प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
"उद्भूतभ्रूकुटि[मु]खसंक्षयधूमकेतुः"!
"mukha-kṣaya-dhūmakētuḥ"!
Wait, where is कुल?
Is कुल even there?
LOOK AT THE WORD:
[मु]ख
Wait, does it say कु ल or मु ख?
LOOK AT:
[मु]खसंक्षयधूम-!
Wait! The letters are:
(मु) then ख then सं then क्ष then य then धू then म -!
Look at what I thought was कु ल:
It's NOT कु ल!
Wait, look at the letter after (मु):
It is ख!
Wait, is there a कुल?
Let's look at line L8 again:
Wait! Before संक्षय:
There is:
... (मु) ख सं क्ष य धू म -
Wait, where did णुकुल come from in my first reading?
Ah! टि looked like णि?
No! भ्रूक़ुटि(मु)खसंक्षयधूम-!
Let's trace every letter:
भ्रूकुटि(मु)ख
६२
प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र ५५ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
क्षि(क्षो)रोदम् मथितम् मनोभिरतुलम्(लं) देवासुरैर्मंदरं
हित्वाक्षिप्त इवाञ्जनाद्रिरिव यत्तक्षाधिकम्(कं) राज-
ते यो भोगि(गौ)न्द्रनिविष्टमूत्ति(र्त्ति)रनिशम् भूयोमृतस्या-
शये रक्षो[द्]वः सुरदृ(वृ)न्दवन्दितपत(द)द्वन्द्वः स्स(न्दस्स)
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र पांड्यवंशी राजा सुंदरपांड्य के श्रीरंगम् के लेख², आलंपूंडि से मिले हुए विजय-
नगर के यादव राजा विरूपाक्ष के शक सं. १३०५ (ई. स. १३८३) के दानपत्र³ और वहीं के श्रीगिरि-
भूपाल के शक सं. १३४६ (ई. स. १४२४) के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में
दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ठ, ड, ण, त, थ, द, ध, न,
प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे थोड़ा सा और अंतर पड़ने पर वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी.
लिपिपत्र ५६ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
हरिः ओम् स्वस्ति श्रौः येनासौ
करुणामनीयत दशां श्रीरंगपत्मा(द्मा)करः
कृत्वा तम् भुवनान्तरप्रणयिनं करुणा-
१५—कलिंग लिपि.
ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ५७ से ५६).
कलिंग लिपि मद्रास इहाते के चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में कलिंगनगर के गंगा-
वंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास से ११ वीं शताब्दी के आस पास
तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र, जो अब तक मिला है, पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्र-
वर्मन् का गांगेय संवत् ८७ का है. उसकी लिपि में मध्यप्रदेशी लिपि का अनुकरण पाया जाता है
क्योंकि अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और कई अक्षर समकोण वाले हैं
(देखो, ऊपर पृ. ४४). पिछले दानपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं किंतु पश्चिमी एवं तेलुगु-कनड़ी
लिपि की नांई गोलाईदार मिलते हैं और उनमें तेलुगु-कनड़ी के साथ साथ कुछ ग्रंथ तथा नागरी
लिपि का मिश्रण भी पाया जाता है.
१. ये मूल पंक्तियां उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.
२. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास के प्लेट से.
३. ए. इं; जि. ३, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३१२ और ३१३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां श्रीरंगम् के लेख से हैं.
कलिंग लिपि. ६३
लिपिपत्र ५७ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र¹, राजा इंद्रवर्म्मन् (दूसरे)
के चिकाकोल के दानपत्र² और राजा देवेंद्रवर्म्मन् के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. अच्युतपुरम्
के दानपत्र के अक्षरों के सिर मध्यदेशी लिपि की नांई संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं
और अ, आ, क, र आदि अक्षर समकोणवाले हैं. 'न' नागरी का सा है और बाकी के अक्षर
तेलुगु-कनड़ी से मिलते हुए हैं. चिकाकोल के दानपत्र के अक्षरों के भी सिर चौकूंटे, भीतर से भरे
हुए हैं, और 'म्' ग्रंथ लिपि की शैली का है.
लिपिपत्र ५७वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति सर्व्वतुरमणीयाद्विजयकलिङ्गनगरात्सकलभुवन-
निर्म्माणैकसूत्रधारस्य भगवतो गोकर्णस्वामिनश्चरणकम-
लयुगलप्रणामादपगतकलिकलङ्को विनयनयसम्पदा-
माधारः स्वासिधारापरिस्पन्दाधिगतसकलकलिङ्गाधिराज्यश्चतु-
रुदधितरङ्गमेखलावनितलप्रविततामलयशः अनेकसम-
लिपिपत्र ५८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्रवर्म्मन् दूसरे (अनंतवर्मन् के पुत्र) के गांगेय संवत्
[२]५१⁵ और २५४⁶ के दो दानपत्रों से तय्यार किया गया है. पहिले दानपत्र के अक्षरों में 'अ'
तीन प्रकार का है जिनमें से पहिले दो रूप नागरी हैं और तीसरा रूप तेलुगु-कनड़ी की शैली का है और
लिपिपत्र ४६ में दिये हुए 'अ' के दूसरे रूप से मिलता हुआ है. उ, ए, ग (पहिला), ज (दूसरा),
त (दूसरा), द और न (पहिला और दूसरा) नागरी से मिलते हुए ही हैं. दूसरे ताम्रपत्र के
अक्षरों में से अ, आ, इ, ट, ध और ष नागरी के ही हैं.
लिपिपत्रं ५८वें की मूल पंक्तियों⁷ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति अमरपुरानुकारिण [:] सर्व्वर्तु (तुं) सुखरम-
णीयाद्विजयवत [:] कलिङ्गा (ङ्ग) नगराधिवासका [त्] महेन्द्राच-
लामलशिखरप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरो [:] सक-
लभुवननिर्माणैकसूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणि (णे)-
१. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १२८ और १२६ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२२ और १२३ के बीच के प्लेटों से. इस लिपिपत्र में चिकाकोल के दानपत्र का संवत् गांगेय
सं. १४६ छुपा है जिसको शुद्ध कर पाठक १४८ पढें.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १३२ और १३३ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र से हैं.
५. इं. ऐं; जि. १३, पृ. २७४ और २७५ के बीच के सेटों से. ६. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १४४ और १४५ के बीच के सेटों से.
७. ये मूल पंक्तियां देवेंद्रवर्म्मन् के गांगेय संवत् [२]५१ के दानपत्र से हैं.
६४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र गंगवंशी राजा वज्रहस्त के पर्लाकिमेडी के दानपत्र१ से तय्यार किया गया है.
इस दानपत्र का लेखक उत्तरी और दक्षिणी शैली की भिन्न भिन्न लिपियों का ज्ञाता रहा हो और
उसने इसमें अपने लिपिसंबंधी विशेष ज्ञान का परिचय देने के विचार से ही भिन्न भिन्न लिपियों
का मिश्रण जान बूझ कर किया हो ऐसा अनुमान होता है. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. कीलहॉर्न ने
इस दानपत्र का संपादन करते समय इसके अक्षरों की गणना कर लिखा है कि प्रायः ७३० अक्षरों
में से ३२० नागरी में लिखे हैं और ४१० दक्षिणी लिपियों में२. प्राचीन लिपियों के सामान्य बोध-
वाले को भी इस लिपिपत्र के मूल अक्षरों को देखते ही स्पष्ट हो जायगा कि उनमें अ (पहिला),
आ (पहिला), ई, उ, ऋ, क (पहिले तीन रूप), ग (पहिला), च (पहिला), ज (पहिला), ड
(दूसरा), ण (पहिला), त (पहिला), द (पहिला व दूसरा), न (पहिला), प (पहिला), भ
(पहिला), म (पहिला), र (पहिला व दूसरा), ल (पहिला), व (पहिला), श (पहिला व दूसरा),
ष (पहिला), स (पहिला) और ह (पहिला व दूसरा) नागरी के ही हैं. दक्षिणी शैली के अक्षरों में
से अधिकतर तेलुगु-कनड़ी हैं और ग्रंथ लिपि के अक्षर कम हैं जैसे कि 'ग' (पांचवां), ण (चौथा और
पांचवां) और म (दूसरा).
लिपिपत्र ५६वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ॐ स्वस्त्यमरपुरानुकारिणः सर्व्वर्तुसुखरमणी-
याद्विजयवतः कलिङ्ग(ङ्क)नगरवासकान्महेन्द्राचलामलशिख-
रप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरोस्सकलभुवननिर्माणैक-
सूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणेर्भगवतो गोकर्णस्वामि-
१६-तामिळ लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दि से (लिपिपत्र ६०-६२).
यह लिपि मद्रास के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथ लिपि प्रचलित थी वहां के तथा उक्त इहाते के
पश्चिमी तट अर्थात् मलबार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में पल्लव, चोल, राजेन्द्रचोड आदि पूर्वी
चालुक्य एवं राष्ट्रकूट आदि वंशों के शिलालेखों तथा दानपत्रों में एवं साधारण पुरुषों के लेखों में ई. स.
की सातवीं शताब्दी से मिलती है. इस लिपि में 'अ' से 'औ'३ तक के स्वर, और व्यंजनों में केवल क, ङ, च,
ञ, ट, ण, त, न, प, म, य र, ल, व, ळ, ऴ, ऱ और ऩ के चिह्न हैं. ग, ज, ड, द, ब और श के उच्चारण भी
१. ऎं. इं; जि. ३, पृ. २२० और २२२ के बीच के सेटों से. २. ऎं. इं; जि. २, पृ. २२०.
