सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

२३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
आवाहनमन्त्रमाह—तत्तदिति। बलिदानमन्त्रमाह—कलेति। कलामनु-
र्व्याख्यातः। अत्र बलिदानं पात्रोद्वासनदेवतोद्वासनादीनामुपलक्षणम्। आहुति-
र्यजनं पूजनम्। सर्वदेवानां तत्तन्मन्त्रजपः श्रीक्रमोक्तजपसमये कार्य इति
सर्वसाधारणक्रमः॥७॥
एवं सामान्यक्रममुक्त्वा पुनः सिंहगुहावलोकनन्यायेन ललिताक्रमशेषमेव
वक्तुं प्रक्रमते
अथ रश्मिमाला ॥८॥
रश्मिरिति प्रकाशापरपर्यायः। मालेति मन्त्रविशेषसंज्ञा। तदुक्तं नित्यातन्त्रे
'मन्त्रा एकाक्षराः पिण्डाः कर्त्तव्या द्व्यक्षरा मताः। बहुवर्ष समारम्भ नवार्णाविधि
बीजकाः।। ततो दशार्णमारभ्य यावत् विंशतिमन्त्रकाः। तत ऊर्ध्वं गता
मालास्तासु भेदो न विद्यते।।' इत्थं च गायत्र्यादिमहापादुकान्तस्य
प्रकाशकत्वाद् विंशतिवर्णा

सर्वसाधारणक्रमः २३३
उस महत्त्वपूर्ण क्षण में इसके स्मरण से नया आयाम खुलता है। इसके
तुरत बाद ब्रह्मरन्ध्र में गुरु के ध्यान का भी विधान है। यह प्रातःकालीन
कृत्य है॥९॥
अथ रश्मिमालासंज्ञकान् पुंमन्त्रान् दर्शयति
१. प्रणवो भूर्भुवस्सुवस्तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्। इति त्रिंशद्वर्णा गायत्री।
२. यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कुरु मघवञ्छग्धि तव तन्न
ऊतये विद्विषो विमृधो जहि।। स्वस्तिदा विशस्पतिर्वृत्रहा विमृधो
वशी। वृषेन्द्र पुर एतु नः स्वस्तिदा अभयङ्करः। इत्यैन्द्री
सप्तषष्ठ्यर्णा सङ्कटे भयनाशिनी।
३. प्रणवो घृणिः सूर्य आदित्य इत्यष्टाण्णा भयनाशिनी।
४. प्रणवः केवलो ब्रह्मविद्या मुक्तिदा। सौरी तेजोदा।
५. तारः परोरजसे सावदोम् इति नवार्णा तुर्यगायत्री
स्वैक्यविमर्शिनी। रश्मिपञ्चकमेतन्मूलहृत्फालविधिबिल-
द्वादशान्तबीजतया विमृष्टव्यम्॥१०॥
'त्रिंशद्वर्णा गायत्री' इत्यादिभिर्वक्ष्यमाणे रश्मिमालाऽवयवमन्त्रसंज्ञा
दर्शिता। ऐन्द्री इन्द्रदैवत्या। सङ्कटे दावाग्निव्याघ्रादिप्राणसङ्कटे। तेजोदातेजः
स्वदर्शनेन परेषां स्वस्मिन् उत्कर्षप्रतिपादिका शक्तिः, तस्या दायिनी। प्रणवः
केवलः प्रणवोच्चारणमेव। ब्रह्मविद्या ब्रह्मविद्याप्रतिपादिका। तारः प्रणवः।
तदुक्तं विश्वामित्रकल्पे—
गायत्र्यास्तुर्यपादोऽयं त्रिपदाया ह्युदाहृता। इति। स्वैक्यविमर्श आत्मरूपं
ज्ञानम्। तत्रदायिका। एतत्-तत्सवितुरिति गायत्रीमारभ्य गायत्रीतुर्यपादपर्यन्तं
यद् रश्मिपञ्चकं रश्मीनां प्रकाशशक्तिमत्वाद् अमीष्वपि तत्त्वे रश्मिशब्देन
व्यवहारः। क्रमेण मूले मूलाधारे हृदि, ललाटे, विधिबिले ब्रह्मरन्ध्रे, द्वादशान्ते
विमृष्टव्यं भावयितव्यम्॥१०॥

