प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 138, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंबतलाने का प्रचार बना हुआ है; परंतु उनके देखने से पाया जाता है कि उनके लेखक सर्वथा
प्राचीन क्रम को भूले हुए थे और 'मक्षिकास्थाने मक्षिका' की नांई केवल प्राचीन पुस्तकों के अनु-
सार पत्रांक लगा देते थे.
शिलालेख और दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो केवल
प्राचीन क्रम से ही अंक लिखे मिलते हैं. पहिले पहिल गुर्जरवंशी किसी राजा के ताम्रपत्र के
दूसरे पत्रे में, जो [कलचुरि] संवत् ३४६ (ई. स. ५९५) का है, नवीन शैली से अंक दिये हुए
मिलते हैं अर्थात उसमें क्रमशः ३, ४ और ६ के अंक हैं. उक्त संवत के पीछे कहीं प्राचीन शैली
से और कहीं नवीन शैली से अंक लिखे जाने लगे और १० वीं शताब्दी के मध्य तक प्राचीन शैली
का प्रचार कुछ कुछ रहा१; फिर तो उठ ही गया२ और नवीन शैली से ही अंक लिखे जाने लगे.
उसके पीछे का केवल एक ही लेख ऐसा मिला है, जो नेपाल के मानदेव के समय का
[नेवार] सं. २५६ (ई. स. ११३६) का है और जिसमें अंक प्राचीन शैली से दिये हैं३.
भारतवर्ष में अंकों की यह प्राचीन शैली कब से प्रचलित हुई इसका पता नहीं चलता परंतु
अशोक के सिद्धापुर, सहस्राम और रूपनाथ के लेखों में इस शैली के २००, ५० और ६ के अंक मिलते
हैं जिनमें से २०० का अंक४ तीनों लेखों में बिलकुल ही भिन्न प्रकार का है और ५० तथा ६ के दो दो
प्रकार के रूप मिलते हैं. २०० के भिन्न भिन्न तीन रूपों से यही कहा जा सकता है कि ई. स. पूर्व
की तीसरी शताब्दी में तो अंकों की यह शैली कोई नवीन बात नहीं किंतु सुदीर्घ काल से चली आती
रही होगी. यदि ऐसा न होता तो अशोक के लेखों में २०० के अंक के एक दूसरे से बिलकुल ही
भिन्न तीन रूप सर्वथा न मिलते. अशोक से पूर्व उक्त अंकों के चिह्न कैसे थे और किन किन
परिवर्तनों के बाद वे उन रूपों में परिणत हुए इस विषय में कहने के लिये अब तक कोई साधन
उपलब्ध नहीं हुआ.
कई विद्वानों ने जैसे ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न भिन्न कल्पनाएं की हैं वैसे ही
इन प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति के विषय में भी की हैं जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है-
प्रथम ई. स. १८३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने यह अनुमान किया कि ये अंक उनके सूचक शब्दों के
प्रथम अक्षर हैं, जिसको वोप्के आदि कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने स्वीकार भी किया.
१. यद्यपि शिलालेखों और दानपत्रों में प्राचीन शैली के अंकों का प्रचार १०वीं शताब्दी के मध्य तक कुछ न कुछ
पाया जाता है तो भी ताम्रपत्रों के लेखक ई. स. की आठवीं शताब्दी से ही उस शैली के अंकों के लिखने में ग़लतियां
करने लग गये थे. वलभी के राजा शीलादित्य (छठे) के गुप्त सं. ४४१ के दानपत्र में १०० के साथ जुड़नेवाले ४ के अंक के
स्थान में ४० का अंक जोड़ दिया है (इं. ऐं; जि. ६ पृ. १६ के पास का सेट), और पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् के
गांगेय सं. १८३ के दानपत्र में ८० के स्थान पर ८ का और ३ के स्थान पर ३० का चिह्न ('लो', 'ल' का घसीट रूप) लिखा
है और २० के लिये २ के आगे बिंदी लगा कर एक ही दानपत्र में प्राचीन और नवीन शैली का मिश्रण भी कर दिखाया
है (ए. इं; जि. ३, पृ. १३३ के पास का सेट).
२. तामिळ लिपि में अब तक अंक प्राचीन शैली से ही लिखे जाते हैं; नवीन शैली के अंकों का प्रचार अब होने लगा है.
थोड़े समय पूर्व के छपे हुए पुस्तकों में पत्रांक प्राचीन शैली से ही दिये हुए मिलते हैं परंतु अब नवीन शैली से देने लगे हैं.
तामिळ अंकों के लिये देखो, लिपिपत्र ८१ में तामिळ लिपि.
३. बें; ज. ने; पृ. ८१.
४. अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के अंक के भिन्न भिन्न ३ चिह्नों के लिये देखो लिपिपत्र ७४ का पूर्वार्द्ध. उक्त
चिह्नों में से दूसरा सहस्राम के लेख से है. करीब ८०० वर्ष पीछे उसीका किंचित् बदला हुआ रूप फिर मथुरा से मिली
हुई गुप्त सं. २३० (ई. स. ५४६) की एक बौद्ध मूर्ति के नीचे के लेख (सी; गु; इं; सेट४० D) में मिलता है; बीच में कहीं नहीं
मिलता. कभी कभी लेखकों को अक्षरों या अंकों के प्राचीन चिह्नों की स्मृति रहने का यह अद्भुत उदाहरण है.