३. अब तक जितने लेख प्राचीन तामिळ लिपि के मिले हैं उनमें 'औ' अक्षर नहीं मिला परंतु संभव है कि जैसे
'उ' के सिर की दाहिनी ओर नीचे को झुकी हुई खड़ी लकीर लगा कर 'ऊ' बनाया जाता था (देखो, लिपिपत्र ६० में
पल्लववंशी राजा नंदिवर्मन् के कशाकूडि के दानपत्र के अक्षरों में) वैसा ही चिह्न 'ओ' के साथ जोड़ने से 'औ' बनता
होगा; क्योंकि वर्तमान तामिळ में जो चिह्न 'ऊ' बनाने में 'उ' के आगे लिखा जाता है वही 'औ' बनाने में 'ओ' के आगे
रक्खा जाता है जो उक्त प्राचीन चिह्न का रूपांतर ही है.
तामिळ लिपि. ६५
तामिळ भाषा में मिलते हैं परंतु उन अक्षरों के लिये स्वतंत्र चिह्न नहीं हैं. 'ग' की ध्वनि 'क' से,
'ज' और 'श' की 'च' से, 'द' की 'त' से और 'ब' की 'प' से व्यक्त की जाती है जिसके लिये
विशेष नियम मिलते हैं. संयुक्त व्यंजन एक दूसरे से मिला कर नहीं किंतु एक दूसरे के पास लिखे जाते
हैं और कई लेखों में हलंत और सस्वर व्यंजन का भेद नहीं मिलता, तो भी कितने एक लेखों में संयुक्त
व्यंजनों में से पहिले के ऊपर बिंदी, वक्र या तिरछी रेखा लगा कर हलंत को स्पष्ट कर जतलाया है.
अनुस्वार का काम अनुनासिक वर्णों से ही लिया जाता है. इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ ही है
जिनमें से चार (ळ, ऴ, र और ण) को छोड़ देवें तो संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होनेवाले व्यंजनों में से तो
केवल १४ ही रह जाते हैं. ऐसी दशा में संस्कृत शब्द इसमें लिखे नहीं जा सकते, इसलिये जब उनके
लिखने की आवश्यकता होती है तब वे ग्रंथलिपि में ही लिखे जाते हैं. इस लिपि के अधिकतर अक्षर
ग्रंथ लिपि से मिलते हुए ही हैं और ई, क, और र आदि अक्षर उत्तरी ब्राह्मी से लिये हों ऐसा प्रतीत होता है;
क्योंकि उनकी खड़ी लकीरें सीधी ही हैं, नीचे के अंत से बाईं ओर मुड़ कर ऊपर को बढ़ी हुई नहीं हैं.
अन्य लिपियों की नांई इसमें भी समय के साथ परिवर्तन होते होते १० वीं शताब्दी के आस पास कितने
एक और १४ वीं शताब्दी के आस पास अधिकतर अक्षर वर्तमान तामिळ से मिलते जुलते हो गये.
फिर थोड़ा सा और परिवर्तन होकर वर्तमान तामिळ लिपि बनी. लिपिपत्र १ से ५६ तक के प्रत्येक पत्र
में पाठकों के अभ्यास के लिये मूल शिलालेखों या दानपत्रों से पंक्तियां दी हैं परंतु लिपिपत्र ६० से ६४
तक के पांच लिपिपत्रों में वे नहीं दी गई, जिसका कारण यही है कि संस्कृतज्ञ लोग उनका एक भी
शब्द समझ नहीं सकते. उनको केवल वे ही लोग समझते हैं जिनकी मातृभाषा तामिळ है या
जिन्होंने उक्त भाषा का अध्ययन किया है. तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी
विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं जिनसे तामिळ जाननेवालों को उस लिपि के प्राचीन लेखादि पढ़ने
में सहायता मिल सकेगी.
लिपिपत्र ६० वां.
यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा परमेश्वरवर्मन के कूरम के दानपत्र¹ तथा उसी वंश के राजा
नंदिवर्मन् के कशाकूडि² और उदयेंदिरम्³ के दानपत्रों के अंत के तामिळ अंशों से तय्यार किया
गया है. कूरम के दानपत्र के अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ओ, च, ज, ए, त, न, प, य और व
(पहिले) ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों की शैली के ही हैं. 'अ' और 'आ' में इतना ही अंतर है कि उन
की खड़ी लकीरों को ऊपर की तरफ दोहराया नहीं है. इस अंतर को छोड़कर इस ताम्रपत्र के
'अ' और लिपिपत्र ५२ में दिये हुए मामल्लपुरम् के लेखों के 'अ' (दूसरे) में बहुत कुछ समा-
नता है. क, ट, र और व (दूसरा) उत्तरी शैली की ब्राह्मी लिपि से मिलते हुए हैं. कशाकूडि
के दानपत्र का 'अ' कूरम के दानपत्र के 'अ' की ग्रंथि को लंबा करने से बना है. उदयेंदिरम्
के दानपत्र में हलंत और सस्वर व्यंजन में कोई भेद नहीं है.
लिपिपत्र ६१ वां.
यह लिपिपत्र पल्लवतिलकवंशी राजा दंतिवर्मन् के समय के तिरुवेळ्ळरै के लेख⁴, राष्ट्रकूट
१. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ३, प्लेट १२, पंक्ति ५७-८६ से.
२. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ४, प्लेट १४-५, पंक्ति १०५-१३३ से.
३. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २७७ के पास के प्लेट की पंक्ति १०५-१०६ से.
४. ऐं. इं; जि. ११, पृ. १५७ के पास के प्लेट से.
१६ प्राचीनलिपिमाला.
राजा कण्यरदेव (कृष्णराज तीसरे) के समय के तिरुक्कोवलूर १ और वेल्लूर २ के लेखों से तय्यार
किया गया है. इसमें क, ङ, ट, ण, प, य और व में लिपिपत्र ६० से कुछ परिवर्तन पाया
जाता है.
लिपिपत्र ६२ वां.
यह लिपिपत्र राजेन्द्रचोल (प्रथम) के तिरुमलै के चट्टान पर खुदे हुए लेख ३, पगन (बर्मा
में) से मिले हुए वैष्णव लेख ४, विजयनगर के राजा विरूपाक्ष के शोरेक्कावुर के शक सं. १३०८
(ई. स. १३८७) के दानपत्र ५ और महामंडलेश्वर वालककायम ६ के शक सं. १४०३ (ई. स. १४८२)
के जंबुकेश्वर के शिलालेख ७ से तय्यार किया गया है. तिरुमलै के चट्टान के लेख का 'ई' उत्तरी
शैली की ब्राह्मी का है क्योंकि उसकी दो बिंदियों के बीच की खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं
ओर मुड़ कर ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ नहीं है. यह 'ई' प्रायः वैसा ही है जैसा
कि मथुरा से मिले हुए संवत् ७६ के लेख ८ में मिलता है, और महाक्षत्रप ईश्वरदत्त के सिक्कों
(लिपिपत्र १०) और अमरावती के लेखों (लिपिपत्र १२) के 'ई' से भिन्न है क्योंकि उनमें
खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं ओर ऊपर को मुड़ा हुआ मिलता है. विरूपाक्ष के दानपत्र
और वालककामय के लेख के अक्षरों में से अधिकतर वर्तमान तमिळ अक्षरों से मिलते जुलते
हो गये हैं.
१७-वट्टेऴुत्तु लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दी के अन्त के आसपास से (लिपिपत्र ६३ से ६४).
यह लिपि तमिळ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर बहुधा गोलाई लिये हुए
या ग्रंथिदार होते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी विभाग में
ई. स. की ७ वीं शताब्दी के अंत के आसपास से चोल, पांड्य आदि वहां के राजवंशों के शिला-
लेखों और दानपत्रों में मिलता है. कुछ समय से इसका व्यवहार बिलकुल उठ गया है.
लिपिपत्र ६३ वां.
यह लिपिपत्र जटिलवर्मन् के समय के आनैमले के शिलालेख ९, उसी राजा के दानपत्र १०
और वरगुणपांड्य के अंबासमुद्रम् के लेख ११ से तय्यार किया गया है. आनैमले के लेख का 'अ' और
'आ' कूरम के दानपत्र (लिपिपत्र ६०) के उक्त अक्षरों के कुछ विकृत और घसीट रूप हैं. मुख्य अंतर
१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १४४ के पास के प्लेट, लेख G से.
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. ८२ के पास के प्लेट से. ३. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २३२ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १६४ के पास के प्लेट (लेखसंख्या २७) से.
५. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के प्लेटों से.
६. लिपिपत्र ६२ में वाकलकायम छप गया है जिसको शुद्ध कर पाठक वालककायम पढ़ें.
७. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ७२ के पास के प्लेट के नीचे के भाग से.
८. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२१ के पास के प्लेट चौथे में. इसी लेख की छाप उसी जिल्द के पृ. २०५ के पास के प्लेट
(लेख संख्या २०) में छपी है परंतु उसमें 'ई' स्पष्ट नहीं आया.
९. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३२० के पास के प्लेट, लेख दूसरे से. १०. इं. ऍ; जि. २२, पृ. ७० और ७१ के बीच के प्लेटों से.
११. ऍ. इं; जि. ६, पृ. १० के पास के प्लेट से.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
खरोष्ठी लिपि. ६७
यही है कि बाहर की ग्रंथि भीतर की ओर बनी है. 'इ' कूरम के दानपत्र के 'इ' के नीचे के अंश को
बाईं ओर न मोड़ कर दाहिनी ओर मोड़ने और घसीट लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है. उ,
क, ङ, च, ज, ट, ण, त, न, प, म, य, र, ल, व, ळ और ऱ लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के
घसीट रूप ही हैं. जटिलवर्मन् के दानपत्र का 'ई' प्राचीन तमिळ 'ई' (देखो, लिपिपत्र ६२) का
घसीट रूप मात्र है. 'ए' और 'ओ' लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के ही ग्रंथिवाले या
घसीट रूप हैं.
