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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 318 में से

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पृष्ठ 124

तामिळ लिपि. ६५
तामिळ भाषा में मिलते हैं परंतु उन अक्षरों के लिये स्वतंत्र चिह्न नहीं हैं. 'ग' की ध्वनि 'क' से,
'ज' और 'श' की 'च' से, 'द' की 'त' से और 'ब' की 'प' से व्यक्त की जाती है जिसके लिये
विशेष नियम मिलते हैं. संयुक्त व्यंजन एक दूसरे से मिला कर नहीं किंतु एक दूसरे के पास लिखे जाते
हैं और कई लेखों में हलंत और सस्वर व्यंजन का भेद नहीं मिलता, तो भी कितने एक लेखों में संयुक्त
व्यंजनों में से पहिले के ऊपर बिंदी, वक्र या तिरछी रेखा लगा कर हलंत को स्पष्ट कर जतलाया है.
अनुस्वार का काम अनुनासिक वर्णों से ही लिया जाता है. इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ ही है
जिनमें से चार (ळ, ऴ, र और ण) को छोड़ देवें तो संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होनेवाले व्यंजनों में से तो
केवल १४ ही रह जाते हैं. ऐसी दशा में संस्कृत शब्द इसमें लिखे नहीं जा सकते, इसलिये जब उनके
लिखने की आवश्यकता होती है तब वे ग्रंथलिपि में ही लिखे जाते हैं. इस लिपि के अधिकतर अक्षर
ग्रंथ लिपि से मिलते हुए ही हैं और ई, क, और र आदि अक्षर उत्तरी ब्राह्मी से लिये हों ऐसा प्रतीत होता है;
क्योंकि उनकी खड़ी लकीरें सीधी ही हैं, नीचे के अंत से बाईं ओर मुड़ कर ऊपर को बढ़ी हुई नहीं हैं.
अन्य लिपियों की नांई इसमें भी समय के साथ परिवर्तन होते होते १० वीं शताब्दी के आस पास कितने
एक और १४ वीं शताब्दी के आस पास अधिकतर अक्षर वर्तमान तामिळ से मिलते जुलते हो गये.
फिर थोड़ा सा और परिवर्तन होकर वर्तमान तामिळ लिपि बनी. लिपिपत्र १ से ५६ तक के प्रत्येक पत्र
में पाठकों के अभ्यास के लिये मूल शिलालेखों या दानपत्रों से पंक्तियां दी हैं परंतु लिपिपत्र ६० से ६४
तक के पांच लिपिपत्रों में वे नहीं दी गई, जिसका कारण यही है कि संस्कृतज्ञ लोग उनका एक भी
शब्द समझ नहीं सकते. उनको केवल वे ही लोग समझते हैं जिनकी मातृभाषा तामिळ है या
जिन्होंने उक्त भाषा का अध्ययन किया है. तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी
विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं जिनसे तामिळ जाननेवालों को उस लिपि के प्राचीन लेखादि पढ़ने
में सहायता मिल सकेगी.

लिपिपत्र ६० वां.

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा परमेश्वरवर्मन के कूरम के दानपत्र¹ तथा उसी वंश के राजा
नंदिवर्मन् के कशाकूडि² और उदयेंदिरम्³ के दानपत्रों के अंत के तामिळ अंशों से तय्यार किया
गया है. कूरम के दानपत्र के अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ओ, च, ज, ए, त, न, प, य और व
(पहिले) ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों की शैली के ही हैं. 'अ' और 'आ' में इतना ही अंतर है कि उन
की खड़ी लकीरों को ऊपर की तरफ दोहराया नहीं है. इस अंतर को छोड़कर इस ताम्रपत्र के
'अ' और लिपिपत्र ५२ में दिये हुए मामल्लपुरम् के लेखों के 'अ' (दूसरे) में बहुत कुछ समा-
नता है. क, ट, र और व (दूसरा) उत्तरी शैली की ब्राह्मी लिपि से मिलते हुए हैं. कशाकूडि
के दानपत्र का 'अ' कूरम के दानपत्र के 'अ' की ग्रंथि को लंबा करने से बना है. उदयेंदिरम्
के दानपत्र में हलंत और सस्वर व्यंजन में कोई भेद नहीं है.

लिपिपत्र ६१ वां.

यह लिपिपत्र पल्लवतिलकवंशी राजा दंतिवर्मन् के समय के तिरुवेळ्ळरै के लेख⁴, राष्ट्रकूट


१. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ३, प्लेट १२, पंक्ति ५७-८६ से.
२. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ४, प्लेट १४-५, पंक्ति १०५-१३३ से.
३. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २७७ के पास के प्लेट की पंक्ति १०५-१०६ से.
४. ऐं. इं; जि. ११, पृ. १५७ के पास के प्लेट से.