प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ प्राचीनलिपिमाला.
और पितामह इन पांच सिद्धांत ग्रंथों का तो करणरूप से वर्णन किया है; और लाटाचार्य¹
(लाटदेव), सिंहाचार्य,² सहाचार्य के गुरु³ (जिसका नाम नहीं दिया), आर्यभट⁴, प्रद्युम्न⁴ और
विजयनंदिन्⁴ के प्रसंगवशात् नाम तथा मत दिये हैं, जिससे पाया जाता है कि ये ज्योतिष के
आचार्य 'पंचसिद्धांतिका' की रचना से पूर्व के हैं, परंतु खेद की बात यह है कि न तो वराह-
मिहिर के वर्णन किये हुए पांच सिद्धांतों में से एक भी अब उपलब्ध⁵ है और न आर्यभट⁴
(प्रथम) के सिवाय लाटाचार्य आदि किसी आचार्य का कोई ग्रंथ मिलता है, जिससे उनकी अंकशैली
का निर्णय हो सके. इस समय 'पुलिशसिद्धांत' नामक कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है परंतु भट्टोत्पल
ने वराहमिहिर की बृहत्संहिता की टीका में कई जगह 'पुलिशसिद्धांत' से वचन उद्धृत किये हैं और
एक स्थल में 'मूलपुलिशसिद्धांत' के नाम से एक श्लोक भी उद्धृत किया है. उन दोनों में
अंक वर्तमान⁷ शैली से ही मिलते हैं. इससे पाया जाता है कि वराहमिहिर से पूर्व भी इस
शैली का प्रचार था. बख्शाली (युसफ़ज़ई जिले, पंजाब में) गांव से अंकगणित का एक
भोजपत्र पर लिखा हुआ प्राचीन पुस्तक ज़मीन से गड़ा हुआ मिला है जिसमें अंक नवीन शैली से
ही दिये हैं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने उसकी रचना का काल ई. स. की तीसरी अथवा
चौथी शताब्दी⁸ होना अनुमान किया है. इस पर डॉ. बूलर ने लिखा है कि 'यदि होर्नले का
अंकगणित की प्राचीनता का यह बहुत संभावित अनुमान ठीक हो तो उस [अंकक्रम] के
निर्माण का समय ई. स. के प्रारंभकाल अथवा उससे भी पूर्व का होगा'⁹. अभी तक तो नवीन
शैली के अंकों की प्राचीनता का यहीं तक पता चलता है.
१. पंचभो द्वावाद्यौ व्याख्यातौ लाटदेवेन (पंच० १।३).
२. लाडाचार्येणोक्तो यवनपुरे चास्तगे सूर्ये। रव्युदये लंकायां सिंहाचार्येण दिनगणोऽभिहितः। (१४।४४).
३. यवनानां निशि दशभिर्गतैर्मुहूर्तैश्च तद्गुरुणा। लंकाधीरात्रसमये दिनप्रवृत्तिं जगाद चार्यभटः (१४।४५).
४. प्रद्युम्नो भूतनयं जीवे सौरे च विजयनंदी (१४।५६).
५. जो 'सूर्यसिद्धांत' इस समय उपलब्ध है वह वराहमिहिर का वर्णन किया हुआ उक्त नाम का सिद्धांत नहीं किंतु
उससे भिन्न और पिछला है.
६. आर्यभट (प्रथम) ने, जिसका जन्म ई. स. ४७६ में (ड; क्रॉ. इं; पृ. ३४. सु; ग. त; पृ. २) हुआ था, 'आर्य-
भटीय' (आर्यसिद्धांत) नामक ग्रंथ बनाया, जिसको डॉ. कर्न ने ई. स. १८७४ में हॉलैंड देश के लेडन नगर में छपवाया है.
उसमें अंक न तो शब्दों में और न अंकों में दिये हैं किंतु सर्वत्र अक्षरों से दिये हैं जिनका क्रम नवीन शैली से ही है.
७. तिथ्यंशापाः खवह्न्यदिकलह्यात्मकमुव्यग्मरपचाः (२५०८२९८०); खंबरगगनवियच्छून्यिगखविवरमगंजैडुभिः (१०६९००००) शशिरुव तस्य
(शंकर बालकृष्ण दीक्षितरचित 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र, पृ. १६२) आदि; ये वचन 'पुलिशसिद्धांत' से भट्टोत्पल ने
उद्धृत किये हैं. खखाष्टमुनिरामाश्विन भावस्वररा चियाः (१७८२२९२६००) । भानां चतुर्युगेनैते परिवर्त्तः प्रकीर्त्तितः (वही, पृ. १६३).
यह वचन भट्टोत्पल के अनुसार, 'मूलपुलिशसिद्धांत' से है.
८. इं. ऐं; जि. १७, पृ. ३६.
९. बू; इं. पे; पृ. ८२. मि. के ने ई. स. १८०७ के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के जर्नल में (पृ. ४७५-५०८) 'नोट्स ऑन इंडि-
यन् मेथैमैटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र पर टिप्पण) नामक विस्तृत लेख में यह बतलाने का यत्न किया है कि भारतीय गणित
शास्त्र अब तक जितना प्राचीन माना गया है उतना प्राचीन नहीं है और उसी लेख में भारतवर्ष के नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों
के विषय में लिखा है कि 'हम पूरी सत्यता के साथ कह सकते हैं कि हिंदुओं के गणित शास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के
पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (पृ. ४६३). मि. के के इस कथन
में कुछ भी वास्तविकता नहीं है केवल हठधर्मी ही है क्योंकि ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ के आचार्य वराहमिहिर *
- द्विवनं शशिरस(६१)भक्तं द्वादशहीनं दिवसमानं (पंचसिद्धान्तिका १२।५). सप्ताब्धिवेद(४२७)संख्यं शककालमपास्य चैत्रशु-
क्लादौ (पं. सि; १।८). रोमक्रहणे द्वागणात खतिथ्य (१५०) भजात पंचकृतुं (६५) परिशोध्यातः । सप्ताष्टकषट्तर्केंदियो (४७८८०) हता-
न्मासाकंसः (पं. सि; ८।१). रोमक्रयुग्मकं दोषंर्व्याख्यानगणंचचतुष्पंचः (२८५०) । संदियदिशो (१५०) घिमासाः खरकुसविषयाद्य-
(३६५४०) प्रजयाः (पं. सिं; १।१५). आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्द्विकपंचद्वियुतः (२५२६) शककालस्तस्य
राज्ञश्च (वाराहीसंहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३). क्या उपर्युक्त उदाहरण, जिनमें कई जगह शून्य (०) का भी प्रयोग हुआ
है, वराहमिहिर के समय अर्थात् ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ में नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना नहीं बतलाते?
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri