प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६—ब्राह्मी और उससे निकली हुई लिपियों के अंक.
(लिपिपत्र ७१ से ७६ के उत्तरार्द्ध के प्रथम खंड तक).
प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों तथा हस्तलिखित पुस्तकों के देखने से पाया जाता है
कि लिपियों की तरह प्राचीन और अर्वाचीन अंकों में भी अंतर है. यह अंतर केवल उनकी
आकृति में ही नहीं किंतु अंकों के लिखने की रीति में भी है. वर्तमान समय में जैसे १ से
९ तक अंक और शून्य इन १० चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चलता है वैसे प्राचीन
काल में नहीं था. उस समय शून्य का व्यवहार ही न था और दहाइयों, सैकड़ों, हज़ार आदि
के लिये भी अलग चिह्न थे. अंकों के संबंध में इस शैली को 'प्राचीन शैली' और जिसमें शून्य
का व्यवहार है उसको 'नवीन शैली' कहेंगे.
प्राचीन शैली के अंक
प्राचीन शैली में १ से ९ तक के अंकों के ९ चिह्न; १०, २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८० और
९० इन ९ दहाइयों के लिये ९ अलग चिह्न; और १०० तथा १००० के लिये एक एक अलग चिह्न
नियत था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में). इन २० चिह्नों से ९९९९९
तक की संख्या लिखी जा सकती थी. लाख, करोड़, अरब आदि के लिये जो चिह्न थे उनका पता
अब तक नहीं लगा क्योंकि शिलालेख अथवा दानपत्रों में लाख¹ या उसके आगे का कोई चिह्न नहीं
मिला.
इन अंकों के लिखने का क्रम १ से ९ तक तो वैसा ही था जैसा कि अब है. १० के लिये
नवीन शैली के अंकों की नांई १ और ० नहीं किंतु एक नियत चिह्न ही लिखा जाता था; ऐसे ही २०,
३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८०, ९०, १०० और १००० के लिये भी अपना अपना चिह्न मात्र लिखा जाता
था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में).
११ से ९९ तक लिखने का क्रम ऐसा था कि पहिले दहाई का अंक लिख कर उसके आगे
इकाई का अंक रक्खा जाता था, जैसे कि १५ के लिये १० का चिह्न लिख उसके आगे ५; ३३ के
लिये ३० और ३; ६३ के लिये ६० तथा ३, इत्यादि (देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक).
१. प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने अगाध परिश्रम के साथ तुर्कस्तान से जो अमूल्य प्राचीन सामग्री
प्राप्त की है उसमें कुछ खरड़े ऐसे भी हैं जिन पर भारतवर्ष की गुप्तलिपि से निकली हुई तुर्कस्तान की ई. स. की छठी
शताब्दी के आसपास की आर्य लिपि में स्वर, व्यंजन, स्वरों की १२ मात्राओं (ऋ ॠ और ऌ ॡ को छोड़ कर) की बारहखड़ी
(द्वादशाक्षरी) तथा किसी में प्राचीन शैली के अंक भी दिये हुए हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५२ और ४५८ के
बीच के प्लेट १ से ४ तक). एक खरड़े में १ से १००० तक के वहां के प्रचलित प्राचीन शैली के चिह्नों के पीछे दो और चिह्न
की ✪ ऐसे हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५५) जिनको प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने क्रमशः १०००० और १००००० के
चिह्न माना है, परंतु हमको उन चिह्नों को १०००० और १००००० के सूचक मानने में शंका होती है. संभव है कि इनमें
से पहिला चिह्न १००००० का सूचक हो और दूसरा केवल समाप्ति (विराम) का चिह्न हो. उसको अंकसूचक चिह्न
मानना संदिग्ध ही है.