प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ प्राचीनलिपिमाला.
राजा कण्यरदेव (कृष्णराज तीसरे) के समय के तिरुक्कोवलूर १ और वेल्लूर २ के लेखों से तय्यार
किया गया है. इसमें क, ङ, ट, ण, प, य और व में लिपिपत्र ६० से कुछ परिवर्तन पाया
जाता है.
लिपिपत्र ६२ वां.
यह लिपिपत्र राजेन्द्रचोल (प्रथम) के तिरुमलै के चट्टान पर खुदे हुए लेख ३, पगन (बर्मा
में) से मिले हुए वैष्णव लेख ४, विजयनगर के राजा विरूपाक्ष के शोरेक्कावुर के शक सं. १३०८
(ई. स. १३८७) के दानपत्र ५ और महामंडलेश्वर वालककायम ६ के शक सं. १४०३ (ई. स. १४८२)
के जंबुकेश्वर के शिलालेख ७ से तय्यार किया गया है. तिरुमलै के चट्टान के लेख का 'ई' उत्तरी
शैली की ब्राह्मी का है क्योंकि उसकी दो बिंदियों के बीच की खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं
ओर मुड़ कर ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ नहीं है. यह 'ई' प्रायः वैसा ही है जैसा
कि मथुरा से मिले हुए संवत् ७६ के लेख ८ में मिलता है, और महाक्षत्रप ईश्वरदत्त के सिक्कों
(लिपिपत्र १०) और अमरावती के लेखों (लिपिपत्र १२) के 'ई' से भिन्न है क्योंकि उनमें
खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं ओर ऊपर को मुड़ा हुआ मिलता है. विरूपाक्ष के दानपत्र
और वालककामय के लेख के अक्षरों में से अधिकतर वर्तमान तमिळ अक्षरों से मिलते जुलते
हो गये हैं.
१७-वट्टेऴुत्तु लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दी के अन्त के आसपास से (लिपिपत्र ६३ से ६४).
यह लिपि तमिळ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर बहुधा गोलाई लिये हुए
या ग्रंथिदार होते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी विभाग में
ई. स. की ७ वीं शताब्दी के अंत के आसपास से चोल, पांड्य आदि वहां के राजवंशों के शिला-
लेखों और दानपत्रों में मिलता है. कुछ समय से इसका व्यवहार बिलकुल उठ गया है.
लिपिपत्र ६३ वां.
यह लिपिपत्र जटिलवर्मन् के समय के आनैमले के शिलालेख ९, उसी राजा के दानपत्र १०
और वरगुणपांड्य के अंबासमुद्रम् के लेख ११ से तय्यार किया गया है. आनैमले के लेख का 'अ' और
'आ' कूरम के दानपत्र (लिपिपत्र ६०) के उक्त अक्षरों के कुछ विकृत और घसीट रूप हैं. मुख्य अंतर
१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १४४ के पास के प्लेट, लेख G से.
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. ८२ के पास के प्लेट से. ३. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २३२ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १६४ के पास के प्लेट (लेखसंख्या २७) से.
५. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के प्लेटों से.
६. लिपिपत्र ६२ में वाकलकायम छप गया है जिसको शुद्ध कर पाठक वालककायम पढ़ें.
७. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ७२ के पास के प्लेट के नीचे के भाग से.
८. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२१ के पास के प्लेट चौथे में. इसी लेख की छाप उसी जिल्द के पृ. २०५ के पास के प्लेट
(लेख संख्या २०) में छपी है परंतु उसमें 'ई' स्पष्ट नहीं आया.
९. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३२० के पास के प्लेट, लेख दूसरे से. १०. इं. ऍ; जि. २२, पृ. ७० और ७१ के बीच के प्लेटों से.
११. ऍ. इं; जि. ६, पृ. १० के पास के प्लेट से.
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