प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता है कि ब्राह्मी अंकों के चिह्न मिसर के हिएरेटिक अंकों से निकले हैं और हिंदुओं ने उनका अक्षरों
में रूपांतर कर दिया, क्योंकि उनको शब्दों से अंक प्रकट करने का पहिले ही से अभ्यास था तो भी
ऐसी उत्पत्ति का विवेचन अभी तक बाधा उपस्थित करता है और निश्चयात्मक नहीं कहा जा सकता.
परंतु दूसरी दो महत्त्व की बातें निश्चय समझना चाहिये कि—
(१) अशोक के लेखों में मिलने वाले [अंकों के] भिन्न रूप यही बतलाते हैं कि इन अंकों
का इतिहास ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी से बहुत पूर्व का है;
(२) इन चिह्नों का विकास ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा हुआ है क्योंकि उनमें उपध्मानीय
के दो रूप मिलते हैं जो निःसंशय शिक्षा के आचार्यों के निर्माण किये हुए हैं१.
ई. स. १८९८ में फिर बूलर ने डा. बर्नल के मत को ठीक बतलाया परंतु उसमें इतना
बदलने की संमति दी कि भारतीय अंक मिसर के डिमोटिक क्रम से नहीं किंतु हिएरेटिक से निकले
हुए अनुमान होते हैं, और साथ में यह भी लिखा कि ‘डॉ. बर्नल के मत को निश्चयात्मक बनाने
के लिये ई. स. पूर्व की तीसरी और उससे भी पहिले की शताब्दियों के और भी [भारतीय] अंकों
की खोज करने, तथा भारतवर्ष और मिसर के बीच के प्राचीन संपर्क के विषय में ऐतिहासिक अथवा
परंपरागत वृत्तान्त की खोज, की अपेक्षा है. अभी तो इसका सर्वथा अभाव है और यदि कोई
मिसर के अंकों का भारत में प्रचार होना बतलाने का यत्न करे तो उसको यही अटकल लगाना होगा
कि प्राचीन भारतीय नाविक और व्यौपारी मिसर के अधीनस्थ देशों में पहुंचे होंगे अथवा अपनी
समुद्रयात्रा में मिसर के व्यौपारियों से मिले होंगे. परंतु ऐसी अटकल अवश्य संदिग्ध है जब तक
कि उसका सहायक प्रमाण न मिले.’२
इस तरह डॉ. बर्नल भारतवर्ष के प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति मिसर के डिमोटिक
अंकों से; बेले उनका क्रम तो मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से और अधिकतर अंकों की उत्पत्ति
फिनिशियन्, बाक्ट्रियन् और अक्केडियन् अंकों से, और बूलर मिसर के हिएरेटिक अंकों से बत-
लाता है. इन विद्वानों के कथनों का भारतीय अंकों के क्रम और आकृतियों से मिलान करने से
पाया जाता है कि—
हिएरोग्लिफिक अंकों का क्रम भारतीय क्रम से, जिसका विवेचन ऊपर पृ. १०३-४ में किया
गया है, सर्वथा भिन्न है, क्योंकि उसमें मूल अंकों के चिह्न केवल तीन, अर्थात् १, १० और १०० थे.
इन्हीं तीन चिह्नों को बारंबार लिखने से ९९९ तक के अंक बनते थे. १ से ९ तक के अंक, एक के
अंक के चिह्न (खड़ी लकीर) को क्रमशः १ से ९ बार लिखने से बनते थे. ११ से १९ तक के
लिये १० के चिह्न की बाईं ओर क्रमशः १ से ९ तक खड़ी लकीरें खींचते थे. २० के लिये १० का
चिह्न दो बार और ३० से ९० तक के लिये क्रमशः ३ से ९ बार लिखा जाता था. २०० बनाने के
लिये १०० के चिह्न को दो बार लिखते थे, ३०० के लिये तीन बार आदि (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ
नकशा). इस क्रम में १००० और १०००० के लिये भी एक एक चित्र था३ और १००००० के लिये
१. बू; इं. पे; पृ. ८२.
२. बू; इं. सू; संख्या ३, पृ. ११६ (द्वितीय संस्करण). इससे पूर्व उक्त पुस्तक से जहां जहां हवाले दिये हैं
वे प्रथम संस्करण से हैं.
३. ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५.