२३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मिमाला के अन्तर्गत आने वाले मन्त्र रश्मिपञ्चक मन्त्र कहलाते हैं।
ये ब्रह्मरूप स्वप्रकाश तत्त्व की वागात्मक रश्मियाँ हैं। इनका साक्षात्कार मन्त्रद्रष्टा
मनीषी ऋषियों ने किया है। ये पाँच हैं—
१. गायत्री मन्त्र—इसमें २४ अक्षर होते हैं। जब ओङ्कार भूः भुवः और सुवः
रूप छः वर्णों को इसके साथ लगाकर बोलते हैं, तो यह तीस वर्णों वाली
हो जाती है। यह मूलाधार की बीजरूप से विमृष्टव्य है।
२. ऐन्द्री रश्मि—यह इन्द्रदैवत्या रश्मि है। इन्द्र एक वैदिक देवता है। यह
सङ्कटों से रक्षा करता है। श्रीपाददामोदर सातवलेकर ने 'इन्द्रशक्ति का
विकास' एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें इन्द्रशक्ति का विशद विवेचन है।
यह रश्मि ६७ वर्णों में पूर्ण होती है। ऋग्वेद का यह मन्त्र है। वहाँ
से इसकी व्याख्या देखनी चाहिये। इसको हृदय बीज के रूप में विमृष्ट
करना चाहिये।
३. सौरी रश्मि—इसके विमर्श से स्वात्म में तैजसिकता का विकास होता है।
इसमें प्रणव, घृणि, सूर्य और आदित्य रूप शब्दों के आठ वर्ण सौरी
दिव्यता के प्रतीक वर्ण हैं। यह आज्ञा बीज रूप से ही विमृश्य है।
४. प्रणवरश्मि—यद्यपि गीता इसे एकाक्षर ब्रह्म ही मानती है। फिर भी
वर्णात्मिका विद्या होने के कारण रश्मि भी है। इसे ब्रह्मरन्ध्र में विमृष्ट करना
चाहिये।
५. तुर्यगायत्री—नवार्णा विद्या है। चिदैक्य-समापत्ति की मूल हेतु है। गायत्री
के चतुर्थ चरण के रूप में इसका जप करना गायत्री साधक के लिये
अनिवार्य माना जाता है। आठ माला गायत्री मन्त्र जप कर एक माला
इस मन्त्र का जप करना विश्वामित्रकल्प का निर्देश है। इसका उच्चारण
नहीं किया जाता। इसे द्वादशान्त बीज रूप से विमृष्ट करते हैं। शरीरस्थ
जिन चक्रों में विमर्श करने का निर्देश है, उनका ज्ञान साधक को होना
चाहिये। विशेष रूप से ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त शब्दों का ज्ञान और प्रयोग
रूप से वहाँ तक पहुँचना साधना का विषय है। इसे सद्गुरु से जानना
चाहिये।।१०।।

सर्वसाधारणक्रमः २३५
चाक्षुष्मतीविद्यादि द्वितीयं रश्मिपञ्चकम्
सूर्याक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। उष्णो भगवान्
शुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिप्रतिरूपः।
विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतिरेकं तपन्तं
सहस्ररश्मिः शतधा वर्त्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो
भगवते सूर्याय अहोवाहिनि वाहिन्यहो वाहिनि वाहिनि स्वाहा।।
वयस्सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियं मेधा ऋषयो नाथमानाः।
अपध्वान्तमूर्णहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान्।।
पुण्डरीकाक्षाय नमः। पुष्करेक्षणाय नमः।
अमलेक्षणाय नमः। कमलेक्षणाय नमः।
विश्वरूपाय नमः। श्रीमहाविष्णवे नमः।
इति षोडशमन्त्रसमष्टिरूपिणी दूरदृष्टिप्रदा चाक्षुष्मती
विद्या।।१९।।
सूर्येत्यारभ्य घृणिं जातवेदसम् अप्रतिरूप इति पर्यन्तं सप्तवाक्यानि।
सप्तमन्त्राः। ततो हिरण्मयं विश्वरूपम् इत्यारभ्य एष सूर्य इत्यन्तोऽष्टमः। ॐ
नम इत्यारभ्य स्वाहान्तो नवमः। वयस्सुपर्णा इत्यारभ्य बद्धान् इत्यन्तो
दशमः। तदग्रिमाणि नमोऽन्तानि षट् वाक्यानि प्रत्येकं षण्मन्त्राः। इत्थं
षोडशमन्त्राणां समष्टिः, तद्रूपिणी या प्रकृतविद्या सा उपासकानां दूरदृष्टिप्रदा
द्वीपान्तरस्थं वस्त्वपि करस्थामलकवद् दृष्टिगोचरी करोतीति भावः।।१९।।
वृत्तिकार ने प्रारम्भ के सब वाक्यों के दो विकल्प रूप को स्वीकार किया
है। १. सूर्य से प्रतिरूप पर्यन्त सात वाक्य हैं। २. विश्वरूप से एष सूर्यः तक
आठवाँ वाक्य। ३. ॐ नमः से स्वाहा तक नवाँ वाक्य ४. वयः सुपर्णा से
बद्धान् तक दशवाँ वाक्य। ५. पुण्डरीक से विष्णवे नमः तक छः मन्त्र। इस
तरह १६ मन्त्रों की समष्टि वाली यह विद्या चाक्षुष्मती विद्या है। यह भी माला
मन्त्र है। इसे उपनिषद् में परिगणित किया गया है।।१९।।

