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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 318 में से

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पृष्ठ 130

खरोष्ठी लिपि. १०१
लिपिपत्र ६८ वां.
यह लिपिपत्र पार्थिअनवंशी राजा गंडोफरस के समय के तख्त-इ-बाही के शिलालेख¹, कुशन-
वंशी राजा कनिष्क के समय के सुएविहार (बहावलपुर राज्य में) के ताम्रलेख², शाहजी की ढेरी
(कनिष्क विहार) के स्तूप से मिले हुए कांसे के पात्र पर के राजा कनिष्क के समय के तीन
लेखों³ और भेडा के शिला लेख⁴ से तय्यार किया गया है. सुएविहार के ताम्रलेख में 'ष्य' और
'स्य'⁵ के नीचे का ग्रंथिदार अंश 'य' का सूचक है.
लिपिपत्र ६८वें की मूल पंक्तियों⁶ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस्य रजतिरजस्य देवपुत्रस्य कनिष्कस्य संवत्सरे एकदुशे
सं १० १⁷ दइसिकस्य मसस्य दिवसे अठविशे दि २० ४ ४⁸ उच्च दि-
वसे भिक्षुस्य नगदतस्य संखके( ?)तिस्य अचर्यदमचतशिष्यस्य
अचर्यभवप्रशिष्यस्य यठिं अरोषयतो इह दमने विहरस्वामिनि
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र वर्डक से मिले हुए पीतल के पात्र पर खुदे हुए कुशनवंशी राजा हुविष्क के
समय के लेख९, कुशनवंशी वाझेष्प के पुत्र कनिष्क के समय के आरा के लेख१० और पाजा¹¹ तथा
कलदरा¹२ के शिलालेखों से तय्यार किया गया है. वर्डक के पात्रपर का लेख बिंदियों से खुदा
है और उसमें कई जगह अक्षरों के नीचे के भाग से दाहिनी ओर 'र' सूचक आड़ी लकीर
निरर्थक लगी है, जैसे कि भग्रवद्¹³ (भगवद्=भगवत्), अग्रभग (अग्रभग=अग्रभाग), नतिग्र
१. ज. प; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. ११६ और प्लेट (देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ६).
२. इं. पँ; जि. १०, पृ. ३२५ के पास के प्लेट से. ३. आ. स. रि; ई. स. १६०६-१०, प्लेट ५३. ये लेख भी बिंदियों से खुदे हैं.
४. ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६ और प्लेट.
५. पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इनको 'ष्ष' और 'स्स' पढ़ा है (इं. पँ; जि. ११, पृ. १२८) परंतु इनको 'ष्य'
और 'स्य' पढ़ना ही ठीक होगा. यह वृत्तांत लिखते समय मेरे पास एक गुप्तलिपि के प्राकृत लेख की छाप आई जिसमें
'छन्दसेठिस्य' स्पष्ट है. संस्कृतमिश्रित प्राकृत लेखों में 'स्स' के स्थान में 'स्य' विभक्ति-प्रत्यय का होना कोई आश्चर्य की
बात नहीं है.
६. ये मूल पंक्तियां सुएविहार के ताम्रलेख से हैं. ७. १० १ =१०+१=११.
८. २० ४ ४ =२०+४+४=२८. ९. इं. पँ; जि. ११, पृ. २१० और २११ के बीच के प्लेटों से.
१०. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ५८ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
११. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६४ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
१२. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६६ के पास का प्लेट, लेख पहिला.
१३. भारतवर्ष की किसी प्राचीन प्राकृत भाषा में 'भगवत्' का 'भग्रवद्' और 'अग्रभाग' का 'अग्रभग' रूप नहीं
होता. ऐसी दशा में जैसे अशोक के खरोष्ठी लेखों में 'त्य' (देखो, ऊपर पृ. ६६) के 'त' के नीचे ऐसी ही लकीर लगी है वहां 'र्त'
किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता वैसे ही 'अग्रवद' और 'अग्रभग' आदि पढ़ना अशुद्ध ही है. अशोक के लेखों में (देखो,
लिपिपत्र ६५) जैसे 'ज' (दूसरे), और 'म' (चौथे), तथा ग्रीकों के सिक्कों में (लिपिपत्र ६६) 'ज' (पांचवें, छठे और
सातवें), त (दूसरे, तीसरे और चौथे), 'न' (पहिले व दूसरे), 'म' (पहिले) और 'स' (पहिले) के नीचे दोनों
तरफ निकली हुई आड़ी लकीरें बिना किसी आशय के लगी मिलती हैं वैसे ही इस लेख में इस लकीर का होना संभव है;
जो कलम को उठा कर दोनों तरफ निकली हुई न बना कर चलती कलम से दाहिनी ओर ही बना दी जान पड़ती है.
इसलिये इस रेखा को पूरे 'ग' का अंश ही मानना चाहिये. ऐसे ही 'भि' के साथ ऐसी लकीर कहीं कहीं निरर्थक लगी
है जहां उसको या तो 'मि' का अंश ही मानना चाहिये अथवा उसको 'भिम' पढ़ना चाहिये. जहां 'र' की संभावना हो
नहीं 'भ्रि' पढ़ना चाहिये.