ही नहीं किंतु जो संस्कृत में
अनुष्टुभ छंद भी बना लेता था और जिसको इस देश का व्यक्तिगत अनुभव था, यह कथन कि
'जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं,' मि. के
के विचार में ठीक न जचा परंतु १५ वीं शताब्दी के आसपास के शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र के ज्ञाता
फ़ीरोज़ अबादी का, जो गणितशास्त्र का ज्ञाता न था, 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह'
शब्द से बतलाना ठीक जच गया जिसका कारण यही है कि पहिले का लेख मि. के के विरुद्ध
और दूसरे का अनुकूल था. 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोष की
१७ वीं जिल्द के ६२६ वें पृष्ठ पर नानाघाट के लेख के, भारतीय गुफ़ाओं के लेखों के और १० वीं
शताब्दी के नागरी के अंक दिये हैं और उनके नीचे ही शीराज़ में लिखी हुई १० वीं शताब्दी की एक अरबी
पुस्तक के भी अंक दिये हैं जो वस्तुतः प्राचीन नागरी ही हैं; उनमें केवल ४ के अंक को टेढ़ा और ७
को उलटा लिखा है बाकी कोई अंतर नहीं है. अरबी, फारसी और उर्दू तक के अंक, उन लिपियों
की लेखनशैली तथा सेमेटिक अंकों के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर न लिखे जा कर हिंदू रीति
से ही बाईं ओर से दाहिनी ओर अब तक लिखे जाते हैं. ऐसी दशा में अलबेरूनी और मि. के में
से किसका कथन यथार्थ है यह पाठक लोग स्वयं जान सकेंगे.
शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली.
आर्य लोगों में वेदमंत्रों में स्वरों की अशुद्धि यजमान के लिये नाश का हेतु मानी जाती.
थी इस लिये वेदों का पठन गुरु के मुख से ही होता था और वे रट रट कर स्वरसहित कंठस्थ
किये जाते थे (देखो, ऊपर पृ. १३-१४). उसी की देखादेखी और शास्त्र भी कंठस्थ किये जाने
लगे और मुखस्थ विद्या ही विद्या मानी जाने लगी. इसी लिये सूत्रग्रंथों की संक्षिप्त शैली से
रचना हुई कि वे आसानी से कंठ किये जा सकें और इसी लिये ज्योतिष, गणित, वैद्यक और
कोश आदि के ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे जाने लगे. अन्य विषय के ग्रंथों में तो अंकों का
विशेष काम नहीं रहता था परंतु ज्योतिष और गणित संबंधी ग्रंथों में लंबी लंबी संख्याओं को
१. सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७४, १७७.