लिपिपत्र ६४ वां.
यह लिपिपत्र मांबळ्ळि से मिले हुए श्रीवल्लभंगौडै के कोल्लम् (कौलंब) संवत् १४९ (ई.
स. ९७४) के दानपत्र१, कोचीन से मिले हुए भास्कररविवर्मन् के दानपत्र२ और कोट्टयम् से
मिले हुए वीरराघव के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि में लिपिपत्र ६३ की
लिपि से जो कुछ अंतर पाया जाता है वह त्वरा से लिखे जाने के कारण ही समयानुसार हुआ है.
कोट्टयम् के दानपत्र में जो ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास का माना जा सकता है, 'ए',
ओर 'ओ' के दीर्घ और ह्रस्व रूप मिलते हैं. वर्तमान कनड़ी, तेलुगु, मलयाळम् और
तमिळ लिपियों में भी 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं, परंतु
१४ वीं शताब्दी के आसपास तक के तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ और तमिळ लिपियों के लेखों में यह भेद
नहीं मिलता; पहिले पहल यह वीरराघव के दानपत्र में ही पाया जाता है. अतएव संभव है कि
इस भेद का ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास तमिळ लिपि में प्रारंभ हो कर दूसरी लिपियों में
उसका अनुकरण पीछे से हुआ हो. नागरी लिपि में 'ए' और 'ओ' में ह्रस्व और दीर्घ का भेद नहीं
है इस लिये हमने 'ए' और 'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनको दीर्घ 'ए' और
दीर्घ 'ओ' के सूचक बनाया है.
१८-खरोष्ठी लिपि.
ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी से ई. स. की तीसरी शताब्दी तक (लिपिपत्र ६५ से ७०).
खरोष्ठी लिपि आर्य लिपि नहीं, किंतु अनार्य (सेमिटिक) अरमइक् लिपि से निकली हुई
प्रतीत होती है (देखो, ऊपर पृ. ३४-३६). जैसे मुसलमानों के राज्यसमय में ईरान की फ़ारसी लिपि का
हिंदुस्तान में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ अक्षर और मिलाने से हिंदी भाषा के मामूली पढ़े लिखे
लोगों के लिये काम चलाऊ उर्दू लिपि बनी वैसे ही जब ईरानियों का अधिकार पंजाब के कुछ अंश
पर हुआ तब उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का वहां प्रवेश हुआ, परंतु उसमें केवल २२ अक्षर,
जो आर्य भाषाओं के केवल १८ उच्चारणों को व्यक्त कर सकते थे, होने तथा
६८ प्राचीनलिपिमाला.
नये अक्षरों तथा ह्रस्व स्वरों की मात्राओं की योजना कर मामूली पढ़े हुए लोगों के लिये, जिनको शुद्धा-
शुद्ध की विशेष आवश्यकता नहीं रहती थी, काम चलाऊ लिपि बना दी (देखो, ऊपर पृ. ३५-३६).
यह लिपि फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है और आ, ई, ऊ, ऋ, ऐ और
औ स्वर तथा उनकी मात्राओं का इसमें सर्वथा अभाव है. संयुक्त व्यंजन भी बहुत कम मिलते हैं,
जिनमें भी कितने एक में तो उनके घटक व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं होते किंतु उनका
एक विलक्षण ही रूप मिलता है, जिससे कितने एक संयुक्त व्यंजनों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त
ही है. इसके लेख भारतवर्ष में विशेष कर पंजाब से ही मिले हैं अन्यत्र बहुत कम. यह लिपि
ईरानियों के राज्यकाल के कितने एक चांदी के मोटे और भद्दे सिक्कों, मौर्यवंशी राजा अशोक के
शहबाज़गढ़ी और मानसेरा के चटानों पर खुदे हुए लेखों, एवं शक, क्षत्रप, पार्थिअन और कुशनवंशी
राजाओं के समय के बौद्ध लेखों और बाकट्रिअन ग्रीक, शक, क्षत्रप, पार्थिअन, कुशन, औदुंबर आदि
राजवंशों के कितने एक सिक्कों पर या भोजपत्रों पर लिखे हुए प्राकृत पुस्तकों में मिलती है. इस
लिपि के शिलाओं आदि पर खुदे हुए लेखों की, जो अब तक मिले हैं, संख्या बहुत कम १ है. ई. स.
की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ न कुछ प्रचार पंजाब की तरफ़ बना रहा
जिसके बाद यह इस देश से सदा के लिये उठ गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया (विशेष
वृत्तान्त के लिये देखो, ऊपर पृ ३१-३७).
लिपिपत्र ६५ वां.
यह लिपिपत्र मौर्यवंशी राजा अशोक के शहबाज़गढ़ी और मान्सेरा के लेखों २ से तय्यार किया
गया है. उक्त लेखों से दिये हुए अक्षरों में सब स्वर 'अ' के साथ स्वरों की मात्रा लगा कर ही बनाये हैं
और कितने एक अक्षरों की बाईं ओर झुकी हुई खड़ी लकीर के नीचे के अंत को मोड़ कर कुछ ऊपर
की ओर बढ़ाया है [देखो, 'अ' (तीसरा), 'ख' (दूसरा), 'ग' (दूसरा), 'च' (तीसरा), 'ढ'
(दूसरा), 'न' (चौथा), 'प' (दूसरा), 'फ' (दूसरा), 'ब' (तीसरा), 'र' (तीसरा), 'व'
(दूसरा), और 'श' (दूसरा)]. 'ज' (दूसरे) की खड़ी लकीर के नीचे एक आड़ी लकीर और
जोड़ी है. 'म' (चौथे) की बाईं ओर अपूर्ण वृत्त और 'म' (पांचवें) के नीचे के भाग में तिरछी
लकीर अधिक लगाई है. 'र' (दूसरे) की तिरछी खड़ी लकीर के नीचे के अंत से दाहिनी ओर
एक आड़ी लकीर ३ और लगाई है. यह लकीर संयुक्ताक्षर में दूसरे आनेवाले 'र' का चिह्न है परंतु
उक्त लेखों में कहीं कहीं यह लकीर बिना आवश्यकता के भी लगी हुई मिलती है और वर्डक से
मिले हुए पीतल के पात्र पर के लेख में तो इसकी भरमार पाई जाती है जो उक्त लेखों के लेखकों
का शुद्ध लिखना न जानना प्रकट करती है ४. इन लेखों में 'इ' की मात्रा एक खड़ी या तिरछी
१. खरोष्ठी लिपि के लेखों के लिये देखो ऊपर पृष्ठ ३२, टिप्पण ७-६, और पृष्ठ ३३, टिप्पण १-२.
२. पं. इं; जि. १, पृ. १६ के पास का प्लेट. ज. ए; ई. स. १८९० में छपे हुए प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् सेनार्ट के 'नोट्स डी'
ऐपिग्राफे इंडियने' (संख्या १) नामक लेख के अंत के मान्सेरा के लेखों के २ सेट; और 'डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्कि-
आलॉजी इन इंडिया' के भेजे हुए अशोक के शहबाज़गढ़ी के लेखों के फोटो से.
३. पं. इं; जि. २, पृ. १६ के पास के सेट की पंक्ति १ में 'देवनं प्रियो प्रियद्रशि रज' में 'रय' के 'र' के नीचे 'र'
की सूचक जो आड़ी लकीर लगी है वह बिलकुल स्पष्ट है. यहां 'र' के साथ दूसरा 'र' जुड़ ही नहीं सकता. ऐसी दशा में
इस लकीर को या तो 'र' का अंश ही या निरर्थक मानना पड़ता है. अशोक के उक्त लेखों में ऐसी ही 'र' सूचक निरर्थक
लकीरें अन्यत्र जहां 'र' की संभावना नहीं है वहां भी लगी हुई मिलती है (जैसे कि उक्त पहिली पंक्ति में 'सवप्रषंडनि'
में 'प' के साथ, जहां 'पर्षड' (पाषंड) शब्द में 'र' का सर्वथा अभाव है, आदि).