२३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
द्वितीयपञ्चके द्वितीयमन्त्रमाह
प्रणवो गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां
प्रयच्छ ततोऽग्निवल्लभेत्युत्तमकन्याविवाहदायिनी विद्या ।।१२।।
अमुकेत्यत्र अभिलषितकन्यानामनिक्षेपः। नात्रोहः सर्वनाम्ना निर्देशात्,
'अदीक्षितायं ब्राह्मणः' इतिवत्। अग्निवल्लभा स्वाहा।।१२।।
द्वितीय रश्मिमाला मन्त्र में सर्वप्रथम चाक्षुषमती विद्या का प्रयोग था।
उसका दूसरा उत्तम कन्याविवाहदायिनी विद्या से सम्बद्ध मन्त्र है। इसका मन्त्र
'ॐ गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां प्रयच्छ स्वाहा' है। इस
मन्त्र में अमुकां की जगह अभीप्सित कन्या का नाम लगाकर बोलना चाहिये।
यह सच्ची विद्या है। इसमें किसी प्रकार का तर्क व्यर्थ है।।१२।।
तृतीयमन्त्रमाह
तारो नमो रुद्राय पथिपदे स्वस्ति मा सम्पारय इति मार्ग-
सङ्कटहारिणी विद्या।।१३।।
मार्गे यत् सङ्कटं चोरादिजनितं तस्य हारिणी।।१३।।
मन्त्र 'ॐ नमो रुद्राय पथिषदे स्वस्ति मा सम्पारय' इस विद्या को
मार्गसङ्कटहारिणी विद्या कहते हैं। अभिघात या चोर आदि को मार्ग-सङ्कट
कहते हैं। आधुनिक सङ्कटों का ओर-छोर नहीं। गाड़ियों की टक्कर, गोली,
लूट, छिनैती और अपहरण आदि तो साधारण हैं। विष पिलाकर मार डालने
की बातें भी सङ्कट में ही आती हैं। इस विद्या के प्रयोग से सारे सङ्कट
नष्ट हो जाते हैं।।१३।।
चतुर्थमन्त्रमाह
तारस्तारे पदमुक्त्वा तुत्तारे तुरे शब्दं च दहनदयितेति
जलापच्छमनी विद्या।।१४।।
पदमुक्त्वेति शब्दं चेति त्यक्त्वा शेषं 'ॐ तारे तुत्तारे तुरे' इति
पठित्वा दहनदयितां पठेत्।।१४।।

सर्वसाधारणक्रमः २३७
इस विद्या का नाम जलापच्छमनी विद्या है। इसके प्रयोग से जल में डूबने
से आदमी बच जाता है। मन्त्र ‘ॐ तारे तुत्तारे तुरे स्वाहा’ तैरते समय इसका
जप करना चाहिये।।१४।।
पञ्चममन्त्रमाह
अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नम इति
महाव्याधिविनाशिनी नामत्रयविद्या पञ्चमा रश्मयो मूलादिपरिकरतया
प्रपञ्च्य ।।१५-१६।।
इमा उक्ता रश्मयः। परिकरतया तदाधारतया प्रपञ्च्या योज्या
इत्यर्थः।।१५-१६।।
‘अच्युताय नमः’ ‘अनन्ताय नमः’ ‘गोविन्दाय नमः’ यह नामत्रयी विद्या
है। इसमें ॐकार का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके प्रयोग से महाव्याधियाँ
भी निराकृत हो जाती हैं। व्याधि के स्थान पर पञ्चकोणीय प्रयोग करते रहना
चाहिये। तथा इसे पढ़ते रहना चाहिये।।१५-१६।।
अथ तृतीयपञ्चके प्रथममाह
१. प्रणवः कमला भुवना मदनो ग्लाचतुर्दशपञ्चदशौ गं
गणपतये वरयुगलं द सर्वजनं मे शब्दो वशमानयाग्निवामलोचनेति
महागणपतिविद्या प्रत्यूहशमनी।।१७।।
कमला श्रीं, भुवना ह्रीं, मदनः क्लीं ग्लात् चतुर्दशः औ,
पञ्चदशोऽनुस्वारश्च, मिलित्वा ग्लौं। वरयुगलं वरद्वयम्। ततः शब्दं इति शब्दं
च त्यजेत्। अवशिष्टाः सर्वे वर्णा मन्त्रावयवाः। वह्निवामलोचना स्वाहा इति
चरमं पठेत्। प्रत्यूहशमनी विघ्नविनाशिनी।।१७।।
यह तीसरे पञ्चक का पहला मन्त्र है। इसे महागणपति विद्या कहते हैं।
यह विघ्नों का विनाश करती है। इसके कूट शब्दों में मन्त्र छिपा हुआ है।
जैसे—
१. प्रणव = ॐ, २. कमला = श्रीं, ३. भुवना = ह्रीं, ४. मदन = क्लीं,
५. ‘ग्ल’ से चौदहवाँ स्वर = औ पन्द्रहवाँ = अनुस्वार, कुल मिलाकर ग्लौं,

२३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
६. गं गणपतये, ७. वर युगल के साथ द अर्थात्—'वरद वरद सर्वजनं मे
वशमानय', ८. वामलोचना = स्वाहा। यहाँ मन्त्र पूरा हो जाता है। पूरा मन्त्र
इस प्रकार बोलना चाहिये।
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय
स्वाहा'।
महागणापतिविद्या सिद्धविद्या है। इसके प्रयोग से सारे विघ्न नष्ट हो
जाते हैं।।१७।।
द्वितीयमन्त्रमाह
२. प्रणवो नमः शिवायै प्रणवो नमः शिवायेति द्वादशार्णा
शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या।।१८।।
शिवरूपं यत् चरमं तत्त्वं तस्य यो विमर्शः प्रकाशशक्तिः
तत्सम्पादिनी।।१८।।
द्वादशार्णा शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या का अप्रतिम महत्त्व है। शिवैक्य-
संभूतिप्रदायिनी यह विद्या नित्य जपनीय है। अभ्यास से इसका अनवरत उच्चार
होने लगता है। विद्या का मान्त्रिक रूप इस प्रकार है।
'ॐ नमः शिवायै ॐ नमः शिवाय'। इस महाशक्ति का महोच्चार तन,
मन और अस्तित्व को पुलकित कर देता है।।१८।।
तृतीयमाह
३. प्रणवः काष्टमदक्षश्रुतिबिन्दुपिण्डो भृगुषोडशो मां
पालयद्वन्द्वम् इति दशार्णा मृत्योरपि मृत्युरेषा विद्या।।१९।।
ककारादष्टमो जकारः, दक्षश्रुतिरुकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
बिन्दुः प्रसिद्धः। त्रितयपिण्डः समुदायः ‘जुं’ इति। भृगुः सकारः षोडशो
विसर्गः स इति। तदनन्तरं मां पालय पालय इति। मृत्योरपि मृत्युः,
अपमृत्युनाशिनीत्यर्थः।।१९।।
कूट अक्षरार्थ १. प्रणव = ॐ, २. क से आठवाँ वर्ण = 'ज',
३. दक्षश्रुति = उकार, ४. बिन्दु = अनुस्वार। इनका पिण्ड समुदाय—'जुं',

