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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 318 में से

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पृष्ठ 128

खरोष्ठी लिपि. ६६
लकीर है जो अक्षर के ऊपर के भाग या मध्य को काटती हुई लगती है (देखो, इ, कि, गि, चि, जि,
ठि, णि, ति, मि, शि और सि). 'उ' की मात्रा सीधी आड़ी या घुमावदार लकीर है जो अक्षर के
नीचे के अंत (या कभी कुछ ऊंचे) से बाईं ओर जुड़ती है (देखो, उ, गु, चु, तु, धु, नु, यु, बु और
हु). 'ए' की मात्रा एक तिरछी या खड़ी लकीर है जो बहुधा अक्षर के ऊपर के भाग के साथ
और कभी कभी मध्य में ऊपर की तरफ़ जुड़ती है (देखो, ए, जे, ते, ने, दे, ये और षे). 'ओ'
की मात्रा एक तिरछी रेखा है जो बहुधा अक्षर के मध्य से बाईं ओर को झुकती हुई लगती है
(देखो, ओ, चो, नो, मो और सो, परंतु 'यो' में उसका झुकाव दाहिनी ओर है). अनुस्वार का
चिह्न एक आड़ी सीधी या वक्र रेखा है जो बहुधा अक्षर के अंत भाग से सटी रहती है (देखो, अं,
थं, रं, वं और षं) परंतु कभी कभी अक्षर की खड़ी लकीर के अंत से कुछ ऊपर उक्त खड़ी लकीर को
काटती हुई भी लगती है (देखो, झं, नं और हं). 'मं' (प्रथम) के साथ का अनुस्वार का चिह्न
'म' से विलग नीचे को लगा है, 'म' (दूसरे) में दाहिनी ओर भिन्न रूप में जुड़ा है और 'यं'
के साथ उसके दो विभाग करके 'य' की नीचे को झुकी हुई दोनों तिरछी रेखाओं के अंतों में
एक एक जोड़ा है. इन लेखों में रेफ कहीं नहीं है. रेफ को या तो संयुक्ताक्षर का दूसरा अक्षर
बनाया है (जैसे कि 'सर्व' को 'स्रव') या उसको पूर्व के अक्षर के नीचे 'र' के रूप से जोड़ा है
('प्रियदर्शी' को 'प्रियद्रशि', 'धर्म' को 'ध्रम' आदि). संयुक्ताक्षर में दूसरे 'र' के लिये एक
आड़ी, तिरछी या कुछ गोलाईदार लकीर है जो व्यंजन के नीचे के अंत के साथ दाहिनी ओर जुड़ती
है, परंतु कहीं कहीं 'र' का योग न होने पर भी ऐसी लकीर अधिक जुड़ी हुई मिलती १ है
जिससे यह संदेह रह जाता है कि कहां यह अनावश्यक है और कहां ठीक है ('प्रियद्रशि पढ़ें
या 'पियदशि'; 'स्रवप्रषंडनि' या 'सवपषंडनि' आदि). संयुक्ताक्षरों में कहीं कहीं भिन्न वर्णों के
रूप स्पष्ट नहीं हैं (देखो, न्त्रि).
लिपिपत्र ६५वें की मूल पंक्तियों २ का नागरी अक्षरांतर-
देवनं प्रियो प्रियद्रशि रय सवप्र(प)षंडनि गृहठनि
च पुजेति दनेन विविधये च पुजये नो चु त-
थ दन व पुज व देवनं प्रियो मजति यथ कि-
ति सलवढि सिय सवप्र(प)षंडनं सलवढि तु.
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र ग्रीक (युनानी), शक, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के सिक्कों ३ से तय्यार
किया गया है. ग्रीकों के सिक्कों से लिये हुए अक्षरों में कहीं कहीं 'त', 'द' और 'न' में स्पष्ट
बिल्कुल नहीं लगाते अथवा बिना किसी विचार के उनका प्रयोग करते हैं अर्थात् जहां मात्रा की आवश्यकता नहीं होती वहां कोई
भी मात्रा लगा देते हैं और जहां मात्रा की अपेक्षा रहती है वहां उसे या तो छोड़ जाते हैं या अशुद्ध मात्रा लगा देते हैं. ऐसी
लिखावटों के अक्षरों को राजपूतानावाले 'केवळां अक्षर' (केवल अक्षर संकेत) कहते हैं और पुरानी महाजनी लिखावटें
विशेष कर ऐसी ही मिलती हैं. ऐसी लिखावटों से ही 'काकाजी अजमेर गया' (ककज अजमर गय) के स्थान में 'का-
काजी आज मर गया' पढ़े जाने की कथा प्रसिद्ध है.
१ देखो. ऊपर पृष्ठ ६८ टिप्पण ३.
२ ये मूल पंक्तियां अशोक के शहबाजगढ़ी के लेख से हैं (एं. इं; जि. १ पृष्ठ १६ के पास के सेट से).
३ ग्रीकों (यूनानियों) के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; सेट ४-१५. सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट १-६.
व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १-६. शक, पार्थिअन और कुशनवंशियों के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; प्लेट १६-२४.
सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट ८-६. व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १०-१७.