प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंकलिंग लिपि. ६३
लिपिपत्र ५७ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र¹, राजा इंद्रवर्म्मन् (दूसरे)
के चिकाकोल के दानपत्र² और राजा देवेंद्रवर्म्मन् के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. अच्युतपुरम्
के दानपत्र के अक्षरों के सिर मध्यदेशी लिपि की नांई संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं
और अ, आ, क, र आदि अक्षर समकोणवाले हैं. 'न' नागरी का सा है और बाकी के अक्षर
तेलुगु-कनड़ी से मिलते हुए हैं. चिकाकोल के दानपत्र के अक्षरों के भी सिर चौकूंटे, भीतर से भरे
हुए हैं, और 'म्' ग्रंथ लिपि की शैली का है.
लिपिपत्र ५७वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति सर्व्वतुरमणीयाद्विजयकलिङ्गनगरात्सकलभुवन-
निर्म्माणैकसूत्रधारस्य भगवतो गोकर्णस्वामिनश्चरणकम-
लयुगलप्रणामादपगतकलिकलङ्को विनयनयसम्पदा-
माधारः स्वासिधारापरिस्पन्दाधिगतसकलकलिङ्गाधिराज्यश्चतु-
रुदधितरङ्गमेखलावनितलप्रविततामलयशः अनेकसम-
लिपिपत्र ५८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्रवर्म्मन् दूसरे (अनंतवर्मन् के पुत्र) के गांगेय संवत्
[२]५१⁵ और २५४⁶ के दो दानपत्रों से तय्यार किया गया है. पहिले दानपत्र के अक्षरों में 'अ'
तीन प्रकार का है जिनमें से पहिले दो रूप नागरी हैं और तीसरा रूप तेलुगु-कनड़ी की शैली का है और
लिपिपत्र ४६ में दिये हुए 'अ' के दूसरे रूप से मिलता हुआ है. उ, ए, ग (पहिला), ज (दूसरा),
त (दूसरा), द और न (पहिला और दूसरा) नागरी से मिलते हुए ही हैं. दूसरे ताम्रपत्र के
अक्षरों में से अ, आ, इ, ट, ध और ष नागरी के ही हैं.
लिपिपत्रं ५८वें की मूल पंक्तियों⁷ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति अमरपुरानुकारिण [:] सर्व्वर्तु (तुं) सुखरम-
णीयाद्विजयवत [:] कलिङ्गा (ङ्ग) नगराधिवासका [त्] महेन्द्राच-
लामलशिखरप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरो [:] सक-
लभुवननिर्माणैकसूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणि (णे)-
१. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १२८ और १२६ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२२ और १२३ के बीच के प्लेटों से. इस लिपिपत्र में चिकाकोल के दानपत्र का संवत् गांगेय
सं. १४६ छुपा है जिसको शुद्ध कर पाठक १४८ पढें.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १३२ और १३३ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र से हैं.
५. इं. ऐं; जि. १३, पृ. २७४ और २७५ के बीच के सेटों से. ६. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १४४ और १४५ के बीच के सेटों से.
७. ये मूल पंक्तियां देवेंद्रवर्म्मन् के गांगेय संवत् [२]५१ के दानपत्र से हैं.