सर्वसाधारणक्रमः २३९
५. भृगु = 'स', ६. षोडश सोलहवाँ अर्थात् विसर्ग = 'सः' उसके बाद मां
पालय पालय दो बार लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'
यह दशार्ण मन्त्र है। परम्परा के अनुसार अन्त में 'सः जूं ॐ' से सम्पुटित
मन्त्र जपा जाता है।।१९।।
चतुर्थमाह
४. तारः नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयित्वा
भूयासं कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ इति श्रुतधारिणी
विद्या।।२०।।
श्रुतस्य अधीतस्य धारिणी दृढसंस्कारजनिका विद्या।।२०।।
यह श्रुतधारिणी विद्या विद्यार्थी को पहले ही वेदारम्भ के समय देनी
चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—
ॐ नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्तु निराकरणं धारयित्वा भूयासं कर्णयोः
श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ'। इसे ब्रह्मरन्ध्र में धारण करते हैं। इसके धारण
से सारे अधीत की धारणा निश्चित रूप से होती है।।२०।।
पञ्चममाह
५. श्रीकण्ठादिक्षान्ता सर्वे वर्णा बिन्दुसहिताः मातृका
सर्वज्ञताकरी विद्या।।२१।।
श्रीकण्ठः अकारः। तदादिक्षान्ता एकपञ्चाशद्वर्णा बिन्दुसहिता मातृका-
वाच्या सर्वज्ञताकरी।।२१।।
अ से लेकर क्ष पर्यन्त सारे मातृका के वर्ण बिन्दु सहित ५० होते हैं।
'ळं' यह एक अतिरिक्त वर्ण भी परम्परा में है। इसीलिये वृत्तिकार ने इसे
एकपञ्चाशद्वर्णात्मिका लिखा है।
वस्तुतः ५० वर्णों की ही मातृका होती है। २० बार आवृत्ति करने
पर बिन्दु सहित सारे वर्ण १००० होते हैं। निशीथ संध्या में इन्हें सहस्रार
के सहस्रदलों पर न्यस्त करना चाहिये। द्वादशान्त में ध्यान की तन्मयता
होती है।।२१।।

२४० परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मयः पञ्च मूलादिरक्षाऽऽत्मकतया यष्टव्याः ।।२२।।
मूलाधारादि-द्वादशान्तान्तरक्षाकर्त्र्य इमा यष्टव्या भावयितव्या इति
भावः ।।२२।।
ये पाँच रश्मियाँ मूलाधार, हृत् (अनाहत), फाल (ललाट, आज्ञाचक्र),
विधिबिल, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में क्रमिक रूप से भावित की जाती हैं। ये
इन चक्रों की रक्षा करती हैं। रक्षिका होने के कारण इनका महत्त्व बढ़ जाता
है। त्रिसन्ध्य इनका भावन करने वाला पुरुष प्रकाश के बोध के रहस्य को जान
लेता है। इसलिये इस मौलिक तथ्य पर विशिष्ट ध्यान देना चाहिये।।२२।।
शिवादि-विद्यादि-चतुर्थरश्मिपञ्चकं तत्र चतुर्थपञ्चके प्रथमं मन्त्रमाह
शिवशक्तिकामक्षितिमायारवीन्दुस्मरहंसपुरन्दरभुवनापरामन्मथ-
वासवभौवनाश्च शिवादिविद्या स्वस्वरूपविमर्शिनी ।।२३।।
इयमेव लोपामुद्रोपास्या। इयम् अग्रिमा कामराजोपास्या च
श्रीगुरुवक्त्रैकलभ्येति द्वयोरतिगोप्यत्वात् तद्विवरणं न करोमि। शिवादिविद्या
हादिविद्या। स्वस्यात्मनः स्वरूपप्रकाशकर्त्री।।२३।।
यह लोपामुद्रा के द्वारा उपास्य विद्या है। यह अग्रिमा कामराज द्वारा
भी उपास्य है। यह विद्या केवल गुरुमुखारविन्द से प्राप्त की जा सकती है।
वृत्तिकार द्वारा भी यही विद्या उपास्य प्रतीत होती है। इसी हेतु इन्होंने इसकी
व्याख्या नहीं की है। शिवादिविद्या ही हादिविद्या कहलाती है। यह स्वात्मस्वरूप
का साक्षात्कार कराने में समर्थ है।।२३।।
(हसकल ह्रीं, हसकहल ह्रीं, सकल ह्रीं)
द्वितीयमाह
क्लशब्दाद्वामेक्षणबिन्दुरेकोऽनन्तयोनिबिन्द्वोऽन्यः शङ्कर-
परत्रिशूलविसृष्ट्योऽपरश्चैत एव खण्डाः प्रतिलोमाः षट्कूटा
सम्पत्करी विद्या ।।२४।।
क्ल इति वर्णादुपरि वामेक्षणम् ईकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
ततो बिन्दुः, क्लीम् इति सम्पन्नम्। अयमेकोऽंशः। अनन्तो हकारः। योनिः