४. अब तक राजपूताना के कई महाजन लोग. जिनको अक्षरों का ही ज्ञान होता है और जो संयुक्ताक्षर तथा स्वरों की
मात्राओं का शुद्ध लिखना नहीं जानते, अपनी लिखावट में ऐसी अशुद्धियां करने के अतिरिक्त स्वरों की मात्राएं या तो
खरोष्ठी लिपि. ६६
लकीर है जो अक्षर के ऊपर के भाग या मध्य को काटती हुई लगती है (देखो, इ, कि, गि, चि, जि,
ठि, णि, ति, मि, शि और सि). 'उ' की मात्रा सीधी आड़ी या घुमावदार लकीर है जो अक्षर के
नीचे के अंत (या कभी कुछ ऊंचे) से बाईं ओर जुड़ती है (देखो, उ, गु, चु, तु, धु, नु, यु, बु और
हु). 'ए' की मात्रा एक तिरछी या खड़ी लकीर है जो बहुधा अक्षर के ऊपर के भाग के साथ
और कभी कभी मध्य में ऊपर की तरफ़ जुड़ती है (देखो, ए, जे, ते, ने, दे, ये और षे). 'ओ'
की मात्रा एक तिरछी रेखा है जो बहुधा अक्षर के मध्य से बाईं ओर को झुकती हुई लगती है
(देखो, ओ, चो, नो, मो और सो, परंतु 'यो' में उसका झुकाव दाहिनी ओर है). अनुस्वार का
चिह्न एक आड़ी सीधी या वक्र रेखा है जो बहुधा अक्षर के अंत भाग से सटी रहती है (देखो, अं,
थं, रं, वं और षं) परंतु कभी कभी अक्षर की खड़ी लकीर के अंत से कुछ ऊपर उक्त खड़ी लकीर को
काटती हुई भी लगती है (देखो, झं, नं और हं). 'मं' (प्रथम) के साथ का अनुस्वार का चिह्न
'म' से विलग नीचे को लगा है, 'म' (दूसरे) में दाहिनी ओर भिन्न रूप में जुड़ा है और 'यं'
के साथ उसके दो विभाग करके 'य' की नीचे को झुकी हुई दोनों तिरछी रेखाओं के अंतों में
एक एक जोड़ा है. इन लेखों में रेफ कहीं नहीं है. रेफ को या तो संयुक्ताक्षर का दूसरा अक्षर
बनाया है (जैसे कि 'सर्व' को 'स्रव') या उसको पूर्व के अक्षर के नीचे 'र' के रूप से जोड़ा है
('प्रियदर्शी' को 'प्रियद्रशि', 'धर्म' को 'ध्रम' आदि). संयुक्ताक्षर में दूसरे 'र' के लिये एक
आड़ी, तिरछी या कुछ गोलाईदार लकीर है जो व्यंजन के नीचे के अंत के साथ दाहिनी ओर जुड़ती
है, परंतु कहीं कहीं 'र' का योग न होने पर भी ऐसी लकीर अधिक जुड़ी हुई मिलती १ है
जिससे यह संदेह रह जाता है कि कहां यह अनावश्यक है और कहां ठीक है ('प्रियद्रशि पढ़ें
या 'पियदशि'; 'स्रवप्रषंडनि' या 'सवपषंडनि' आदि). संयुक्ताक्षरों में कहीं कहीं भिन्न वर्णों के
रूप स्पष्ट नहीं हैं (देखो, न्त्रि).
लिपिपत्र ६५वें की मूल पंक्तियों २ का नागरी अक्षरांतर-
देवनं प्रियो प्रियद्रशि रय सवप्र(प)षंडनि गृहठनि
च पुजेति दनेन विविधये च पुजये नो चु त-
थ दन व पुज व देवनं प्रियो मजति यथ कि-
ति सलवढि सिय सवप्र(प)षंडनं सलवढि तु.
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र ग्रीक (युनानी), शक, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के सिक्कों ३ से तय्यार
किया गया है. ग्रीकों के सिक्कों से लिये हुए अक्षरों में कहीं कहीं 'त', 'द' और 'न' में स्पष्ट
बिल्कुल नहीं लगाते अथवा बिना किसी विचार के उनका प्रयोग करते हैं अर्थात् जहां मात्रा की आवश्यकता नहीं होती वहां कोई
भी मात्रा लगा देते हैं और जहां मात्रा की अपेक्षा रहती है वहां उसे या तो छोड़ जाते हैं या अशुद्ध मात्रा लगा देते हैं. ऐसी
लिखावटों के अक्षरों को राजपूतानावाले 'केवळां अक्षर' (केवल अक्षर संकेत) कहते हैं और पुरानी महाजनी लिखावटें
विशेष कर ऐसी ही मिलती हैं. ऐसी लिखावटों से ही 'काकाजी अजमेर गया' (ककज अजमर गय) के स्थान में 'का-
काजी आज मर गया' पढ़े जाने की कथा प्रसिद्ध है.
१ देखो. ऊपर पृष्ठ ६८ टिप्पण ३.
२ ये मूल पंक्तियां अशोक के शहबाजगढ़ी के लेख से हैं (एं. इं; जि. १ पृष्ठ १६ के पास के सेट से).
३ ग्रीकों (यूनानियों) के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; सेट ४-१५. सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट १-६.
व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १-६. शक, पार्थिअन और कुशनवंशियों के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; प्लेट १६-२४.
सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट ८-६. व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १०-१७.
१०० प्राचीनलिपिमाला.
अंतर नहीं है (देखो, 'त' का चौथा रूप, 'द' का दूसरा रूप और 'न' का तीसरा रूप). कहीं
कहीं 'म' के नीचे आड़ी लकीर या बिंदी और 'ह' के नीचे भी बिंदी लगी मिलती है. 'खे'
के साथ के रेफ को अक्षर के नीचे लगाया है परंतु उसको ग्रंथि का सा रूप देकर संयुक्ताक्षर
में आनेवाले दूसरे 'र' से भिन्न बतलाने का यत्न पाया जाता है और शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों में यह भेद अधिक स्पष्ट किया हुआं मिलता है (देखो 'र्व'). शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों से जो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये गये हैं उनमें कई अक्षरों की लकीरों के प्रारंभ या
अंत में ग्रंथियां लगाई हैं वे, संभव है कि, अक्षरों में सुंदरता लाने के लिये ही हों. 'फ' की
ऊपर की दाहिनी ओर की लकीर नीचे की ओर नहीं किंतु ऊपर की तरफ़ बढ़ाई है.
लिपिपत्र ६६वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस भ्रमिकस हेलियक्रेयस. महरजस भ्रमिकस जयधरस
अर्खेबियस. महरजस चतरस मेनद्रस. महरजस अपडिहतस
फिलसिनस. महरजस चतरस अयंतस हिपुस्त्रतस. महरजस
चतरस हेरमथस. रजतिरजस महतस मोअस. महरजस रजरजस
महतस अयसं. महरजस रजरजस महतस अयिलिषस.
लिपिपत्र ६७ वां.
यह लिपिपत्र क्षत्रप राजुल के समय के मथुरा से मिले हुए सिंहाकृतिवाले स्तंभसिरे के
लेखों², तक्षशिला से मिले हुए क्षत्रप पतिक के ताम्रलेख³ और वहीं से मिले हुए एक पत्थर
के पात्रपर के लेख⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र के अक्षरों में 'उ' की मात्रा का रूप
ग्रंथि बनाया है और 'न' तथा 'ण' में बहुधा स्पष्ट अंतर नहीं पाया जाता. मथुरा के लेखों
में कहीं कहीं 'त', 'न' तथा 'र' में भी स्पष्ट अंतर नहीं है.
लिपिपत्र ६७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिहिलेन⁵ सिहरखितेन च भ्रातरेहि तखशिलए अयं थुवो प्र-
तिथवितो सवबुधन पुयए* *तखशिलये नगरे उत-
रेण प्रचु देशो क्षेम नम अच ···ये पतिको अप्रतिठवित ˙
१. ये मूल पंक्तियां ग्रीक आदि राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से हैं.
२. ऐं. इं.; जि. ६, पृष्ठ १३६ और १४६ के बीच के प्लेटों से.
३. ऐं. इं.; जि. ४, पृष्ठ ५६ के पास के प्लेट से. इस ताम्रलेख में अक्षर रेखारूप में नहीं खुदे हैं किंतु बिंदियों से
बनाये हैं. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के बाद के कुछ ताम्रपत्र ऐसे ही बिंदियों से खुदे हुए भी देखने
में आये जिनमें से सब से पिछला २० वर्ष पहिले का है. कई तांबे और पीतल के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम इसी
तरह बिंदियों से खुदे हुए भी देखने आते हैं. ताम्रपत्रादि बहुधा सुनार या लुहार खोदते हैं. उनमें जो अच्छे कारीगर होते
हैं वे तो जैसे अक्षर स्याही से लिखे होते हैं वैसे ही खोद लेते हैं परंतु जो अच्छे कारीगर नहीं होते या ग्रामीण होते हैं वे
बहुधा स्याही से लिखे हुए अक्षरों पर बिंदियां बना देते हैं. यह त्रुटि खोदनेवाले की कारीगरी की ही है.
४. ऐं. इं.; जि. ८, पृष्ठ २४६ के पास के प्लेट से.
५. 'सिहिलेन' से लगाकर 'पुयए' तक के लेख में तीन बार 'ण' या 'न' आया है जिसको दोनों ही तरह पढ़
सकते हैं, क्योंकि उस समय के आसपास के खरोष्ठी लिपि के कितने एक लेखों में 'न' और 'ण' में स्पष्ट भेद नहीं पाया जाता.
- . यहां तक का लेख तक्षशिला के पत्थर के पात्र से है.
˙ . यहां से लगाकर अंत तक का लेख तक्षशिला से मिले हुए ताम्रलेख से लिया है.
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खरोष्ठी लिपि. १०१
लिपिपत्र ६८ वां.
यह लिपिपत्र पार्थिअनवंशी राजा गंडोफरस के समय के तख्त-इ-बाही के शिलालेख¹, कुशन-
वंशी राजा कनिष्क के समय के सुएविहार (बहावलपुर राज्य में) के ताम्रलेख², शाहजी की ढेरी
(कनिष्क विहार) के स्तूप से मिले हुए कांसे के पात्र पर के राजा कनिष्क के समय के तीन
लेखों³ और भेडा के शिला लेख⁴ से तय्यार किया गया है. सुएविहार के ताम्रलेख में 'ष्य' और
'स्य'⁵ के नीचे का ग्रंथिदार अंश 'य' का सूचक है.
