प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें६२
प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र ५५ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
क्षि(क्षो)रोदम् मथितम् मनोभिरतुलम्(लं) देवासुरैर्मंदरं
हित्वाक्षिप्त इवाञ्जनाद्रिरिव यत्तक्षाधिकम्(कं) राज-
ते यो भोगि(गौ)न्द्रनिविष्टमूत्ति(र्त्ति)रनिशम् भूयोमृतस्या-
शये रक्षो[द्]वः सुरदृ(वृ)न्दवन्दितपत(द)द्वन्द्वः स्स(न्दस्स)
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र पांड्यवंशी राजा सुंदरपांड्य के श्रीरंगम् के लेख², आलंपूंडि से मिले हुए विजय-
नगर के यादव राजा विरूपाक्ष के शक सं. १३०५ (ई. स. १३८३) के दानपत्र³ और वहीं के श्रीगिरि-
भूपाल के शक सं. १३४६ (ई. स. १४२४) के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में
दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ठ, ड, ण, त, थ, द, ध, न,
प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे थोड़ा सा और अंतर पड़ने पर वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी.
लिपिपत्र ५६ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
हरिः ओम् स्वस्ति श्रौः येनासौ
करुणामनीयत दशां श्रीरंगपत्मा(द्मा)करः
कृत्वा तम् भुवनान्तरप्रणयिनं करुणा-
१५—कलिंग लिपि.
ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ५७ से ५६).
कलिंग लिपि मद्रास इहाते के चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में कलिंगनगर के गंगा-
वंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास से ११ वीं शताब्दी के आस पास
तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र, जो अब तक मिला है, पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्र-
वर्मन् का गांगेय संवत् ८७ का है. उसकी लिपि में मध्यप्रदेशी लिपि का अनुकरण पाया जाता है
क्योंकि अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और कई अक्षर समकोण वाले हैं
(देखो, ऊपर पृ. ४४). पिछले दानपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं किंतु पश्चिमी एवं तेलुगु-कनड़ी
लिपि की नांई गोलाईदार मिलते हैं और उनमें तेलुगु-कनड़ी के साथ साथ कुछ ग्रंथ तथा नागरी
लिपि का मिश्रण भी पाया जाता है.
१. ये मूल पंक्तियां उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.
२. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास के प्लेट से.
३. ए. इं; जि. ३, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३१२ और ३१३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां श्रीरंगम् के लेख से हैं.