-> wait: Is itकृशे पदात् तदणुशब्दः? Let's look at character by character: क (ka) + ृ (ṛ) = कृ श (śa) + े (e) = शे प (pa) = प द (da) + ा (ā) = दा त् (t) + त (ta) = त्त Then: a round loop with vertical line? Wait! Is that व? Wait, what if it's कृशेपदात्तदनुशब्दः? Wait, look at तदनु: त+द+नु. Is there a त? Wait, where would तbe if it'sपदात्+तदनु? पदात्ends inत्. तदनुstarts withत. Together: पदात्तदनु->प-दा-त्त-द-नु`!
That's:

  1. प
  2. दा
  3. त्त
  4. द
  5. नु
    Wait, look at the text:
    After दा, there is:
    त्त
    then a letter
    then a letter
    then शब्दः!
    Yes! Exactly TWO letters between त्त and `शब्दः

२४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
उच्चार्येति त्यक्त्वा स्वाहान्ता प्रथमा विद्या। हमिति नमोऽन्तां द्वितीया
विद्या। अनलबिन्दुतः फडित्यन्ता तृतीया विद्या। ततोऽग्निबिन्दुः रं, ततः
फडित्यन्ता चतुर्थी विद्या। क्रमेणोक्तासु चतसृषु विद्यासु मध्ये सृष्टिस्थिति-
संहाराख्या या आद्यास्तिस्रस्ताः प्रातिलोम्येन पठित्वा, खेचरीबीजमुक्तं पठित्वा
वाणी च इत्येतावदंशमपहाय योगेश्वर्यन्तं पठेत्। इयं पञ्चमी विद्या। एवं
पञ्चविद्यासमष्टिरूपिणी कालस्य मृत्योः सङ्कर्षिणी विनाशिनी परमायुः
शतवर्षपर्यन्तं तत्प्रदेत्यर्थः॥२५॥
इसमें पाँच विद्याओं का उल्लेख है। वे इस प्रकार हैं—
१. सं से स्वाहा पर्यन्त = सं सृष्टिनित्ये स्वाहा।
२. हं से नमः पर्यन्त = हं स्थितिपूर्णे नमः।
३. अनलबिन्दु रं से फट् पर्यन्त = रं महासंहारिणि कृशे चण्डकालि फट्।
४. अग्निबिन्दु रं से फट् पर्यन्त = चतुर्थी विद्या—रं हस्ख्फ्रें महानाख्ये
अनन्तभास्करि महाचण्डकालि फट्।
५. आदि तीन विद्याओं का प्रतिलोम भाव से उच्चारण जैसे—रं महासंहारिणि
कृशे चण्डकालि फट्, हं स्थितिपूर्णे नमः, सं सृष्टिनित्ये स्वाहा।
इसके तुरन्त बाद खेचरी बीज 'हस्ख्फ्रें' पढ़कर और 'वाणी' शब्द छोड़कर
'महाचण्डयोगेश्वरि' तक पढ़ने से एक पंचविद्यात्मिका मन्त्रविद्या पूरी होती है।
यह पञ्चविद्यासमष्टिरूपिणी कालसङ्कर्षिणी विद्या है। यह शतवर्षीया परमायु प्रदान
करती है। इसका भावन आज्ञाचक्र में होता है॥२५॥
चतुर्थमाह
त्रितारी सप्तमुद्रा शिवयुक्शक्तिरहं युगलं मे तत्पञ्चैव
लोम्यमिति शुद्धज्ञानमयी शाम्भवी विद्या ॥२६॥
त्रितारी उक्ता। अत्र सप्तममुद्रापदेन तद्बीजं शिवो हः, तेन युक्शक्तिः
सौः, हसौः। अहं युगलम्। एवं क्रमेण पञ्चावयवाः। प्रथमावयवस्त्रितारी,
हस्ख्फ्रें द्वितीयः, हसौः तृतीयः, अहंयुगलं चतुर्थपञ्चमौ। एते पञ्चावयवा

