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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 318 में से

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पृष्ठ 136

प (५) से बिलकुल मिलते हुए हैं. कभी कभी अक्षरों की नांई अंकों के भी सिर बनाने से उनकी
आकृतियां कहीं कहीं अक्षरों सी बनती गईं१. पीछे से अंकचिह्नों को अक्षरों के से रूप देने की
चाल बढ़ने लगी और कितने एक लेखकों ने और विशेषकर पुस्तकलेखकों ने उनको सिरसहित
अक्षर ही बना डाला जैसा कि बुद्धगया से मिले हुए महानामन् के शिलालेख२, नेपाल
के कितने एक लेखों३ तथा प्रतिहारवंशियों के दानपत्रों४ से पाया जाता है. तो भी १, २, ३, ५०,
८० और ६० तो अपने परिवर्तित रूपों में भी प्राचीन रूपों से ही मिलते जुलते रहे और किन्हीं
अक्षरों में परिणत न हुए.
शिलालेखों और ताम्रपत्रों के लेखक जो लिखते थे वह अपनी जानकारी से लिखते थे, परंतु
पुस्तकों की नक़ल करनेवालों को तो पुरानी पुस्तकों से ज्यों का त्यों नक़ल करना पड़ता था. ऐसी
दशा में जहां वे मूल प्रति के पुराने अक्षरों या अंकों को ठीक ठीक नहीं समझ सके वहां वे अवश्य
चूक कर गये. इसीसे हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों में जो अंकसूचक अक्षर मिलते हैं उनकी संख्या
अधिक है जिनमें और कई अशुद्ध रूप दर्ज हो गये हैं.
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