लिपिपत्र ६८वें की मूल पंक्तियों⁶ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस्य रजतिरजस्य देवपुत्रस्य कनिष्कस्य संवत्सरे एकदुशे
सं १० १⁷ दइसिकस्य मसस्य दिवसे अठविशे दि २० ४ ४⁸ उच्च दि-
वसे भिक्षुस्य नगदतस्य संखके( ?)तिस्य अचर्यदमचतशिष्यस्य
अचर्यभवप्रशिष्यस्य यठिं अरोषयतो इह दमने विहरस्वामिनि
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र वर्डक से मिले हुए पीतल के पात्र पर खुदे हुए कुशनवंशी राजा हुविष्क के
समय के लेख९, कुशनवंशी वाझेष्प के पुत्र कनिष्क के समय के आरा के लेख१० और पाजा¹¹ तथा
कलदरा¹२ के शिलालेखों से तय्यार किया गया है. वर्डक के पात्रपर का लेख बिंदियों से खुदा
है और उसमें कई जगह अक्षरों के नीचे के भाग से दाहिनी ओर 'र' सूचक आड़ी लकीर
निरर्थक लगी है, जैसे कि भग्रवद्¹³ (भगवद्=भगवत्), अग्रभग (अग्रभग=अग्रभाग), नतिग्र
१. ज. प; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. ११६ और प्लेट (देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ६).
२. इं. पँ; जि. १०, पृ. ३२५ के पास के प्लेट से. ३. आ. स. रि; ई. स. १६०६-१०, प्लेट ५३. ये लेख भी बिंदियों से खुदे हैं.
४. ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६ और प्लेट.
५. पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इनको 'ष्ष' और 'स्स' पढ़ा है (इं. पँ; जि. ११, पृ. १२८) परंतु इनको 'ष्य'
और 'स्य' पढ़ना ही ठीक होगा. यह वृत्तांत लिखते समय मेरे पास एक गुप्तलिपि के प्राकृत लेख की छाप आई जिसमें
'छन्दसेठिस्य' स्पष्ट है. संस्कृतमिश्रित प्राकृत लेखों में 'स्स' के स्थान में 'स्य' विभक्ति-प्रत्यय का होना कोई आश्चर्य की
बात नहीं है.
६. ये मूल पंक्तियां सुएविहार के ताम्रलेख से हैं. ७. १० १ =१०+१=११.
८. २० ४ ४ =२०+४+४=२८. ९. इं. पँ; जि. ११, पृ. २१० और २११ के बीच के प्लेटों से.
१०. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ५८ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
११. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६४ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
१२. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६६ के पास का प्लेट, लेख पहिला.
१३. भारतवर्ष की किसी प्राचीन प्राकृत भाषा में 'भगवत्' का 'भग्रवद्' और 'अग्रभाग' का 'अग्रभग' रूप नहीं
होता. ऐसी दशा में जैसे अशोक के खरोष्ठी लेखों में 'त्य' (देखो, ऊपर पृ. ६६) के 'त' के नीचे ऐसी ही लकीर लगी है वहां 'र्त'
किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता वैसे ही 'अग्रवद' और 'अग्रभग' आदि पढ़ना अशुद्ध ही है. अशोक के लेखों में (देखो,
लिपिपत्र ६५) जैसे 'ज' (दूसरे), और 'म' (चौथे), तथा ग्रीकों के सिक्कों में (लिपिपत्र ६६) 'ज' (पांचवें, छठे और
सातवें), त (दूसरे, तीसरे और चौथे), 'न' (पहिले व दूसरे), 'म' (पहिले) और 'स' (पहिले) के नीचे दोनों
तरफ निकली हुई आड़ी लकीरें बिना किसी आशय के लगी मिलती हैं वैसे ही इस लेख में इस लकीर का होना संभव है;
जो कलम को उठा कर दोनों तरफ निकली हुई न बना कर चलती कलम से दाहिनी ओर ही बना दी जान पड़ती है.
इसलिये इस रेखा को पूरे 'ग' का अंश ही मानना चाहिये. ऐसे ही 'भि' के साथ ऐसी लकीर कहीं कहीं निरर्थक लगी
है जहां उसको या तो 'मि' का अंश ही मानना चाहिये अथवा उसको 'भिम' पढ़ना चाहिये. जहां 'र' की संभावना हो
नहीं 'भ्रि' पढ़ना चाहिये.
, जिनमें से दो मिट्टी के
Line 15:
पात्रों पर स्याही से लिखे हुए⁶ हैं और तीसरा एक मूर्ति के नीचे⁷ खुदा है, तय्यार किया गया
Line 16:
है. तक्षशिला के रौप्यपत्र पर का लेख बिंदियों से खुदा है.
Line 17:
लिपिपत्र ७०वें की मूल पंक्तियों⁸ का नागरी अक्षरांतर—
Line 18:
स १०० २० १० ४ २⁹ अयस अपडस मसस दिवसे १० ४ १¹⁰ इऋ दिवसे
Wait, look at "इऋ": is it "इऋ" or "इश"?
In Kharosthi: "isa divase" (on this day).
In Naagari transcription:
Is that "इश" or "इऋ"?
Look at the character: it is 'इ' followed by 'श' or 'ऋ'?
Let's look at line 5:
"तथा 'य' और 'श' में स्पष्ट अंतर नहीं है"
Look at line 18:
"इ" followed by "श": wait, look at the loop: it has a loop with a tail, like 'श' or 'ऋ'?
Wait, in line 19: "लोताफ़िऋपुचन"? No! "लोताफ़िक़पुचन" or "लोताफ़िक्र"?
Wait, let's look at the Taxila silver scroll inscription:
"sa 1
१६—ब्राह्मी और उससे निकली हुई लिपियों के अंक.
(लिपिपत्र ७१ से ७६ के उत्तरार्द्ध के प्रथम खंड तक).
प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों तथा हस्तलिखित पुस्तकों के देखने से पाया जाता है
कि लिपियों की तरह प्राचीन और अर्वाचीन अंकों में भी अंतर है. यह अंतर केवल उनकी
आकृति में ही नहीं किंतु अंकों के लिखने की रीति में भी है. वर्तमान समय में जैसे १ से
९ तक अंक और शून्य इन १० चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चलता है वैसे प्राचीन
काल में नहीं था. उस समय शून्य का व्यवहार ही न था और दहाइयों, सैकड़ों, हज़ार आदि
के लिये भी अलग चिह्न थे. अंकों के संबंध में इस शैली को 'प्राचीन शैली' और जिसमें शून्य
का व्यवहार है उसको 'नवीन शैली' कहेंगे.
प्राचीन शैली के अंक
प्राचीन शैली में १ से ९ तक के अंकों के ९ चिह्न; १०, २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८० और
९० इन ९ दहाइयों के लिये ९ अलग चिह्न; और १०० तथा १००० के लिये एक एक अलग चिह्न
नियत था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में). इन २० चिह्नों से ९९९९९
तक की संख्या लिखी जा सकती थी. लाख, करोड़, अरब आदि के लिये जो चिह्न थे उनका पता
अब तक नहीं लगा क्योंकि शिलालेख अथवा दानपत्रों में लाख¹ या उसके आगे का कोई चिह्न नहीं
मिला.
इन अंकों के लिखने का क्रम १ से ९ तक तो वैसा ही था जैसा कि अब है. १० के लिये
नवीन शैली के अंकों की नांई १ और ० नहीं किंतु एक नियत चिह्न ही लिखा जाता था; ऐसे ही २०,
३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८०, ९०, १०० और १००० के लिये भी अपना अपना चिह्न मात्र लिखा जाता
था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में).
११ से ९९ तक लिखने का क्रम ऐसा था कि पहिले दहाई का अंक लिख कर उसके आगे
इकाई का अंक रक्खा जाता था, जैसे कि १५ के लिये १० का चिह्न लिख उसके आगे ५; ३३ के
लिये ३० और ३; ६३ के लिये ६० तथा ३, इत्यादि (देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक).
१. प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने अगाध परिश्रम के साथ तुर्कस्तान से जो अमूल्य प्राचीन सामग्री
प्राप्त की है उसमें कुछ खरड़े ऐसे भी हैं जिन पर भारतवर्ष की गुप्तलिपि से निकली हुई तुर्कस्तान की ई. स. की छठी
शताब्दी के आसपास की आर्य लिपि में स्वर, व्यंजन, स्वरों की १२ मात्राओं (ऋ ॠ और ऌ ॡ को छोड़ कर) की बारहखड़ी
(द्वादशाक्षरी) तथा किसी में प्राचीन शैली के अंक भी दिये हुए हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५२ और ४५८ के
बीच के प्लेट १ से ४ तक). एक खरड़े में १ से १००० तक के वहां के प्रचलित प्राचीन शैली के चिह्नों के पीछे दो और चिह्न
की ✪ ऐसे हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५५) जिनको प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने क्रमशः १०००० और १००००० के
चिह्न माना है, परंतु हमको उन चिह्नों को १०००० और १००००० के सूचक मानने में शंका होती है. संभव है कि इनमें
से पहिला चिह्न १००००० का सूचक हो और दूसरा केवल समाप्ति (विराम) का चिह्न हो. उसको अंकसूचक चिह्न
मानना संदिग्ध ही है.
१०४ प्राचीनलिपिमाला.
२०० के लिये १०० का चिह्न लिख उसकी दाहिनी ओर, कभी ऊपर कभी मध्य और कभी नीचे
की तरफ़, आड़ी ( सीधी, तिरछी या वक्र ) रेखा जोड़ी जाती थी१. ३०० के लिये १०० के चिह्न के साथ
वैसे ही दो लकीरें जोड़ी जाती थीं. ४०० से ९०० तक के लिये १०० का चिन्ह लिख उस के साथ क्रमशः ४ से ९
तक के अंक एक छोटी सी आड़ी लकीर२ से जोड़ देते थे. १०१ से ९९९ तक लिखने में सैकड़े के अंक
के आगे दहाई और इकाई के अंक लिखे जाते थे, जैसे कि १२९ के लिये १००, २०, ९; ९५५ के लिये
९००, ५०, ५. यदि ऐसे अंकों में दहाई का अंक नहीं हो तो सैकड़े के बाद इकाई का अंक रक्खा
जाता था, जैसे कि ३०१ के लिये ३००, १. ( देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक ).