सर्वसाधारणक्रमः २४३
विपरीतं पठिता चेत् शाम्भवी विद्या। शुद्धज्ञानं निर्विषयं तत्स्वरूपा केवल-
ब्रह्मस्वरूपेत्यर्थः।।२६।।
१. त्रितारी—ऐं ह्रीं श्रीं। २. सप्तमी मुद्रा-हस्ख्फ्रें, ३. शिवयुक्तशक्ति ह
रूपशिव से युक्त शक्ति—सौः हसौः। ४-५ अहंयुगल, ४. अहम् ५. अहम्।
इन पाँचों अवयवों का विपरीत पाठ। जैसे अहम् अहम् हसौः हस्ख्फ्रें
श्रीं ह्रीं ऐं। यह इस तरह दश अवयवात्मक हो जाती है। इसे शाम्भवी विद्या
कहते हैं। यह शुद्ध निर्विषय ब्रह्मज्ञानमयी विद्या मानी जाती है। ब्रह्मरन्ध्र में इसका
भावन करना चाहिये।।२६।।
पञ्चममाह
भृगुत्रिशूलविसृष्टयः पराविद्या।।२७।।
भृगुः सः, त्रिशूलम् औ, विसृष्टिः विसर्गः, मिलित्वा पराविद्या
भवति।।२७।।
स् + औ + : विसर्ग। तीनों को मिलाने से 'सौः' बीजमन्त्र बनता है।
यह पाँचवाँ मन्त्र है। इसे परा विद्या कहते हैं। द्वादशान्त में इसका भावन होना
चाहिये।।२७।।
पञ्चेमा रश्मयो मूलाद्यधिष्ठानतया परिकल्पनीयाः।।२८।।
स्पष्टं पञ्च पञ्च मन्त्राः।।२८।।
मूलाधार, अनाहत, आज्ञा, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में इन पाँचों का
क्रमिक रूप से भावन करना चाहिये।।२८।।
श्रीविद्या (अङ्गोपाङ्गप्रत्यङ्गपादुकायुक्ता)
मूलाधारादिषु एकैकस्थाने एकैकविद्यायोजनमुक्त्वा इतः परं
अङ्गोपाङ्गप्रत्यङ्गपादुकायुक्तमूलविद्यायाः पञ्चविद्या समष्टिरूपेणैक-
स्थान एव विभावनं विवक्षुस्तत्रादौ श्रियोऽङ्गबालामाह
वाक्कामशक्तयोऽनुलोमविलोमाः पुनरनुलोमा इति श्रियोऽङ्ग-
बाला।।२९।।

२४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
वाक् ऐं, कामः क्लीं, शक्तिः सौः। इमाः प्रथमं पठित्वा पश्चाद्
विपरीतं पुनः क्रमेण पठेत्। इयं नवार्णा श्रियोऽङ्गभूता बाला। त्र्यक्षरी तु
शुद्धबाला। सैव कुमारीपदवाच्या। तस्मात् श्रियोऽङ्गबाला शुद्ध-
बालातोऽन्या।।२९।।
श्रिय उपाङ्गं द्वितीयमाह
भुवना कमला सुभगा तारो नमो भगवति पूर्णे शेखरमन्न
ममाभिलषितमुक्त्वा देहि दहन जायेति श्रिय उपाङ्गमन्नपूर्णा।।३०।।
भुवना ह्रीं कमला श्रीं सुभगा क्लीं। तारः ॐ ततो नमो भगवति।
ततः पूर्णे, शेखरे अग्रभागे यस्य ईदृशं यद् अन्न इति वर्णद्वयम्, अन्नपूर्णे
इति पठितव्यम्। उत्त्वेत्यंशमपहाय देह्यन्तं समानम्। दहन जाया स्वाहा।
इयम् अन्नपूर्णा विद्या श्रिय उपाङ्गं भवति।।३०।।
'ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ नमो भगवति अन्नपूर्णे ममाभिलषितमन्नं देहि स्वाहा'
इस श्रीविद्या की उपाङ्गभूता अन्नपूर्णा मन्त्र के सूत्र में भुवना (ह्रीं), कमला (श्रीं)
सुभगा (क्लीं) तार (ॐ) दहनजाया (स्वाहा) इन कूट शब्दों के प्रयोग हैं। इस
मन्त्र से अन्नपूर्णा प्रसन्न होती है।।३०।।
श्रियः प्रत्यङ्गं तृतीयमाह
प्रणवः पाशादित्र्यर्णा एहि परमेश्वरीत्युक्त्वा वह्निवामाक्ष्युक्ति-
रिति श्रीप्रत्यङ्गमश्वारूढा।।३१।।
पाशादि त्र्यर्णा आं ह्रीं क्रों। आद्यवर्णद्वयं शिवयोः पाशः, क्रों
इत्यङ्कुशः। शेषं स्पष्टम्। इति।।३१।।
प्रणव ॐ। शिव-शक्ति के पाशबीज 'आं ह्रीं' हैं। क्रों अङ्कुश है। यही
तीन बीजाक्षर पाशादि त्र्यर्ण कहलाते हैं। इनके उच्चारण के उपरान्त एहि
परमेश्वरि बोलकर 'स्वाहा' बोलना चाहिये। स्वाहा अग्नि की वामा अर्थात् पत्नी
मानी जाती है। पूरा मन्त्र 'ओं आं ह्रीं क्रों एहि परमेश्वरि स्वाहा' बनता है। यह
अश्वारूढा प्रत्यङ्ग-विद्या है।।३१।।

