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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 318 में से

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पृष्ठ 139

११० प्राचीनलिपिमाला.
पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इन अंकों के उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर होने न होने
के विषय में कुछ न कह कर भारतवर्ष के प्राचीन अंकों के विषय के अपने लेख में ई. स. १८७७ में
लिखा है कि 'अंकों की उत्पत्ति के विषय में मेरा विश्वास है कि मैं निश्चय के साथ यह प्रतिपादन
कर सकता हूं कि पहिले तीन अंकों को छोड़ कर बाकी सब के सब अक्षरों या संयुक्ताक्षरों के सूचक हैं
और भिन्न भिन्न वंशों के लेखों और [भिन्न भिन्न] शताब्दियों में उन (अंकों) की आकृतियों में
जो अंतर पाया जाता है उसका मुख्य कारण उक्त समय और वंशों के अक्षरों का अंतर ही है'१.
डॉ. बूलर ने उक्त लेख के साथ ही अपनी संमति प्रकट करते समय लिखा है कि 'प्रिन्सेप का यह
पुराना कथन, कि अंक उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर हैं, छोड़ देना चाहिये. परंतु अब
तक इस प्रश्न का संतोषदायक समाधान नहीं हुआ. पंडित भगवानलाल ने आर्यभट और
गंवशास्त्र की अक्षरों द्वारा अंक सूचित करने की रीति को भी जांचा परंतु उसमें सफलता न हुई
(अर्थात् अक्षरों के क्रम की कोई कुंजी न मिली); और न मैं इस रहस्य की कोई कुंजी प्राप्त करने का
दावा करता हूं. मैं केवल यही बतलाऊंगा कि इन अंकों में अनुनासिक, जिह्वामूलीय और उपध्मा-
नीय का होना प्रकट करता है कि उन (अंकों) को ब्राह्मणों ने निर्माण किया था, न कि वाणियाओं
(महाजनों) ने और न बौद्धों ने जो प्राकृत को काम में लाते थे'२.
प्रो. कर्न ने ई. स. १८७७ में 'इंडियन ऐंटिक्केरी' के संपादक को एक पत्र के द्वारा यह सूचित
किया कि 'मैं सामान्यतः बूलर के इस कथन से सहमत हूं कि अंक ब्राह्मणों ने निर्माण किये थे'३.
ई. स १८७८ में बर्नल ने लिखा कि 'अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षरों से इन [अंक]
चिह्नों की उत्पत्ति मानना बिलकुल असंभव है क्योंकि उनकी दक्षिणी अशोक (ब्राह्मी) अक्षरों
से, जो अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षर हैं, बिलकुल समानता नहीं है'४. परंतु बर्नल ने ब्राह्मी
अक्षरों की उत्पत्ति फिनिशियन अक्षरों से होना तो मान ही रक्खा था; इससे इन अंकों की उत्पत्ति
भी बाहरी स्रोत से होना अनुमान करके लिखा कि 'इस (अंक) क्रम की इजिप्ट (मिसर) के
डेमोटिक् अंकक्रम से सामान्य समानता, मेरे विचार में, इस कामचलाऊ अनुमान के लिये बस
होगी कि अशोक के अंकक्रम की उत्पत्ति उसी (डिमोटिक्) क्रम से हुई है, परंतु इसका विकास
भारतवर्ष में हुआ है'५.
फिर इ. सी. बेले ने 'वर्तमान अंकों का वंशक्रम' नामक विस्तृत लेख ६ में यह बतलाने का यत्न
किया कि 'भारतीय अंकशैली का सिद्धान्त मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से निकला है, तो भी
भारतीय अंकचिह्नों में से अधिकतर फिनिशियन, बाक्ट्रिअन और अक्केडिअन अंकों या अक्षरों से
लिये हुए हैं; परंतु कुछ थोड़ेसों की विदेशी उत्पत्ति प्रमाणित नहीं हो सकती'.
इस पर ई. स. १८८६ में बूलर ने लिखा कि 'बेले का कथन, यह मानने से बड़ी आपत्ति उपस्थित
करता है कि हिंदुओं ने [अंक] भिन्न भिन्न चार या पांच स्रोतों से लिये, जिनमें से कुछ तो बहुत
प्राचीन और कुछ बहुत अर्वाचीन हैं. परंतु उसके लेख के साथ प्रकट किया हुआ मिसर और भारत
के अंकों के मिलान का नक्शा और उन दोनों में सैंकड़ों के अंकों के बनाने की रीति की समानता के
बारे में उसका कथन, भगवानलाल की कल्पना को छोड़ देने और कुछ परिवर्तन के साथ बर्नल के
कथन को, जिससे बार्थ भी सहमत है, स्वीकार करने को प्रस्तुत करता है. मुझे यह संभव प्रतीत
१. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४४. २. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४८. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. १४२. ४. ब; सा. इं. पे; पृ. ६०.
५. ब; सा. इं. पे; पृ. ६५. ६. ज. रॉ. ए. सो. (न्यू सीरीज़) जि. १४, पृ. ३३५ से और जि. १५, पृ. १ से.