२००० के लिये १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को एक छोटीसी सीधी आड़ी ( या नीचे
को मुड़ी हुई ) लकीर जोड़ी जाती थी और ३००० के लिये वैसी ही दो लकीरें. ४००० से ९०००
तक और १०००० से ९०००० तक के लिये १००० के चिह्न के आगे ४ से ९ तक के और १० से ९० तक
के चिह्न क्रमशः एक छोटी सी लकीर से जोड़े जाते थे ( देखो, लिपिपत्र ७५ ). ११००० के वास्ते
१०००० लिख, पास ही १००० लिखते थे. इसी तरह २१००० के लिये २००००, १०००; ९९०००
के लिये ९००००, ९००० लिखते थे. ऐसे ही ९९९९९ लिखने हो तो ९००००, ९०००, ९००,
९०, ९ लिखने थे. यदि सैकड़ा और दहाई के अंक न हों तो हज़ार के अंक के आगे इकाई का अंक
लिखा जाता था, जैसे कि ९००१ लिखना हो तो ९०००, १.
उपर्युक्त प्राचीन अंकों के चिह्नों में से १, २, और ३ के चिह्न तो क्रमशः -, = और ≡ आड़ी
लकीरें हैं जो अब तक व्यापारियों की बहियों में रुपयों के साथ आने लिखने में एक, दो और तीन के
लिये व्यवहार में आती हैं. पीछे से इन लकीरों में वक्रता आने लगी जिससे १ की लकीर से वर्तमान
नागरी आदि का १ बना, और २ तथा ३ की वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से वर्तमान नागरी आदि
के २ और ३ के अंक बने हैं. बाकी के चिह्नों में से कितने एक अक्षरों से प्रतीत होते हैं और जैसे समय
के साथ अक्षरों में परिवर्तन होता गया वैसे ही उनमें भी परिवर्तन होता रहा. प्राचीन शिलालेख
और दानपत्रों में ४ से १००० तक के चिह्नों के, अक्षरों से मिलते हुए, रूप नीचे लिखे अनुसार पाये
जाते हैं-
४-अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न 'क' के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर
गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति 'प्क' से कुछ कुछ मिलती होने
लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप 'प्क' जैसा मिलता है. क्षत्रपों और
आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में 'प्क' ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत
किये हुए चिह्नों में से चौथे में 'क' की खड़ी लकीर को बाईं तरफ़ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा
दिया है जिससे उसकी आकृति 'प्कृ' सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में 'क' की
दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, 'क' के मध्य
की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति
'प्र' के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के 'प्क' और
'प्र' से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी 'प्क' और 'प्र' से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन
वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत ९ चिह्नों में से पहिला 'प्क', दूसरा 'प्की', तीसरा और चौथा 'त्क',
१. यह रीति ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी और उसके पीछे के शिलालेखादि में मिलती है. अशोक के लेखों में इससे
कुछ भिन्नता पाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७४ के पूर्वार्द्ध में अशोक के लेखों से दिये हुए २०० के अंक के तीन रूप).
२. पिछले लेखों में कहीं कहीं यह लकीर नहीं भी लगाई जाती थी (देखो, लिपिपत्र ७४ के उत्तरार्द्ध में भिन्न भिन्न
लेखों से उद्धृत किये हुए अंकों में ४०० और ७०० तथा प्रतिहारों के दानपत्रों में ९००.)
अंक १०५
पांचवा 'द्रुक' और छठा 'म' के समान है. नेपाल के लेखों में 'प्क', और भिन्न भिन्न लेख व
दानपत्रों की पंक्ति में 'रुक्क' मिलता है (देखो, लिपिपत्र ७१ और ७२ के पूर्वार्द्ध की
तीन पंक्तियां). ४ का मूल चिह्न 'क' सा था जिस पर सिर की गोलाईदार या कोषदार रेखा
लगाने से उसकी आकृति कुछ कुछ 'प्क' से मिलती हुई बनी. लेखकों की भिन्न भिन्न लेखन-
शैली, सुंदरता लाने के यत्न और चलती कलम से पूरा अंक लिखने से उपर्युक्त भिन्न भिन्न रूप बने
हैं. आगे के अंकों का इस प्रकार का विवेचन करने में लेख बहुत बढ़ जाने की संभावना होने
के कारण बहुधा भिन्न भिन्न अक्षरों के नाम मात्र लिखे जायेंगे जिनको पाठक लिपिपत्र ७१ से
७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में दिये हुए अंकों से मिला कर देख लेवें.
५-इस अंक के चिह्न त, ता, पु, हु, रु, तृ, तृा, ना, न, ह, हू और ह अक्षरों से मिलते हुए
पाये जाते हैं.
६-के लिये 'ज', स (?), फ्र, फ्रा, फा, फ और हा से मिलते जुलते चिह्न मिलते हैं, तो
भी जग्गयपेट, गुप्तों और पल्लव आदि के लेखों से दिये हुए इस अंक के चिह्न ठीक तरह किसी
अक्षर से नहीं मिलते, वे अंकसंकेत ही हैं. उनको अक्षरों से मिलाने का यत्न करना खैंचतान
ही है.
७-के चिह्न ग्र, गु और ग से मिलते जुलते हैं.
८-के चिह्न ह्र, ह्रा, ह, हा, उ, पु, ट, टा, र, ब्र और द्वा से मिलते हुए हैं, परंतु कुछ चिह्न ऐसे
हैं जो अक्षर नहीं माने जा सकते.
९-नानाघाट के, कुशनवंशियों के और क्षत्रपों तथा आंध्रवंशियों के लेखों में जो ९ के चिह्न
मिलते हैं उनकी किसी प्रकार अक्षरों में गणना नहीं हो सकती. पीछे से अंतर पड़ने पर उसके
चिह्न ओ, उ और ओं (के कल्पित चिह्न) से बनते गये.
१०-नानाघाट के, कुशनवंशियों के, क्षत्रपों तथा आंध्रों के लेखों; क्षत्रपों के सिक्कों, जग्गयपेट
के लेखों तथा गुप्तादिकों के लेखादि में तो १० का अंकसंकेत ही है क्यों कि उसकी किसी अक्षर
से समानता नहीं हो सकती परंतु पीछे से उसकी आकृति यै, ह, दृ, ख और लृ से मिलती
हुई बन गई.
२०-का चिह्न 'थ' था जो पीछे के परिवर्तनों में भी उसी अक्षर के परिवर्तित रूपों के
सदृश बना रहा.
३०-का चिह्न 'ल' के सदृश ही मिलता है.
४०-का चिह्न 'प्त' और 'स' से मिलता हुआ मिलता है.
५०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. केवल भिन्न भिन्न लेखादि से उद्धृत किये
हुए इस अंक के चिह्नों में से दूसरा दक्षिणी शैली के 'ब' से मिलता है.
६०-का चिह्न 'प', 'पु' या 'प्र' से मिलता हुआ है.
७०-का चिह्न 'स', 'ग्र', रो, 'ग्रा', 'प्र' या 'हू' से मिलता है.
८०-का चिह्न उपध्मानीय के चिह्न से मिलता हुआ है (देखो, लिपिपत्र १७ में उदयगिरि के
लेख के अक्षरों में उपध्मानीय का चिह्न).
९०-का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. यदि उपध्मानीय के चिह्न के मध्य में एक आड़ी
लकीर और बढ़ा दी जावे तो उसकी आकृति क्षत्रपों के सिक्कों से उद्धृत किये हुए इस चिह्न के
दूसरे रूप से मिल जायगी.
१०६ प्राचीनलिपिमाला.
१००-नानाघाट के लेख में इस अंक का चिह्न 'सु' अथवा 'अ' से मिलता हुआ है क्योंकि उक्त
दोनों अक्षरों की आकृति उस समय परस्पर बहुत मिलती हुई थी. पिछले लेखों में सु, अ,
लु, से, सो और सौ से मिलते हुए रूप मिलते हैं, परंतु नासिक के लेखों और क्षत्रपों के सिक्कों
में इसके जो रूप मिलते हैं उनकी उस समय के किसी अक्षर से समानता नहीं है.
२००-अशोक के लेखों में मिलनेवाले इस अंक के तीन चिह्नों में से पहिला 'सु' है,
परंतु दूसरे दो रूप उस समय के किसी अक्षर से नहीं मिलते. नानाघाट के लेख का रूप 'आ'
के समान है. गुप्तों आदि के लेखों का दूसरा रूप 'ला' से मिलता हुआ है और भिन्न भिन्न
लेखादि से उद्धृत किये हुए इस अंक के दो रूपों में से दूसरा 'सू' से मिलता है. नासिक के
लेखों, क्षत्रपों के सिक्कों, वलभी के राजाओं तथा कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों में मिलनेवाले
इस अंक के रूप किसी अक्षर से नहीं मिलते.
३००-का अंक १०० के अंक की दाहिनी ओर २ आड़ी या गोलाईदार लकीरें लगाने से
बनता है. १०० के सूचक अक्षर के साथ ऐसी दो लकीरें कहीं नहीं लगती, इसलिये इसकी
किसी मात्रासहित अक्षर के साथ समानता नहीं हो सकती. ४०० से ६०० तक के चिह्न, १००
के चिह्न के आगे ४ से ६ तक के अंकों के जोड़ने से बनते थे, उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
१०००-का चिह्न नानाघाट के लेख में 'रो' के समान है. नासिक के लेखों में 'धु' अथवा
'चु' से मिलता हुआ है और वाकाटकवंशियों के दानपत्रों में उनकी लिपि के 'थु' के समान है.
२००० और ३००० के चिह्न, १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को क्रमशः एक और
दो आड़ी लकीरें जोड़ने से बनते थे. इसलिये उनकी किसी अक्षर से समानता नहीं हो सकती.
