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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 318 में से

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पृष्ठ 126

खरोष्ठी लिपि. ६७
यही है कि बाहर की ग्रंथि भीतर की ओर बनी है. 'इ' कूरम के दानपत्र के 'इ' के नीचे के अंश को
बाईं ओर न मोड़ कर दाहिनी ओर मोड़ने और घसीट लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है. उ,
क, ङ, च, ज, ट, ण, त, न, प, म, य, र, ल, व, ळ और ऱ लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के
घसीट रूप ही हैं. जटिलवर्मन् के दानपत्र का 'ई' प्राचीन तमिळ 'ई' (देखो, लिपिपत्र ६२) का
घसीट रूप मात्र है. 'ए' और 'ओ' लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के ही ग्रंथिवाले या
घसीट रूप हैं.
लिपिपत्र ६४ वां.
यह लिपिपत्र मांबळ्ळि से मिले हुए श्रीवल्लभंगौडै के कोल्लम् (कौलंब) संवत् १४९ (ई.
स. ९७४) के दानपत्र१, कोचीन से मिले हुए भास्कररविवर्मन् के दानपत्र२ और कोट्टयम् से
मिले हुए वीरराघव के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि में लिपिपत्र ६३ की
लिपि से जो कुछ अंतर पाया जाता है वह त्वरा से लिखे जाने के कारण ही समयानुसार हुआ है.
कोट्टयम् के दानपत्र में जो ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास का माना जा सकता है, 'ए',
ओर 'ओ' के दीर्घ और ह्रस्व रूप मिलते हैं. वर्तमान कनड़ी, तेलुगु, मलयाळम् और
तमिळ लिपियों में भी 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं, परंतु
१४ वीं शताब्दी के आसपास तक के तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ और तमिळ लिपियों के लेखों में यह भेद
नहीं मिलता; पहिले पहल यह वीरराघव के दानपत्र में ही पाया जाता है. अतएव संभव है कि
इस भेद का ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास तमिळ लिपि में प्रारंभ हो कर दूसरी लिपियों में
उसका अनुकरण पीछे से हुआ हो. नागरी लिपि में 'ए' और 'ओ' में ह्रस्व और दीर्घ का भेद नहीं
है इस लिये हमने 'ए' और 'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनको दीर्घ 'ए' और
दीर्घ 'ओ' के सूचक बनाया है.
१८-खरोष्ठी लिपि.
ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी से ई. स. की तीसरी शताब्दी तक (लिपिपत्र ६५ से ७०).
खरोष्ठी लिपि आर्य लिपि नहीं, किंतु अनार्य (सेमिटिक) अरमइक् लिपि से निकली हुई
प्रतीत होती है (देखो, ऊपर पृ. ३४-३६). जैसे मुसलमानों के राज्यसमय में ईरान की फ़ारसी लिपि का
हिंदुस्तान में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ अक्षर और मिलाने से हिंदी भाषा के मामूली पढ़े लिखे
लोगों के लिये काम चलाऊ उर्दू लिपि बनी वैसे ही जब ईरानियों का अधिकार पंजाब के कुछ अंश
पर हुआ तब उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का वहां प्रवेश हुआ, परंतु उसमें केवल २२ अक्षर,
जो आर्य भाषाओं के केवल १८ उच्चारणों को व्यक्त कर सकते थे, होने तथा