प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ प्राचीनलिपिमाला.
१००-नानाघाट के लेख में इस अंक का चिह्न 'सु' अथवा 'अ' से मिलता हुआ है क्योंकि उक्त
दोनों अक्षरों की आकृति उस समय परस्पर बहुत मिलती हुई थी. पिछले लेखों में सु, अ,
लु, से, सो और सौ से मिलते हुए रूप मिलते हैं, परंतु नासिक के लेखों और क्षत्रपों के सिक्कों
में इसके जो रूप मिलते हैं उनकी उस समय के किसी अक्षर से समानता नहीं है.
२००-अशोक के लेखों में मिलनेवाले इस अंक के तीन चिह्नों में से पहिला 'सु' है,
परंतु दूसरे दो रूप उस समय के किसी अक्षर से नहीं मिलते. नानाघाट के लेख का रूप 'आ'
के समान है. गुप्तों आदि के लेखों का दूसरा रूप 'ला' से मिलता हुआ है और भिन्न भिन्न
लेखादि से उद्धृत किये हुए इस अंक के दो रूपों में से दूसरा 'सू' से मिलता है. नासिक के
लेखों, क्षत्रपों के सिक्कों, वलभी के राजाओं तथा कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों में मिलनेवाले
इस अंक के रूप किसी अक्षर से नहीं मिलते.
३००-का अंक १०० के अंक की दाहिनी ओर २ आड़ी या गोलाईदार लकीरें लगाने से
बनता है. १०० के सूचक अक्षर के साथ ऐसी दो लकीरें कहीं नहीं लगती, इसलिये इसकी
किसी मात्रासहित अक्षर के साथ समानता नहीं हो सकती. ४०० से ६०० तक के चिह्न, १००
के चिह्न के आगे ४ से ६ तक के अंकों के जोड़ने से बनते थे, उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
१०००-का चिह्न नानाघाट के लेख में 'रो' के समान है. नासिक के लेखों में 'धु' अथवा
'चु' से मिलता हुआ है और वाकाटकवंशियों के दानपत्रों में उनकी लिपि के 'थु' के समान है.
२००० और ३००० के चिह्न, १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को क्रमशः एक और
दो आड़ी लकीरें जोड़ने से बनते थे. इसलिये उनकी किसी अक्षर से समानता नहीं हो सकती.
४००० से ६००० तक के अंक, १००० के चिह्न के आगे क्रमशः ४ से ६ तक के, और १००००
से ६०००० तक के अंक, १००० के आगे १० से ६० तक की दहाइयों के चिह्न जोड़ने से बनते थे
इसलिये उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
ऊपर प्राचीन शैली के अंकों की जिन जिन अक्षरों से समानता बतलाई गई है उसमें सब के
सब अक्षर उक्त अंकों से ठीक मिलते हुए ही हों ऐसा नहीं है. कोई कोई अक्षर ठीक मिलते
हैं बाकी की समानता ठीक वैसी है जैसी कि नागरी के वर्तमान अक्षरों के सिर हटाने के बाद उनका
नागरी के वर्तमान अंकों से मिलान करके यह कहा जाय कि २ का अंक 'र' से, ३ 'रू'
से, ५ 'प' से, ६ 'द' से, ७ 'उ' की मात्रा से और ८ 'ट' से मिलता जुलता है. १, २, ३,
५०, ८० और ६० के प्राचीन उपलब्ध रूपों और अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के
दूसरे व तीसरे रूपों (देखो, लिपिपत्र ७४) से यही पाया जाता है कि ये चिह्न तो सर्वथा
अक्षर नहीं थे किंतु अंक ही थे. ऐसी दशा में यही मानना पड़ेगा कि प्रारंभ में १ से १०००
तक के सब अंक वास्तव में अंक ही थे. यदि अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों, का सूचक माना
होता तो उनका कोई क्रम अवश्य होता और सब के सब अंक अक्षरों से ही बतलाये जाते,
परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि प्रारंभ में ये सब अंक ही थे. अनायास से किसी अंक का
रूप किसी अक्षर से मिल जाय यह बात दूसरी है; जैसे कि वर्तमान नागरी का २ का अंक
उसी लिपि के 'र' से, और गुजराती के २ (२) और ५ (५) के अंक उक्त लिपि के र (२) और
१. एक, दो और तीन के प्राचीन चिह्न तो स्पष्ट ही संख्यासूचक हैं और अशोक की लिपि में चार का चिह्न जो 'क'
अक्षर से मिलता हुआ है वह संभव है कि चौराहे या स्वस्तिक का सूचक हो. ऐसे ही और अंकों के लिए भी कोई
कारण रहा होगा.