सर्वसाधारणक्रमः २४५
श्रीपादुकां तुरीयमाह
तारित्रिकं सप्तममुद्रा शिव-शक्ति-संवर्त्त-पुपञ्चम-पुरन्दरवरयूं,
शक्तिशिवक्षमान्ते वादिवरयीं शिवभृगुत्रिशूल-बिन्दु-भृगुशिव-
त्रिशूलविसृष्टयः, श्रीपूर्वं स्वगुरुनामतोऽष्टाक्षरी चेति पादुका
च ।। ३२ ।।
तारित्रिकं त्रितारी। सप्तममुद्रा बीजम्। शिवः हः, शक्तिः सः, संवर्त्तः
क्षः, पुपञ्चमो मकारः। पुरन्दरो लः। ततो वरयूं, ततः शक्तिः, सः शिवः,
हः क्षमौ, अन्ते वादिः, वात् पूर्ववर्णो मातृकासु लः, ततो वरयीं ततः शिवः
हः, भृगुः सः, त्रिशूलम् औ, बिन्दुः हसौः, इति सम्पन्नम्। भृगुशिवत्रिशूला
उक्ताः। विसृष्टिः विसर्गः। ततः स्वगुरोर्दीक्षा नाम। ततः श्रीपादुकां
इत्यष्टाक्षरमन्त्रः। अष्टाक्षरे आदौ यः श्रीवर्णस्तस्य पूर्वं श्रीगुरोर्नाम इत्यर्थः।
एषा श्रीपादुका।। ३२ ।।
यह सूत्र श्रीपादुका मन्त्र का प्रवर्त्तक है। इसमें बहुतलतया कूट शब्दों का
प्रयोग किया गया है। मन्त्रों को सुगुप्त रखने की यह एक परिपाटी है। क्रमशः
कूटों से मन्त्र इस प्रकार का बनता है—
१. तारित्रिक = त्रितारी = ऐं ह्रीं श्रीं, २. सप्तममुद्रा = खेचरी = हस्ख्फ्रे,
३. शिव = ह, ४. शक्ति = स, ५. संवर्त्त = प्रलयनाम = क्ष, ६. पु = पवर्ग का
पञ्चम = म, ७. पुरन्दर = ल, ८. वरयूं, ९. शक्ति = स, १०. शिव = ह,
११. क्ष, १२. म, १३. रादि व का आदिवर्ण ल, १४. वरयीं,
१५. शिव = ह, १६. भृगु = स, १७. त्रिशूल और १८. बिन्दु = हसौँ,
१९-२०-२१-२२. विसृष्टि = विसर्ग स्हौः, २३. अपने गुरु का दीक्षा नाम,
२४. श्रीपादुकां पूजयामि नमः। सबको मिलाकर बोलने से पूर्ण श्रीपादुका मन्त्र
बनता है। इसका पूरा नाम श्रीविद्यागुरुपादुका मन्त्र है।।३२।।
एताभिश्चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या साम्राज्ञी मूलाधारे
विलोचनीया ।। ३३ ।।
बालादि चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या वक्ष्यमाणा मूलाधारे
विलोचनीया।। ३३ ।।

२४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
बाला से लेकर इन चारों से युक्त मूलविद्या का मूलाधार में भावन करना
चाहिये।।३३।।
मूलविद्यामाह
मादनशक्तिबिन्दुमालिनीवासवमायाघोषदोषाकरकन्दर्पगगन-
मघवद्भुवनभृगुपुष्पबाणभूमायेति सेयं तस्या महाविद्या ।।३४।।
तस्याः साम्राज्ञीनामिकायाः।।३४।।
सूत्रोक्त कूटशब्द— 'मादन; शक्ति, बिन्दु, मालिनी, वासव, माया, घोष,
दोषाकर, कन्दर्प, गगन, मघवद्, भुवन, भृगु, पुष्पबाण, भू, माया' इन सोलह
कूटों के माध्यम से मूलविद्या का कथन किया गया है। वृत्तिकार ने इसकी
व्याख्या न कर इसकी गोपनीयता को ही बल प्रदान किया है। अर्थात् यह विद्या
गुरु द्वारा ही ग्राह्य होनी चाहिये। पुस्तक से कदापि नहीं। इसे साम्राज्ञी श्रीविद्या
की मूलविद्या मानते हैं।।३४।।
अङ्गादियुक्ता श्यामाविद्या, अथ हृच्चक्रे ध्येयश्यामाऽङ्गविद्यामाह
वाङ्न

ऐं क्लीं सौः बाला मन्त्र है। इसके बाद दो बार वद वद बोलना चाहिये।
तत्पश्चात् वाग् और वादिनि के बाद स्वाहा बोलने से यह मन्त्र बनता है। श्यामा
की अङ्गरूपा यह वाग्वादिनी विद्या कहलाती है।।३६।।
अथ श्यामाप्रत्यङ्गमाह
प्रणव ओपिनाकुदंपवृषसस्यै च शाचामाहदशब्दाः ष्ठाधानलीतैः
रितार्विर्व्वाईनारुमिवार्येच्छेखरा नकुली श्यामाप्रत्यङ्गम्।।३७।।
ओ इत्यारभ्य दान्ता ये शब्दा वर्णाः षोडश तेषां क्रमेण
ष्ठावर्णमारभ्य येत् इति पर्यन्तं षोडश वर्णाः शेखरे अग्रभागे येषां ते। इदं
दशब्दा इत्यस्य विशेषणम्। इत्थं च ओ इत्यारभ्य ये दवर्णान्ताः षोडश तेषां
क्रमेण एकैकवर्णस्याग्रे ष्ठादिषोडशसु वर्णेषु क्रमेणैकैकं पठेत्। यथा आदौ
प्रणवः ततः ओ ततः ष्ठा, ततः पि एवञ्च द्वात्रिंशदक्षयनकुली श्यामाप्रत्यङ्गं
भवतीति भावः।।३७।।
३२ अक्षरों वाली नकुली विद्या 'श्यामा' की प्रत्यङ्ग-विद्या की संरचना
का अद्भुत क्रम भगवान् परशुराम ने इस सूत्र में अपनाया है। पहले प्रणव का
प्रयोग करना चाहिये। इसके बाद 'ओ' से लेकर 'द' तक सोलह शब्दों में से
एक-एक के साथ ष्ठा से लेकर येत् तक के सोलह अक्षरों में से एक-एक
को जोड़ना चाहिये। जैसे—प्रणव + ओ + ष्ठा + पि + धा + ना + न + कु
ली + दं + तैः + आदि। इसी तरह एक इस षोडश भाग से एक वर्ण और फिर
दूसरे षोडश भाग क्रमिक वर्ण मिलाने से पूरी विद्या बन जाती है।।३७।।
श्यामापादुकामाह
ललितापादुकादित्रिकस्थाने कुमारी योज्या शिष्टं तद्वद् इति
श्यामापादुका च।।३८।।
ललितापादुका या उद्धृता पूर्वं श्रीपादुकेति तस्याः प्रथमबीजत्रयस्थाने
बाला योज्या। शेषं पूर्ववत्। इयं श्यामापादुका।।३८।।
ललितापादुका मन्त्रविद्या में श्रीपादुका शब्द के पहले के तीन बीजों के
स्थान पर इसमें बाला मन्त्र लगा लेते हैं। वही मन्त्र श्यामापादुका मन्त्र बन
जाता है।।३८।।

