प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंक. ११५
नवीन शैली के अंक.
नवीन शैली के अंकक्रम में १ से ६ तक के लिये ६ अंक और खाली स्थान का सूचक
शून्य ० है. इन्हीं १० चिह्नों से अंकविद्या का समस्त व्यवहार चलता है. इस शैली में
प्राचीन शैली की नांई प्रत्येक अंक नियत संख्या का ही सूचक नहीं है किंतु प्रत्येक अंक इकाई,
दहाई, सैंकड़े आदि प्रत्येक स्थान पर आ सकता है और स्थान के अनुसार दाहिनी ओर
से बाईं ओर हटने पर प्रत्येक अंक का स्थानीय मुख्य दसगुना बढ़ता जाता है, जैसे ११११११
में छहों अंक १ के ही हैं परंतु पहिले से (दाहिनी ओर से लेने से) १, दूसरे से १०,
तीसरे से १००, चौथे से १०००, पांचवें से १०००० और छठे से १००००० का बोध होता
है. इसीसे इस संख्यासूचकक्रम को दशगुणोत्तर संख्या कहते हैं, और वर्तमान समय में
बहुधा संसार भर का अंकक्रम यही है.
यह अंकक्रम भारतवर्ष में कब से प्रचलित हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता.
प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो
प्राचीन शैली से ही अंक लिखे मिलते हैं. नवीन शैली से लिखे हुए अंक पहिलेपहल कलचुरि
सं. ३४६ १ (ई. स. ५६५) के दानपत्र में मिलते हैं, जिसके पीछे ई. स. की १० वीं शताब्दी
के मध्य के आस पास तक कहीं प्राचीन और कहीं नवीन शैली के अंकों का व्यवहार है.
उसके बाद नवीन शैली ही मिलती है. परंतु ज्योतिष के पुस्तकों में ई. स. की छठी शताब्दी
से बहुत पूर्व इस शैली का प्रचार होना पाया जाता है क्योंकि शक सं. ४२७२ (ई. स. ५०५)
में वराहमिहर ने 'पंचसिद्धांतिका' नामक ग्रंथ लिखा जिसमें सर्वत्र नवीन शैली से ही
अंक दिए हैं. यदि उस समय नवीन शैली का व्यवहार सामान्य रूप से न होता तो वराहमिहर
अपने ग्रंथ में नवीन शैली से अंक न देता. इससे निश्चित है कि ई. स. की पांचवीं शताब्दी के अंत
के आसपास तो नवीन शैली से अंक लिखने का प्रचार सर्वसाधारण में था परंतु शिलालेख और
दानपत्रों के लिखनेवाले प्राचीन शैली के ढर्रे पर ही चलते रहे हों जैसा कि इस देश में हर
बात में होता आया है. वराहमिहर ने 'पंचसिद्धांतिका' में पुलिश, रोमक, वसिष्ठ, सौर (सूर्य)
१. संखेडा से मिले हुए गुर्जरवंशी किसी राजा के उक्त दानपत्र में संवत् 'संवत्सरशतत्रयं (ये) षट्चत्वारिंशो-
(शदु) त्तरके । ३४६' दिया है. जी. आर. के ने अपनी 'इंडिअन् मॅथेमॅटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र) नामक पुस्तक में
उक्त ताम्रपत्र के विषय में लिखा है कि 'वह संदेहरहित नहीं है' और टिप्पण में लिखा है कि 'ये अंक पीछे से जोड़े गये
हैं' (पृ. ३१). मि. के का यह कथन सर्वथा स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उक्त दानपत्र को संदिग्ध मानने के
लिये कोई कारण नहीं है और न कोई कारण मि. के ने ही बतलाया है. इसी तरह अंकों के पीछे से जोड़ने का कथन भी
स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि जब संवत् शब्दों में दिया ही था तो पीछे से फिर उसको अंकों में बनाने की आवश्यकता ही
न थी. हरिलाल हर्षदराय ध्रुव ने, जिसने उसका संपादन किया है, मूल ताम्रपत्र को देखा था परंतु उक्त विद्वान् को उन
अंकों का पीछे से बनाया जाना मालूम न हुआ और न उसके फोटो पर से ऐसा पाया जाता है. मि. के की भारतीय
गणितशास्त्र को नवीन ठहराने की खैंचतान ने ही इस और ऐसी ही और प्रमाणशून्य कल्पनाओं की सृष्टि कर दी है जिस-
का कुछ परिचय आगे दिया जायगा. शब्दों और अंकों दोनों में संवत् देने की परिपाटी प्राचीन है और कई लेखादि में
मिलती है, जैसे कि छार (चार) गांव से मिले हुए राजा हुविष्क के लेख में हुविस्क (ष्क) स्य स(सं)वत्सर चत(तु)र्विंश
४०' (आ. स. रि; ई. स. १९०८-६, प्लेट ५६); गिरनार के पास के चट्टान पर खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख में 'वर्षे
द्विसप्ततितमे ७० २' (एं. इं. जि. ८, पृ. ४२) आदि.
२. ड; कौ. ई; पृ. ३८. सु; ग. त; पृ. १३. 'खंडखाद्य' की टीका में आमराज ने वराहमिहर की मृत्यु शक सं. ५०६
(ई. स. ५८७) में होना लिखा है वह विश्वास योग्य नहीं है (सु; ग. त; पृ. १३).
३. सप्ताश्विवेद (४२७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका, अध्याय १, आर्या ८). रोमकसूर्यो व्युष्णात्
खतिथि (१५०) युजातः पंचकतुं (६५) परिवींजात । सप्ताष्टकप्रमक्तंत्रिधो (५४७८०) हुतानाममार्कः सः (पंच; ८ । ९) आदि.