प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 129, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० प्राचीनलिपिमाला.
अंतर नहीं है (देखो, 'त' का चौथा रूप, 'द' का दूसरा रूप और 'न' का तीसरा रूप). कहीं
कहीं 'म' के नीचे आड़ी लकीर या बिंदी और 'ह' के नीचे भी बिंदी लगी मिलती है. 'खे'
के साथ के रेफ को अक्षर के नीचे लगाया है परंतु उसको ग्रंथि का सा रूप देकर संयुक्ताक्षर
में आनेवाले दूसरे 'र' से भिन्न बतलाने का यत्न पाया जाता है और शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों में यह भेद अधिक स्पष्ट किया हुआं मिलता है (देखो 'र्व'). शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों से जो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये गये हैं उनमें कई अक्षरों की लकीरों के प्रारंभ या
अंत में ग्रंथियां लगाई हैं वे, संभव है कि, अक्षरों में सुंदरता लाने के लिये ही हों. 'फ' की
ऊपर की दाहिनी ओर की लकीर नीचे की ओर नहीं किंतु ऊपर की तरफ़ बढ़ाई है.
लिपिपत्र ६६वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस भ्रमिकस हेलियक्रेयस. महरजस भ्रमिकस जयधरस
अर्खेबियस. महरजस चतरस मेनद्रस. महरजस अपडिहतस
फिलसिनस. महरजस चतरस अयंतस हिपुस्त्रतस. महरजस
चतरस हेरमथस. रजतिरजस महतस मोअस. महरजस रजरजस
महतस अयसं. महरजस रजरजस महतस अयिलिषस.
लिपिपत्र ६७ वां.
यह लिपिपत्र क्षत्रप राजुल के समय के मथुरा से मिले हुए सिंहाकृतिवाले स्तंभसिरे के
लेखों², तक्षशिला से मिले हुए क्षत्रप पतिक के ताम्रलेख³ और वहीं से मिले हुए एक पत्थर
के पात्रपर के लेख⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र के अक्षरों में 'उ' की मात्रा का रूप
ग्रंथि बनाया है और 'न' तथा 'ण' में बहुधा स्पष्ट अंतर नहीं पाया जाता. मथुरा के लेखों
में कहीं कहीं 'त', 'न' तथा 'र' में भी स्पष्ट अंतर नहीं है.
लिपिपत्र ६७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिहिलेन⁵ सिहरखितेन च भ्रातरेहि तखशिलए अयं थुवो प्र-
तिथवितो सवबुधन पुयए* *तखशिलये नगरे उत-
रेण प्रचु देशो क्षेम नम अच ···ये पतिको अप्रतिठवित ˙
१. ये मूल पंक्तियां ग्रीक आदि राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से हैं.
२. ऐं. इं.; जि. ६, पृष्ठ १३६ और १४६ के बीच के प्लेटों से.
३. ऐं. इं.; जि. ४, पृष्ठ ५६ के पास के प्लेट से. इस ताम्रलेख में अक्षर रेखारूप में नहीं खुदे हैं किंतु बिंदियों से
बनाये हैं. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के बाद के कुछ ताम्रपत्र ऐसे ही बिंदियों से खुदे हुए भी देखने
में आये जिनमें से सब से पिछला २० वर्ष पहिले का है. कई तांबे और पीतल के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम इसी
तरह बिंदियों से खुदे हुए भी देखने आते हैं. ताम्रपत्रादि बहुधा सुनार या लुहार खोदते हैं. उनमें जो अच्छे कारीगर होते
हैं वे तो जैसे अक्षर स्याही से लिखे होते हैं वैसे ही खोद लेते हैं परंतु जो अच्छे कारीगर नहीं होते या ग्रामीण होते हैं वे
बहुधा स्याही से लिखे हुए अक्षरों पर बिंदियां बना देते हैं. यह त्रुटि खोदनेवाले की कारीगरी की ही है.
४. ऐं. इं.; जि. ८, पृष्ठ २४६ के पास के प्लेट से.
५. 'सिहिलेन' से लगाकर 'पुयए' तक के लेख में तीन बार 'ण' या 'न' आया है जिसको दोनों ही तरह पढ़
सकते हैं, क्योंकि उस समय के आसपास के खरोष्ठी लिपि के कितने एक लेखों में 'न' और 'ण' में स्पष्ट भेद नहीं पाया जाता.
- . यहां तक का लेख तक्षशिला के पत्थर के पात्र से है.
˙ . यहां से लगाकर अंत तक का लेख तक्षशिला से मिले हुए ताम्रलेख से लिया है.
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