प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ प्राचीनलिपिमाला.
२०० के लिये १०० का चिह्न लिख उसकी दाहिनी ओर, कभी ऊपर कभी मध्य और कभी नीचे
की तरफ़, आड़ी ( सीधी, तिरछी या वक्र ) रेखा जोड़ी जाती थी१. ३०० के लिये १०० के चिह्न के साथ
वैसे ही दो लकीरें जोड़ी जाती थीं. ४०० से ९०० तक के लिये १०० का चिन्ह लिख उस के साथ क्रमशः ४ से ९
तक के अंक एक छोटी सी आड़ी लकीर२ से जोड़ देते थे. १०१ से ९९९ तक लिखने में सैकड़े के अंक
के आगे दहाई और इकाई के अंक लिखे जाते थे, जैसे कि १२९ के लिये १००, २०, ९; ९५५ के लिये
९००, ५०, ५. यदि ऐसे अंकों में दहाई का अंक नहीं हो तो सैकड़े के बाद इकाई का अंक रक्खा
जाता था, जैसे कि ३०१ के लिये ३००, १. ( देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक ).
२००० के लिये १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को एक छोटीसी सीधी आड़ी ( या नीचे
को मुड़ी हुई ) लकीर जोड़ी जाती थी और ३००० के लिये वैसी ही दो लकीरें. ४००० से ९०००
तक और १०००० से ९०००० तक के लिये १००० के चिह्न के आगे ४ से ९ तक के और १० से ९० तक
के चिह्न क्रमशः एक छोटी सी लकीर से जोड़े जाते थे ( देखो, लिपिपत्र ७५ ). ११००० के वास्ते
१०००० लिख, पास ही १००० लिखते थे. इसी तरह २१००० के लिये २००००, १०००; ९९०००
के लिये ९००००, ९००० लिखते थे. ऐसे ही ९९९९९ लिखने हो तो ९००००, ९०००, ९००,
९०, ९ लिखने थे. यदि सैकड़ा और दहाई के अंक न हों तो हज़ार के अंक के आगे इकाई का अंक
लिखा जाता था, जैसे कि ९००१ लिखना हो तो ९०००, १.
उपर्युक्त प्राचीन अंकों के चिह्नों में से १, २, और ३ के चिह्न तो क्रमशः -, = और ≡ आड़ी
लकीरें हैं जो अब तक व्यापारियों की बहियों में रुपयों के साथ आने लिखने में एक, दो और तीन के
लिये व्यवहार में आती हैं. पीछे से इन लकीरों में वक्रता आने लगी जिससे १ की लकीर से वर्तमान
नागरी आदि का १ बना, और २ तथा ३ की वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से वर्तमान नागरी आदि
के २ और ३ के अंक बने हैं. बाकी के चिह्नों में से कितने एक अक्षरों से प्रतीत होते हैं और जैसे समय
के साथ अक्षरों में परिवर्तन होता गया वैसे ही उनमें भी परिवर्तन होता रहा. प्राचीन शिलालेख
और दानपत्रों में ४ से १००० तक के चिह्नों के, अक्षरों से मिलते हुए, रूप नीचे लिखे अनुसार पाये
जाते हैं-
४-अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न 'क' के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर
गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति 'प्क' से कुछ कुछ मिलती होने
लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप 'प्क' जैसा मिलता है. क्षत्रपों और
आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में 'प्क' ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत
किये हुए चिह्नों में से चौथे में 'क' की खड़ी लकीर को बाईं तरफ़ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा
दिया है जिससे उसकी आकृति 'प्कृ' सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में 'क' की
दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, 'क' के मध्य
की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति
'प्र' के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के 'प्क' और
'प्र' से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी 'प्क' और 'प्र' से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन
वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत ९ चिह्नों में से पहिला 'प्क', दूसरा 'प्की', तीसरा और चौथा 'त्क',
१. यह रीति ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी और उसके पीछे के शिलालेखादि में मिलती है. अशोक के लेखों में इससे
कुछ भिन्नता पाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७४ के पूर्वार्द्ध में अशोक के लेखों से दिये हुए २०० के अंक के तीन रूप).
२. पिछले लेखों में कहीं कहीं यह लकीर नहीं भी लगाई जाती थी (देखो, लिपिपत्र ७४ के उत्तरार्द्ध में भिन्न भिन्न
लेखों से उद्धृत किये हुए अंकों में ४०० और ७०० तथा प्रतिहारों के दानपत्रों में ९००.)