४००० से ६००० तक के अंक, १००० के चिह्न के आगे क्रमशः ४ से ६ तक के, और १००००
से ६०००० तक के अंक, १००० के आगे १० से ६० तक की दहाइयों के चिह्न जोड़ने से बनते थे
इसलिये उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
ऊपर प्राचीन शैली के अंकों की जिन जिन अक्षरों से समानता बतलाई गई है उसमें सब के
सब अक्षर उक्त अंकों से ठीक मिलते हुए ही हों ऐसा नहीं है. कोई कोई अक्षर ठीक मिलते
हैं बाकी की समानता ठीक वैसी है जैसी कि नागरी के वर्तमान अक्षरों के सिर हटाने के बाद उनका
नागरी के वर्तमान अंकों से मिलान करके यह कहा जाय कि २ का अंक 'र' से, ३ 'रू'
से, ५ 'प' से, ६ 'द' से, ७ 'उ' की मात्रा से और ८ 'ट' से मिलता जुलता है. १, २, ३,
५०, ८० और ६० के प्राचीन उपलब्ध रूपों और अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के
दूसरे व तीसरे रूपों (देखो, लिपिपत्र ७४) से यही पाया जाता है कि ये चिह्न तो सर्वथा
अक्षर नहीं थे किंतु अंक ही थे. ऐसी दशा में यही मानना पड़ेगा कि प्रारंभ में १ से १०००
तक के सब अंक वास्तव में अंक ही थे. यदि अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों, का सूचक माना
होता तो उनका कोई क्रम अवश्य होता और सब के सब अंक अक्षरों से ही बतलाये जाते,
परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि प्रारंभ में ये सब अंक ही थे. अनायास से किसी अंक का
रूप किसी अक्षर से मिल जाय यह बात दूसरी है; जैसे कि वर्तमान नागरी का २ का अंक
उसी लिपि के 'र' से, और गुजराती के २ (२) और ५ (५) के अंक उक्त लिपि के र (२) और
१. एक, दो और तीन के प्राचीन चिह्न तो स्पष्ट ही संख्यासूचक हैं और अशोक की लिपि में चार का चिह्न जो 'क'
अक्षर से मिलता हुआ है वह संभव है कि चौराहे या स्वस्तिक का सूचक हो. ऐसे ही और अंकों के लिए भी कोई
कारण रहा होगा.
प (५) से बिलकुल मिलते हुए हैं. कभी कभी अक्षरों की नांई अंकों के भी सिर बनाने से उनकी
आकृतियां कहीं कहीं अक्षरों सी बनती गईं१. पीछे से अंकचिह्नों को अक्षरों के से रूप देने की
चाल बढ़ने लगी और कितने एक लेखकों ने और विशेषकर पुस्तकलेखकों ने उनको सिरसहित
अक्षर ही बना डाला जैसा कि बुद्धगया से मिले हुए महानामन् के शिलालेख२, नेपाल
के कितने एक लेखों३ तथा प्रतिहारवंशियों के दानपत्रों४ से पाया जाता है. तो भी १, २, ३, ५०,
८० और ६० तो अपने परिवर्तित रूपों में भी प्राचीन रूपों से ही मिलते जुलते रहे और किन्हीं
अक्षरों में परिणत न हुए.
शिलालेखों और ताम्रपत्रों के लेखक जो लिखते थे वह अपनी जानकारी से लिखते थे, परंतु
पुस्तकों की नक़ल करनेवालों को तो पुरानी पुस्तकों से ज्यों का त्यों नक़ल करना पड़ता था. ऐसी
दशा में जहां वे मूल प्रति के पुराने अक्षरों या अंकों को ठीक ठीक नहीं समझ सके वहां वे अवश्य
चूक कर गये. इसीसे हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों में जो अंकसूचक अक्षर मिलते हैं उनकी संख्या
अधिक है जिनमें और कई अशुद्ध रूप दर्ज हो गये हैं.
[L13
१०८ प्राचीनलिपिमाला.
६०-जु, वु, घु, थु, र्धु, थू, र्धू, र्ध, र्धु और घु.
७०-चु, च्, थू, र्थी, घू और र्म्न.
८०-हृ, १ 𑀏, 𑀐, 𑀑, 𑀒 और पु.
९०-𑀓, 𑀔, 𑀕, 𑀖 और 𑀗.
१००-सु, सू, लु और अ.
२००-सु, सू, सु, आ, लू और र्घू.
३००-स्ता, स्त्रा, णा, सा, सु, सुं और स्वः
४००-सो, स्तो और स्ता.
ऊपर लिखे हुए अंकसूचक संकेतों में १, २ और ३ के लिये क्रमशः ए, द्वि और त्रि;
स्व, स्ति और श्री; और ओं, न और मः मिलते हैं; वे प्राचीन क्रम के कोई रूप नहीं है किंतु
पिछले लेखकों के कल्पित हैं. उनमें से ए, द्वि और त्रि तो उन्ही अंकों के वाचक शब्दों के पहिले
अक्षर हैं और स्व, स्ति और श्री तथा ओं, न और मः मंगल वाचक होने से इनको प्रारंभ के तीन
अंकों का सूचक मान लिया है. एक ही अंक के लिये हस्तलिखित पुस्तकों में कई भिन्न अक्षरों के होने
का कारण कुछ तो प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में और कुछ पुस्तकों से नक़ल करने में लेखकों की ग़लती
है, जैसे २० के अंक का रूप ‘थ’ के समान था जिसकी आकृति पीछे से ‘घ’ से मिलती हुई होने से
लेखकों ने ‘थ’ को ‘घ’, फिर ‘घ’ को ‘ध्व’ और ‘प’ पढ़ा होगा. इसी तरह दूसरे अंकों के लिये
भी अशुद्धियां हुई होंगी.
प्राचीन शिलालेखों और दानपत्रों में सब अंक एक पंक्ति में लिखे जाते थे परंतु हस्तलिखित पुस्तकों
के पन्नों में चीनी अक्षरों की नांई एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. ई. स. की छठी शताब्दी के
आस पास के मि. बावर के प्राप्त किये हुए पुस्तकों में भी पत्रांक इसी तरह एक दूसरे के नीचे लिखे
मिलते हैं. पिछले पुस्तकों में एक ही पन्ने पर प्राचीन और नवीन दोनों शैलियों से भी अंक लिखे मिलते
हैं. पत्रे की दूसरी तरफ़ के दाहिनी ओर के ऊपर की तरफ़ के हाशिये पर तो अक्षरसंकेत से,
जिसको अक्षरपल्ली कहते थे; और दाहिनी तरफ़ के नीचे के हाशिये पर नवीन शैली के अंकों से,
जिनको अंकपल्ली कहते थे. इस प्रकार के अंक नेपाल, पाटण (अणहिलवाड़ा), खंभात और उदयपुर
(राजपूताना में) आदि के पुस्तकमंडारों में रक्खे हुए पुस्तकों में पाये जाते हैं. पिछले हस्तलिखित पुस्तकों
में अक्षरों के साथ कभी कभी अंक, तथा खाली स्थान के लिये शून्य भी लिखा हुआ मिलता है,
जैसे कि ३३ = $\frac{ला}{३}$, १०० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
० \end{smallmatrix}}$, १०२ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
२ \end{smallmatrix}}$, १३१ = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ला
१ \end{smallmatrix}}$, १५० = $\frac{सु}{\begin{smallmatrix} ०
५ \end{smallmatrix}}$, २०६ = $\frac{सू}{\begin{smallmatrix} ०
६ \end{smallmatrix}}$ आदि. नेपाल के बौद्ध, तथा
गुजरात, राजपूताना आदि के जैन पुस्तकों में यही अक्षरक्रम ई. स. की १६ वीं शताब्दी तक कहीं
कहीं मिल आता है और दक्षिण की मलयालम् लिपि के पुस्तकों ३ में अब तक अक्षरों से अंक
१. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र २१, २४, ४७).
२. यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र ३८, ४२, ४४).
३. मलयालम् लिपि के पुस्तकों में बहुधा अब तक इस प्रकार अक्षरों में अंक लिखने की रीति चली आती है. डॉव.
गुंडर्ट ने अपने मलयालम् भाषा के व्याकरण (दूसरे संस्करण) में अक्षरों से बतलाये जाने वाले अंकों का ब्योरा इस तरह
दिया है—
१=न. २=ल. ३=न्य. ४=क्क. ५=ड्र. ६=हा (ह). ७=ग्र. ८=ट्रे (?). १०=म. २०=य. ३०=ल.
४०=प्त. ५०=व. ६०=च. ७०=रू (तु). ८०=च. ९०=ण. १००=ञ. (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६६, पृ. ७६०).
इनमें भी प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में गलती होना पाया जाता है जैसे कि ६ का सूचक ‘हा’, ‘फ’ को ‘ह’ पढ़ने से ही हुआ
है. उस लिपि में ‘फ’ और ‘ह’ की आकृति बहुत मिलती हुई है (देखो, लिपिपत्र ८१). ऐसे ही और भी अशुद्धियां हुई हैं.
बतलाने का प्रचार बना हुआ है; परंतु उनके देखने से पाया जाता है कि उनके लेखक सर्वथा
प्राचीन क्रम को भूले हुए थे और 'मक्षिकास्थाने मक्षिका' की नांई केवल प्राचीन पुस्तकों के अनु-
सार पत्रांक लगा देते थे.
