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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 318 में से

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पृष्ठ 141

११२ प्राचीनलिपिमाला.
मेंढक और १०००००० के लिये हाथ फैलाये हुए पुरुष का चित्र १ बनाया जाता था. मिसर का
सब से पुराना अंकक्रम यही था जो बहुत ही जटिल और गणना की बिलकुल प्रारंभिक दशा
का सूचक है. इसीसे फिनिशियन् अंक निकले हैं जिनका क्रम भी ऐसा ही है, केवल १० के
चिह्न को बारंबार लिखने की जटिल रीति को कुछ सरल बनाने के लिये उसमें २० के अंक के लिये
नवीन चिह्न बनाया गया, जिससे ३० के लिये २० और १०; ६० के लिये २०, २०, २०, २० और
१० लिखने पड़ते थे. इस क्रम के ४ मूल अंकों में से १ का चिह्न तो एक खड़ी लकीर है और
१०, २० और १०० के तीन चिह्नों में से एक भी उक्त अंकों के सूचक भारतीय अंक चिह्नों से
नहीं मिलता ( देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा ). इस लिये बेले का कथन किसी प्रकार स्वीकार
नहीं किया जा सकता और इसीसे बूलर को भी यह लिखना पड़ा था कि बेले का कथन बड़ी
आपत्ति उपस्थित करता है.
पीछे से मिसरवालों ने किसी विदेशी सरल अंकक्रम को देख कर अथवा अपनी बुद्धि से
अपने भद्दे हिएरोग्लिफिक् क्रम को सरल करने के लिये भारतीय अंकक्रम जैसा नवीन क्रम बनाया,
जिसमें १ से ६ तक के लिये ६, १० से ६० तक की दहाइयों के लिये ६, और १०० तथा १००० के
लिये एक एक चिह्न स्थिर किया. इस अंकक्रम को 'हिएरेटिक' कहते हैं और इसमें भी अंक दाहिनी
ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं. हिएरेटिक् और भारतीय अंकों की आकृतियों का परस्पर
मिलान किया जावे तो अंकों के २० चिह्नों में से केवल ६ का चिह्न दोनों में कुछ मिलता हुआ
है; बाकी किसी में समानता नहीं है. दूसरा अंतर यह है कि हिएरेटिक अंकों में २००
से ४०० तक के अंक १०० के अंक की बाईं तरफ़ क्रमशः १ से ३ खड़ी लकीरें रखने से बनते
हैं परंतु भारतीय अंकों में २०० और ३०० के लिये क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें १०० के
अंक के साथ दाहिनी ओर जोड़ी जाती हैं और ४०० के लिये वैसी ही ३ लकीरें १०० के अंक
के साथ जोड़ी नहीं जातीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा जाता है. तीसरा अंतर यह है कि
हिएरेटिक में २००० से ४००० बनाने के लिये १००० के अंक के कुछ विकृत रूप को आड़ा
रख कर उसके ऊपर क्रमशः २ से ४ तक खड़ी लकीरें जोड़ी जाती हैं परंतु भारतीय अंकों में
२००० और ३००० के अंक तो १००० के अंक की दाहिनी ओर क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें
जोड़ने से बनते हैं परंतु ४००० के लिये वैसी ही तीन लकीरें नहीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा
जाता है (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा.)
डेमोटिक अंक हिएरेटिक से ही निकले हैं और उन दोनों में अंतर बहुत कम है (देखो,
पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा ) जो समय के साथ हुआ हो. इन अंकों को भारतीय अंकों से
मिलाने से यही पाया जाता है कि इनमें से केवल ६ का अंक नानाघाट के ६ से ठीक मिलता है.
बाकी किसी अंक में कुछ भी समानता नहीं पाई जाती.
ऊपर के मिलान से पाया जाता है कि मिसर के हिएरेटिक और उससे निकले हुए
डिमांटिक अंकों का क्रम तो भारतीय क्रमसे अवश्य मिलता है। क्योंकि १ से १००० तक के
लिये २० चिह्न दोनों में हैं परंतु उक्त २० चिह्नों की आकृतियों में से केवल ६ की आकृति के
सिवाय किसीमें समानता नहीं है, और २०० तथा ३००, एवं २००० और ३००० बनाने की
रीति में भी अंतर है और ४०० तथा ४००० बनाने की रीति तो दोनों में बिलकुल ही
भिन्न है.
१. एन्सा. ब्रि ; जि. १७, पृ. ६२५.