प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ प्राचीनलिपिमाला.
ई. स. की नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में प्रसिद्ध अबुजफ़र मुहम्मद अल् ख़्वारिज़्मी ने अरबी
में उक्त क्रम का विवेचन किया और उसी समय से उसका प्रचार...अरबों में बढ़ता रहा.'
'यूरोप में शून्यसहित यह पूरा [अंक] क्रम ई. स. की १२ वीं शताब्दी में अरबों से
लिया गया और इस क्रम से बना हुआ अंकगणित 'अल्गोरिद्मस्' (अल्गोरिथम्) नाम से
प्रसिद्ध हुआ. यह (अल्गोरिद्मस्) विदेशी शब्द 'अल्ख्वारिज़्मी' का अक्षरांतर मात्र है जैसा
कि रेनॉड ने अनुमान किया था, और उक्त अरब गणितशास्त्रवेत्ता के अनुपलब्ध अंकगणित के
पुस्तक के कैंब्रिज से मिले हुए अद्वितीय हस्तलिखित लैटिन अनुवाद के, जो संभवतः बाथ-
निवासी ऐडेलहर्ड का किया हुआ है, प्रसिद्ध होने के बाद वह (अनुमान) प्रमाणित हो गया
है. ख़्वारिज़्मी के अंकगणिन के प्रकारों को पिछले पूर्वीय विद्वानों ने सरल किया और उन
अधिक सरल किये हुए प्रकारों का पश्चिमी यूरोप में पीसा के लेओनार्डो ने और पूर्वी में
मॅक्सिमस् प्लॅनुडेस ने प्रचार किया. 'ज़िरो' शब्द की उत्पत्ति अरबी के 'सिफ़र' शब्द से,
लिओनार्डो के प्रयुक्त किये हुए 'ज़िफ़िरो' शब्दद्वारा, प्रतीत होती है२'.
भारतीय अंकों से अरबों के और उनसे यूरोप के अंकों की सर्वमान्य उत्पत्ति के विरुद्ध
मि. के ने उपर्युक्त लेख के प्रारंभ में ही लिखा है कि 'यह कहा जाता है कि हमारे अंकगणित
के अंकों की उत्पत्ति भारतीय है. पीकॉक, चॅसल्स, वोप्के, कँटोर, बेले, बूलर, मॅकडोनेल और दूसरे
लेखक प्रायः निश्चय के साथ यही कहते हैं और विश्वकोशों तथा कोशों का यही कथन है.
तो भी इस समय जो सामग्री उपलब्ध है उसकी सावधानी के साथ परीक्षा करने से यह
पाया जाता है कि उन (अंकों) की भारतीय उत्पत्ति की कल्पना उचित प्रमाण से रहित है.
वैसी परीक्षा यही बतलाती है कि उन कथनों में से बहुत से निस्सार हैं' (बंगा.ए.सो.ज;
ई. स. १६०७, पृ. ४७५). अरबी में अंकों को 'हिंदसे' कहते हैं जिसका अबतक के विद्वान्
हिंद (हिंदुस्तान) से लिये जाने के कारण ऐसा कहलाना मानते हैं, परंतु मि. के का कथन
है कि 'शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र का बड़ा ज्ञाता फ़ीरोज़ आबादी (ई. स. १३२६-१४१४) 'हिंदसह'
शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' से होना बतलाता है, जिसका अर्थ परिमाण है. हरेक आदमी
विचार सकता है कि यह काफ़ी अच्छा प्रमाण है परंतु भारतवर्ष के विषय में लिखनेवालों में
से अधिकतर ने इसे स्वीकार नहीं किया' (पृ. ४८६). इसी तरह इब्न सिना के वर्गसंख्या-
विषयक नियम में लिखे हुए 'फ़ी अलतरीक अल्हिंदसे' और उसीके घनसंख्याविषयक
नियम में दिये हुए 'अल्हिसाब अल्हिंदसे' में 'हिंदसे' शब्दों का हिंद (हिंदुस्तान) से कोई
संबंध न बतलाने का यत्न किया है (पृ. ४६०). मि. के का यह कथन भी स्वीकार करने
योग्य नहीं है और वैसा ही है जैसा कि उपर्युक्त यह कथन कि 'हिंदुओं के गणितशास्त्र भर में
ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना
का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण ६). ऐसे कथनों का प्रतिवाद कर
लेख को बढ़ाने की हम आवश्यकता नहीं समझते. प्रसिद्ध विद्वान् अल्बेरूनी ने, अपनी भारतवर्ष
संबंधी तहक़ीक़ात की अरबी पुस्तक में, जो ई. स. १०३० के आस पास लिखी गई थी, लिखा
१. अरबों के द्वारा भारतीय अंकों का यूरोप में प्रवेश हुआ उससे बहुत पहिले अर्थात् ई. स. की ४ थी शताब्दी के
आस पास 'नियो-पिथागोरियन' नामक अध्यात्म विद्या के उपदेशक, संभवतः अलेक्ज़ेंड्रिया (मिसर में) की तरफ़ भारतीय
अंकों का ज्ञान प्राप्त कर, उनको यूरोप में ले गये परंतु उनका प्रचार अधिक न बढ़ा और वे सार्वदेशिक न हुए. यूरोप में
भारतीय अंकों का वास्तविक प्रचार स्पेन पर अरबों का अधिकार होने के बाद अरबों के द्वारा ही हुआ. इसीसे यूरोप के
वर्तमान अंकों को 'अरेबिक़ (अरबों के) अंक' कहते हैं.
२. प. ब्रि.; जि. १७, पृ. ६२६.