शिलालेख और दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो केवल
प्राचीन क्रम से ही अंक लिखे मिलते हैं. पहिले पहिल गुर्जरवंशी किसी राजा के ताम्रपत्र के
दूसरे पत्रे में, जो [कलचुरि] संवत् ३४६ (ई. स. ५९५) का है, नवीन शैली से अंक दिये हुए
मिलते हैं अर्थात उसमें क्रमशः ३, ४ और ६ के अंक हैं. उक्त संवत के पीछे कहीं प्राचीन शैली
से और कहीं नवीन शैली से अंक लिखे जाने लगे और १० वीं शताब्दी के मध्य तक प्राचीन शैली
का प्रचार कुछ कुछ रहा१; फिर तो उठ ही गया२ और नवीन शैली से ही अंक लिखे जाने लगे.
उसके पीछे का केवल एक ही लेख ऐसा मिला है, जो नेपाल के मानदेव के समय का
[नेवार] सं. २५६ (ई. स. ११३६) का है और जिसमें अंक प्राचीन शैली से दिये हैं३.
भारतवर्ष में अंकों की यह प्राचीन शैली कब से प्रचलित हुई इसका पता नहीं चलता परंतु
अशोक के सिद्धापुर, सहस्राम और रूपनाथ के लेखों में इस शैली के २००, ५० और ६ के अंक मिलते
हैं जिनमें से २०० का अंक४ तीनों लेखों में बिलकुल ही भिन्न प्रकार का है और ५० तथा ६ के दो दो
प्रकार के रूप मिलते हैं. २०० के भिन्न भिन्न तीन रूपों से यही कहा जा सकता है कि ई. स. पूर्व
की तीसरी शताब्दी में तो अंकों की यह शैली कोई नवीन बात नहीं किंतु सुदीर्घ काल से चली आती
रही होगी. यदि ऐसा न होता तो अशोक के लेखों में २०० के अंक के एक दूसरे से बिलकुल ही
भिन्न तीन रूप सर्वथा न मिलते. अशोक से पूर्व उक्त अंकों के चिह्न कैसे थे और किन किन
परिवर्तनों के बाद वे उन रूपों में परिणत हुए इस विषय में कहने के लिये अब तक कोई साधन
उपलब्ध नहीं हुआ.
कई विद्वानों ने जैसे ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न भिन्न कल्पनाएं की हैं वैसे ही
इन प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति के विषय में भी की हैं जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है-
प्रथम ई. स. १८३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने यह अनुमान किया कि ये अंक उनके सूचक शब्दों के
प्रथम अक्षर हैं, जिसको वोप्के आदि कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने स्वीकार भी किया.
१. यद्यपि शिलालेखों और दानपत्रों में प्राचीन शैली के अंकों का प्रचार १०वीं शताब्दी के मध्य तक कुछ न कुछ
पाया जाता है तो भी ताम्रपत्रों के लेखक ई. स. की आठवीं शताब्दी से ही उस शैली के अंकों के लिखने में ग़लतियां
करने लग गये थे. वलभी के राजा शीलादित्य (छठे) के गुप्त सं. ४४१ के दानपत्र में १०० के साथ जुड़नेवाले ४ के अंक के
स्थान में ४० का अंक जोड़ दिया है (इं. ऐं; जि. ६ पृ. १६ के पास का सेट), और पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् के
गांगेय सं. १८३ के दानपत्र में ८० के स्थान पर ८ का और ३ के स्थान पर ३० का चिह्न ('लो', 'ल' का घसीट रूप) लिखा
है और २० के लिये २ के आगे बिंदी लगा कर एक ही दानपत्र में प्राचीन और नवीन शैली का मिश्रण भी कर दिखाया
है (ए. इं; जि. ३, पृ. १३३ के पास का सेट).
२. तामिळ लिपि में अब तक अंक प्राचीन शैली से ही लिखे जाते हैं; नवीन शैली के अंकों का प्रचार अब होने लगा है.
थोड़े समय पूर्व के छपे हुए पुस्तकों में पत्रांक प्राचीन शैली से ही दिये हुए मिलते हैं परंतु अब नवीन शैली से देने लगे हैं.
तामिळ अंकों के लिये देखो, लिपिपत्र ८१ में तामिळ लिपि.
३. बें; ज. ने; पृ. ८१.
४. अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के अंक के भिन्न भिन्न ३ चिह्नों के लिये देखो लिपिपत्र ७४ का पूर्वार्द्ध. उक्त
चिह्नों में से दूसरा सहस्राम के लेख से है. करीब ८०० वर्ष पीछे उसीका किंचित् बदला हुआ रूप फिर मथुरा से मिली
हुई गुप्त सं. २३० (ई. स. ५४६) की एक बौद्ध मूर्ति के नीचे के लेख (सी; गु; इं; सेट४० D) में मिलता है; बीच में कहीं नहीं
मिलता. कभी कभी लेखकों को अक्षरों या अंकों के प्राचीन चिह्नों की स्मृति रहने का यह अद्भुत उदाहरण है.
११० प्राचीनलिपिमाला.
पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इन अंकों के उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर होने न होने
के विषय में कुछ न कह कर भारतवर्ष के प्राचीन अंकों के विषय के अपने लेख में ई. स. १८७७ में
लिखा है कि 'अंकों की उत्पत्ति के विषय में मेरा विश्वास है कि मैं निश्चय के साथ यह प्रतिपादन
कर सकता हूं कि पहिले तीन अंकों को छोड़ कर बाकी सब के सब अक्षरों या संयुक्ताक्षरों के सूचक हैं
और भिन्न भिन्न वंशों के लेखों और [भिन्न भिन्न] शताब्दियों में उन (अंकों) की आकृतियों में
जो अंतर पाया जाता है उसका मुख्य कारण उक्त समय और वंशों के अक्षरों का अंतर ही है'१.
डॉ. बूलर ने उक्त लेख के साथ ही अपनी संमति प्रकट करते समय लिखा है कि 'प्रिन्सेप का यह
पुराना कथन, कि अंक उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर हैं, छोड़ देना चाहिये. परंतु अब
तक इस प्रश्न का संतोषदायक समाधान नहीं हुआ. पंडित भगवानलाल ने आर्यभट और
गंवशास्त्र की अक्षरों द्वारा अंक सूचित करने की रीति को भी जांचा परंतु उसमें सफलता न हुई
(अर्थात् अक्षरों के क्रम की कोई कुंजी न मिली); और न मैं इस रहस्य की कोई कुंजी प्राप्त करने का
दावा करता हूं. मैं केवल यही बतलाऊंगा कि इन अंकों में अनुनासिक, जिह्वामूलीय और उपध्मा-
नीय का होना प्रकट करता है कि उन (अंकों) को ब्राह्मणों ने निर्माण किया था, न कि वाणियाओं
(महाजनों) ने और न बौद्धों ने जो प्राकृत को काम में लाते थे'२.
प्रो. कर्न ने ई. स. १८७७ में 'इंडियन ऐंटिक्केरी' के संपादक को एक पत्र के द्वारा यह सूचित
किया कि 'मैं सामान्यतः बूलर के इस कथन से सहमत हूं कि अंक ब्राह्मणों ने निर्माण किये थे'३.
ई. स १८७८ में बर्नल ने लिखा कि 'अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षरों से इन [अंक]
चिह्नों की उत्पत्ति मानना बिलकुल असंभव है क्योंकि उनकी दक्षिणी अशोक (ब्राह्मी) अक्षरों
से, जो अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षर हैं, बिलकुल समानता नहीं है'४. परंतु बर्नल ने ब्राह्मी
अक्षरों की उत्पत्ति फिनिशियन अक्षरों से होना तो मान ही रक्खा था; इससे इन अंकों की उत्पत्ति
भी बाहरी स्रोत से होना अनुमान करके लिखा कि 'इस (अंक) क्रम की इजिप्ट (मिसर) के
डेमोटिक् अंकक्रम से सामान्य समानता, मेरे विचार में, इस कामचलाऊ अनुमान के लिये बस
होगी कि अशोक के अंकक्रम की उत्पत्ति उसी (डिमोटिक्) क्रम से हुई है, परंतु इसका विकास
भारतवर्ष में हुआ है'५.
फिर इ. सी. बेले ने 'वर्तमान अंकों का वंशक्रम' नामक विस्तृत लेख ६ में यह बतलाने का यत्न
किया कि 'भारतीय अंकशैली का सिद्धान्त मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से निकला है, तो भी
भारतीय अंकचिह्नों में से अधिकतर फिनिशियन, बाक्ट्रिअन और अक्केडिअन अंकों या अक्षरों से
लिये हुए हैं; परंतु कुछ थोड़ेसों की विदेशी उत्पत्ति प्रमाणित नहीं हो सकती'.
इस पर ई. स. १८८६ में बूलर ने लिखा कि 'बेले का कथन, यह मानने से बड़ी आपत्ति उपस्थित
करता है कि हिंदुओं ने [अंक] भिन्न भिन्न चार या पांच स्रोतों से लिये, जिनमें से कुछ तो बहुत
प्राचीन और कुछ बहुत अर्वाचीन हैं. परंतु उसके लेख के साथ प्रकट किया हुआ मिसर और भारत
के अंकों के मिलान का नक्शा और उन दोनों में सैंकड़ों के अंकों के बनाने की रीति की समानता के
बारे में उसका कथन, भगवानलाल की कल्पना को छोड़ देने और कुछ परिवर्तन के साथ बर्नल के
कथन को, जिससे बार्थ भी सहमत है, स्वीकार करने को प्रस्तुत करता है. मुझे यह संभव प्रतीत
१. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४४. २. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४८. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. १४२. ४. ब; सा. इं. पे; पृ. ६०.
५. ब; सा. इं. पे; पृ. ६५. ६. ज. रॉ. ए. सो. (न्यू सीरीज़) जि. १४, पृ. ३३५ से और जि. १५, पृ. १ से.