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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 318 में से

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पृष्ठ 123

६४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र गंगवंशी राजा वज्रहस्त के पर्लाकिमेडी के दानपत्र१ से तय्यार किया गया है.
इस दानपत्र का लेखक उत्तरी और दक्षिणी शैली की भिन्न भिन्न लिपियों का ज्ञाता रहा हो और
उसने इसमें अपने लिपिसंबंधी विशेष ज्ञान का परिचय देने के विचार से ही भिन्न भिन्न लिपियों
का मिश्रण जान बूझ कर किया हो ऐसा अनुमान होता है. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. कीलहॉर्न ने
इस दानपत्र का संपादन करते समय इसके अक्षरों की गणना कर लिखा है कि प्रायः ७३० अक्षरों
में से ३२० नागरी में लिखे हैं और ४१० दक्षिणी लिपियों में२. प्राचीन लिपियों के सामान्य बोध-
वाले को भी इस लिपिपत्र के मूल अक्षरों को देखते ही स्पष्ट हो जायगा कि उनमें अ (पहिला),
आ (पहिला), ई, उ, ऋ, क (पहिले तीन रूप), ग (पहिला), च (पहिला), ज (पहिला), ड
(दूसरा), ण (पहिला), त (पहिला), द (पहिला व दूसरा), न (पहिला), प (पहिला), भ
(पहिला), म (पहिला), र (पहिला व दूसरा), ल (पहिला), व (पहिला), श (पहिला व दूसरा),
ष (पहिला), स (पहिला) और ह (पहिला व दूसरा) नागरी के ही हैं. दक्षिणी शैली के अक्षरों में
से अधिकतर तेलुगु-कनड़ी हैं और ग्रंथ लिपि के अक्षर कम हैं जैसे कि 'ग' (पांचवां), ण (चौथा और
पांचवां) और म (दूसरा).
लिपिपत्र ५६वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ॐ स्वस्त्यमरपुरानुकारिणः सर्व्वर्तुसुखरमणी-
याद्विजयवतः कलिङ्ग(ङ्क)नगरवासकान्महेन्द्राचलामलशिख-
रप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरोस्सकलभुवननिर्माणैक-
सूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणेर्भगवतो गोकर्णस्वामि-
१६-तामिळ लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दि से (लिपिपत्र ६०-६२).
यह लिपि मद्रास के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथ लिपि प्रचलित थी वहां के तथा उक्त इहाते के
पश्चिमी तट अर्थात् मलबार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में पल्लव, चोल, राजेन्द्रचोड आदि पूर्वी
चालुक्य एवं राष्ट्रकूट आदि वंशों के शिलालेखों तथा दानपत्रों में एवं साधारण पुरुषों के लेखों में ई. स.
की सातवीं शताब्दी से मिलती है. इस लिपि में 'अ' से 'औ'३ तक के स्वर, और व्यंजनों में केवल क, ङ, च,
ञ, ट, ण, त, न, प, म, य र, ल, व, ळ, ऴ, ऱ और ऩ के चिह्न हैं. ग, ज, ड, द, ब और श के उच्चारण भी
१. ऎं. इं; जि. ३, पृ. २२० और २२२ के बीच के सेटों से. २. ऎं. इं; जि. २, पृ. २२०.
३. अब तक जितने लेख प्राचीन तामिळ लिपि के मिले हैं उनमें 'औ' अक्षर नहीं मिला परंतु संभव है कि जैसे
'उ' के सिर की दाहिनी ओर नीचे को झुकी हुई खड़ी लकीर लगा कर 'ऊ' बनाया जाता था (देखो, लिपिपत्र ६० में
पल्लववंशी राजा नंदिवर्मन् के कशाकूडि के दानपत्र के अक्षरों में) वैसा ही चिह्न 'ओ' के साथ जोड़ने से 'औ' बनता
होगा; क्योंकि वर्तमान तामिळ में जो चिह्न 'ऊ' बनाने में 'उ' के आगे लिखा जाता है वही 'औ' बनाने में 'ओ' के आगे
रक्खा जाता है जो उक्त प्राचीन चिह्न का रूपांतर ही है.