प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंक ११७
शून्य की योजना कर नव अंकों से गणित शास्त्र को सरल करनेवाले नवीन शैली के
अंकों का प्रचार पहिलेपहल किस विद्वान् ने किया इसका कुछ भी पता नहीं चलता. केवल
यही पाया जाता है कि नवीन शैली के अंकों की सृष्टि भारतवर्ष में हुई. फिर यहां से अरबों
ने यह क्रम सीखा और अरबों से उसका प्रवेश यूरोप में हुआ, जिसके पहिले चाल्डिअन्,
हिब्रू, ग्रीक, अरब आदि एशिया और यूरोप की जातियां वर्णमाला के अक्षरों से अंकों का
काम लेती थीं. अरबों के यहां खलिफ़ वलीद के समय ( ई. स. ७०५-७१५ ) तक अंकों का
प्रचार न था^१ जिसके बाद उन्होंने भारतवासियों से अंक लिये.
इस विषय में 'एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोश में लिखा
है कि 'यह सर्वथा निःसंशय है कि हमारे (अंग्रेज़ी) वर्तमान दशगुणोत्तर अंकक्रम की उत्पत्ति
भारतीय है. संभवतः खगोलसंबंधी उन सारणियों के साथ, जिनको एक भारतीय राजदूत
ई. स. ७७३ में बगदाद में लाया था, भारतवासियों से उसका प्रवेश अरबों में हुआ. वस्तुतः
और सातवीं शताब्दी के लल्ल^† तथा ब्रह्मगुप्त^‡ के ग्रंथों में सैकड़ों जगह नवीन शैली से दिये हुए अंक
मिलते हैं जिनको देखे बिना ही यह मनमानी कल्पना की गई है. प्राचीन लेख और दानपत्रों में यद्यपि अंक
विशेष कर शब्दों में दिये जाते हैं तो भी ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास से कहीं नवीन शैली से दिये हुए भी
मिलते हैं. मि. के ने ई. स. ५६४ से लगा कर ८८२ तक के १६ लेखों की सूची अपने उक्त लेख में दी है जिनमें अंक नवीन
शैली से दिये हुए हैं परंतु उनमें से प्रत्येक के अंकों में कुछ न कुछ दूषण लगा कर एक का भी ठीक होना स्वीकार नहीं किया
(पृ. ४८२-८६) जिसका कारण यही है कि वे लेख उक्त कथन के विरुद्ध १० वीं शताब्दी से बहुत पूर्व के लेखों में भी नवीन
शैली के अंकों का प्रचार होना सिद्ध करते हैं. कोई कोई ताम्रपत्र जाली भी बने होते हैं क्योंकि उनसे भूमि पर अधिकार रहता
है परंतु शिलालेखों का बहुधा भूमि से संबंध होता ही नहीं इस लिये उनको कृत्रिम बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहती.
शेरगढ़ (कोटाराज्य में) के दरवाज़े के पास की तिबारी की सीढ़ियों के पास एक ताक़ में लगे हुए सामंत देवदत्त के वि.
सं. ८४७ (ई. स. ७६१) के लेख को मैंने देखा है उसमें नवीन शैली के संवत् के अंक बहुत स्पष्ट हैं. डॉ. फ़्लीट ने उसके
संवत् के अंश की प्रतिकृति छापी है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३५१) जिसमें भी संवत् के अंक स्पष्ट हैं (डॉ. फ़्लीट ने ८४६ पढ़ा
है वह अशुद्ध है). प्रतिहार नागभट के समय के बुचकला (जोधपुर राज्य में) के वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) के शिला-
लेख के संवत् के अंक (ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट), ग्वालियर से मिले हुए प्रतिहार भोजदेव के समय के
ई. स. ८७० के आस पास के शिला लेख के (जिसमें संवत् नहीं दिया) १ से २६ तक श्लोकांक (आ. स. ई; ई. स. १८०३-
४, सेट ७२) और वहीं से मिले हुए उसी राजा के समय के वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७६) के शिलालेख में दिये हुए ६३३,
१८७ और ५० के अंक सब के सब नवीन शैली से ही हैं (ऐं. इं; जि. १, पृ. १६० के पास का सेट). इन सब लेखों की उत्तम
प्रतिकृतियां छपी हैं. उनमें दिये हुए अंकों को कोई विद्वान् संशययुक्त नहीं कह सकता. ऐसी दशा में मि. के की उपर्युक्त
“पूर्ण सत्यता” में वास्तविक सत्यता का अंश कितना है इसका पाठक लोग स्वयं विचार कर सकेंगे.
१. पहिले ६ अक्षरों से १ से ६ तक के अंक, उनके बाद के ६ अक्षरों से १० से ६० तक की दहाइयों के अंक और
बाकी के अक्षरों से १००, २०० आदि के अंक बतलाये जाते थे. जब वर्णमाला के अक्षर पूरे हो जाते तब फिर उन्हीं के
ऊपर चिह्न लगा कर १००० तक सूचित करने के लिये उनको काम में लाते थे. ग्रीक लोगों में १०००० तक के लिये अक्षर
संकेत थे परंतु रोमन लोगों में १००० तक के ही. रोमन अक्षरों से अंक लिखने का प्रचार अब तक यूरोप में कुछ कुछ बना
हुआ है और बहुधा घड़ियों में घंटों के अंकों और पुस्तकों में कभी कभी सन् के अंक तथा सेटों की संख्या आदि में उसका
व्यवहार होता है. अरबों में भारतीय अंक ग्रहण करने के पहिले अक्षरों से ही अंक बतलाये जाते थे, जिसको 'अबजद'
(हिब्रू वर्णमाला के पहिले ४ अक्षरों के उच्चारणों-अ, ब, ज और द-से) कहते हैं. उन्होंने यह अक्षरसंकेत ग्रीकों से सीखा
था. अरबी से फ़ारसी में उसका प्रयोग होने लगा और हिंदुस्तान के मुसलमानों के समय के फ़ारसी लेखों तथा पुस्तकों में
कभी कभी अंकसूचक अक्षरों से शब्द बना कर सन् का अंक बतलाया हुआ मिलता है, जैसे कि 'वफ़ात् फीरोज़ (फ़ीरोज़
का देहांत) = हिजरी सन् ७६०; 'मस्जिद जामिउल् शर्क=हिजरी सन् ८५२ आदि (क; ई. इं; पृ. २२६).
२. ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२४, टिप्पण २.
† शाके नखाब्धि (४२०) रचिते शशिनी चदस्रै (२५) स्तत्तुं गतः कतशिवै (११४) समसः षडंकैः (६६) । शैलाग्निभिः (३७) सुरगुरोर्गणि ते
सितोऽक्षान् प्रोध्यं त्रिपंचकु (१५३) द्धते ऽशराश्वि (२५) भक्ते ॥ १८ ॥ स्तंबरसांबुधि (४८) हते क्षितिनंदनस्य सूर्यात्मजस्य गणितं खरलोचने-
(२०) घ्न । व्योमाग्निवेद (४३०) निहते विदधीत लब्धं शीतांशुकून चल तुंग कलासुवृद्धिं ॥ १६ ॥ ( शिष्यधीवृद्धिदतंत्र, उत्तराधिकार).
‡ पंचांबराणि गुणगुण पंचसु निक्षर शरे (५००५५६०००००) सिंगताः शशिनः । भौमस्य द्वियसशराल्पच व सुरसनवद्वियमाः (२२६६८२८५२२)
॥ १६ ॥ ( ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, मध्यमाधिकार ).