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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 318 में से

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पृष्ठ 152

अंक. १२३

१२३४५६७८९०
क्ख्ग्घ्ङ्च्छ्ज्झ्ञ्
ट्ठ्ड्ढ्ण्त्थ्द्ध्न्
प्फ्ब्भ्म्
य्र्ल्व्श्ष्स्ह्[ळ्]¹
इस क्रम में केवल व्यंजनों से ही अंक सूचित होते हैं, स्वर निरर्थक या शून्यसूचक समझे
जाते हैं² और संयुक्त व्यंजन के घटक व्यंजनों में से प्रत्येक से एक एक अंक प्रकट होता है .
संस्कृत लेखकों की शब्दों से अंक प्रकट करने की सामान्य परिपाटी यह है कि पहिले शब्द से इकाई,
दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा आदि अंक सूचित किये जाते हैं (अंकानां वामतो गतिः), परंतु
आर्यभट ने अपने इस क्रम में उक्त परिपाटी के विरुद्ध अंक बतलाये हैं अर्थात् अंतिम अक्षर से
इकाई, उपांत्य से दहाई इत्यादि. इस क्रम में १ का अंक क, ट, प, या य अक्षर से प्रकट होता है
जिससे इसको 'कटपयादि' क्रम कहते हैं.
कभी कभी शिलालेखों³, दानपत्रों⁴, तथा पुस्तकों⁵ के संवत् लिखने में अंक 'कटपयादि'
क्रम से दिये हुए मिलते हैं परंतु उनकी और आर्यभट (दूसरे) की उपर्युक्त शैली में इतना अंतर
है कि उनमें 'अंकानां वामतो गतिः' के अनुसार पहिले अक्षर से इकाई, दूसरे से दहाई आदि के
अंक बतलाये जाते हैं और संयुक्त व्यंजनों में केवल अंतिम व्यंजन° अंक सूचक होता है न कि
प्रत्येक व्यंजन
१. आर्यसिद्धांत में 'ळ' नहीं है, परंतु दक्षिण में इस शैली के अंकों में उसका प्रयोग होता (इं. ऐँ. जि. ४, पृ. २०७)
है इस लिये यहां दिया गया है.
२. सप्तधीर्णा कपाधसञ्झिस्सा (१५८८८८३) मद्यसिन्नधा (५८२७०८) यनाखस्य (आ. सि. २ । ६).
३. कनकणैः (१२१५) सरर्घ (७२८) विंभजेद्वण (आ. सि; १ । ४०). स्फुटभुक्ताक्का (११) कन (१०) घनं खने (२०) रभिसे (२४४०) हृते बिंबं
(आ. सि; ५ । ५).
४. राघवाय (१४४२) गणिते शकवर्षे..॥ राघवाय १४४२ चत्तरसंज्ञ। शकाब्दे (ऐ. इं; जि. ६, पृ. १२१). ओमतोलंघवर्वे
भवति (६६४) गणसणि श्रेष्ठिराष्ट्रित्यवर्गा वचीपालो (इं. ऐँ; जि. २, पृ. ३६०). राकालोके (१३१२) शक। ब्दे सुरपतिसचिवे सिंचयाते
(इं. ऐँ; जि. २, पृ ३६१).
५. भक्त्यालोके (१३१५) शकाब्दे परिसमप्त[तिं] गन्मे श्रीमुखापा[ठ]मासे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. २२६). तत्वलोके (१३४६)
शकस्याब्दे क्रोधिंसंवत्सरे शुभे (ऐँ. इं; जि. ३, पृ. ३८).
६. खगोम्यान्मनवसाप (१५६५१३२) ति कलयुगधने सति । सर्वानुक्रमणीतिज्जाता वेदार्थदीपिका ॥ लक्षाणि पञ्चदश वै पञ्चषष्टिसह-
स्त्रकं । सप्तात्रिंशच्छतं चेति दिनवाक्यार्थ ईरितः ॥ (इं. ऐँ; जि. २१, पृ. ५०). इन दो श्लोकों में षड्गुरुशिष्य ने अपनी 'वेदार्थ-
दीपिका' नामक 'सर्वानुक्रमणी' की टीका की रचना कलियुग के १५६५१३२ दिन व्यतीत होने पर करना बतलाया है.
इस गणना के अनुसार उक्त टीका की रचना कलियुग संवत् ४२८५ = शक सं. ११०६ = वि. सं. १२४१ (तारीख २४ मार्च, ई.
स. ११८४) में होना पाया जाता है.
°. इसी पत्र के टिप्पण ८ में 'शक्त्यालोके' के 'क्त्या' में 'य्' के लिये १ का अंक लिया गया है और 'क्' तथा
'त्' को छोड़ दिया है. ऐसे ही उसी टिप्पण में 'तत्वलोके' के 'त्व' के 'व्' के लिये ४ का अंक लिया है, 'त्' के लिये
कुछ नहीं. ऐसे ही टिप्पण ६ में 'न्त्या' और 'न्मे' में 'य्' और 'म्' के लिये क्रमशः १ और ५ के अंक लिये हैं बाकी के
अक्षरों को छोड़ दिया है.