प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंक १०५
पांचवा 'द्रुक' और छठा 'म' के समान है. नेपाल के लेखों में 'प्क', और भिन्न भिन्न लेख व
दानपत्रों की पंक्ति में 'रुक्क' मिलता है (देखो, लिपिपत्र ७१ और ७२ के पूर्वार्द्ध की
तीन पंक्तियां). ४ का मूल चिह्न 'क' सा था जिस पर सिर की गोलाईदार या कोषदार रेखा
लगाने से उसकी आकृति कुछ कुछ 'प्क' से मिलती हुई बनी. लेखकों की भिन्न भिन्न लेखन-
शैली, सुंदरता लाने के यत्न और चलती कलम से पूरा अंक लिखने से उपर्युक्त भिन्न भिन्न रूप बने
हैं. आगे के अंकों का इस प्रकार का विवेचन करने में लेख बहुत बढ़ जाने की संभावना होने
के कारण बहुधा भिन्न भिन्न अक्षरों के नाम मात्र लिखे जायेंगे जिनको पाठक लिपिपत्र ७१ से
७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में दिये हुए अंकों से मिला कर देख लेवें.
५-इस अंक के चिह्न त, ता, पु, हु, रु, तृ, तृा, ना, न, ह, हू और ह अक्षरों से मिलते हुए
पाये जाते हैं.
६-के लिये 'ज', स (?), फ्र, फ्रा, फा, फ और हा से मिलते जुलते चिह्न मिलते हैं, तो
भी जग्गयपेट, गुप्तों और पल्लव आदि के लेखों से दिये हुए इस अंक के चिह्न ठीक तरह किसी
अक्षर से नहीं मिलते, वे अंकसंकेत ही हैं. उनको अक्षरों से मिलाने का यत्न करना खैंचतान
ही है.
७-के चिह्न ग्र, गु और ग से मिलते जुलते हैं.
८-के चिह्न ह्र, ह्रा, ह, हा, उ, पु, ट, टा, र, ब्र और द्वा से मिलते हुए हैं, परंतु कुछ चिह्न ऐसे
हैं जो अक्षर नहीं माने जा सकते.
९-नानाघाट के, कुशनवंशियों के और क्षत्रपों तथा आंध्रवंशियों के लेखों में जो ९ के चिह्न
मिलते हैं उनकी किसी प्रकार अक्षरों में गणना नहीं हो सकती. पीछे से अंतर पड़ने पर उसके
चिह्न ओ, उ और ओं (के कल्पित चिह्न) से बनते गये.
१०-नानाघाट के, कुशनवंशियों के, क्षत्रपों तथा आंध्रों के लेखों; क्षत्रपों के सिक्कों, जग्गयपेट
के लेखों तथा गुप्तादिकों के लेखादि में तो १० का अंकसंकेत ही है क्यों कि उसकी किसी अक्षर
से समानता नहीं हो सकती परंतु पीछे से उसकी आकृति यै, ह, दृ, ख और लृ से मिलती
हुई बन गई.
२०-का चिह्न 'थ' था जो पीछे के परिवर्तनों में भी उसी अक्षर के परिवर्तित रूपों के
सदृश बना रहा.
३०-का चिह्न 'ल' के सदृश ही मिलता है.
४०-का चिह्न 'प्त' और 'स' से मिलता हुआ मिलता है.
५०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. केवल भिन्न भिन्न लेखादि से उद्धृत किये
हुए इस अंक के चिह्नों में से दूसरा दक्षिणी शैली के 'ब' से मिलता है.
६०-का चिह्न 'प', 'पु' या 'प्र' से मिलता हुआ है.
७०-का चिह्न 'स', 'ग्र', रो, 'ग्रा', 'प्र' या 'हू' से मिलता है.
८०-का चिह्न उपध्मानीय के चिह्न से मिलता हुआ है (देखो, लिपिपत्र १७ में उदयगिरि के
लेख के अक्षरों में उपध्मानीय का चिह्न).
९०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. यदि उपध्मानीय के चिह्न के मध्य में एक आड़ी
लकीर और बढ़ा दी जावे तो उसकी आकृति क्षत्रपों के सिक्कों से उद्धृत किये हुए इस चिह्न के
दूसरे रूप से मिल जायगी.