२४८ परशुरामकल्पसूत्रम्
चतसृभिर्युक्ता हृच्चक्रे श्यामा यष्टव्या ।।३९।।
उक्ताभिश्चतसृभिर्युक्ता वक्ष्यमाणा श्यामा विद्या हृच्चक्रे अनाहते
यष्टव्या ।।३९।।
आगे श्यामा-विद्या का उल्लेख किया जा रहा है। इन चारों को मिलाकर
उसे अनाहत चक्र में भावन करना चाहिये।।३९।।
अथ श्यामाविद्यामाह
तद्विद्या तु त्रितारी कुमारी नभव श्री तं श्व स ज महासमुंरंनि
माया स रावक स स्त्री रु व क स दु मृ व क स स व क स
लो व क अ कं व माय हा वर्णाः ओं मो गति मा गी रि र्व न
नो रि र्व ख जि मदन श्रीं र्व ज शं विर्व पुष शं रि र्व ष्ट ग शं
रि र्व त्व शं रि र्व क शं रि मु मे श न स्वा ऽन्त मन्त्रादि बीजषट्कं
प्रातिलोम्यमिति अष्टनवतिवर्णाः ।।४०।।
तद्विद्या श्यामाविद्या। त्रितारी कुमारी च प्रागुक्ते। नश्च भश्चेति हावर्ण-
पर्यन्तं द्वन्द्वः। इत्थं ओं इत्यारभ्य स्वावर्णपर्यन्तं द्वन्द्वं। नकारमारभ्य हान्ता
ये वर्णास्तेषु क्रमेणैकैकवर्णोत्तरं योजयेत्। यथा ओं, तदुत्तरं नवर्णः, तदुत्तरं
मो, एतदुत्तरं भ इत्युत्तरेत्। एवं क्रमेण वर्णान् योजयित्वा स्वाहान्तं पठेत्।
न भ इत्यादि हावर्णान्तकूटे मायापदेन ह्रीं इति योज्यम्। एवं ओं इत्यारभ्य
स्वावर्णान्ते द्वितीयपदे कामपदे क्लीं इति वर्णं गृहीत्वा अष्टनवतिवर्णान्तर्गत-
पद्यत्रिंशद्वर्णः क्लीं इति योज्यः, कूटद्वयेऽपि शेषवर्णा उक्तरीत्या यथाश्रुता एव
पठितव्याः। एवं ग्रथनपूर्वकं स्वाहान्तं मन्त्रं पठित्वा ततः प्रथमषड्बीजानि
विपरीतानि पठेत्। एवञ्च सर्वं मिलित्वा अष्टनवतिवर्णा भवन्ति। अत्र ग्रथिते
मन्त्रे द्व्यशीति-त्र्यशीति-चतुरशीति-वर्णा अमुका इति भवन्ति। तत्स्थाने
विवक्षितनामनिर्देशः, सर्वनामत्वात्। विवक्षितनामप्रक्षेपे वर्णन्यूनाधिकभावो न
दोषाय।।४०।।
प्रथम मन्त्र की परिपाटी इसमें भी अपनायी गयी है। सर्वप्रथम त्रितारी
कुमारी ओं के बाद दो भागों में से क्रमशः एक-एक वर्ण लेकर मन्त्र बनता

सर्वसाधारणक्रमः २४९
है। बीज में माया पद के यहाँ हीं और दूसरे भाग में क्लीं योजन पर ध्यान
देना चाहिये। शेष सभी वर्ण उसी रीति पर जुटते हैं। अन्त में त्रितारी, कुमारी
को विपरीत क्रम से पढ़ना चाहिये। जहाँ नाम डालना अपेक्षित है, वहाँ मात्राओं
की घट-बढ़ में कोई दोष नहीं आता।।४०।।
अथ अनाहते ध्येयाया वाराहीविद्याया अङ्गमाह
हरः सबिन्दुर्वार्पूर्वंराहि स्थाणुः सबिन्दुरुन्मत्तपदं भैशब्दो
रविपादुकाभ्यां नम इति वार्त्ताल्यङ्गं लघुवार्त्ताली ।।४१।।
हरः अग्रे स्थाणुरिति दशमस्वरवाचकौ। इत्यं च प्रथमं लूं ततः पूर्वं
इत्यंशं त्यक्त्वा हिवर्णान्तः पुनः लूं ततः पदशब्द इत्येतावदंशमपहाय
नमोऽन्तं यथाश्रुतम्। इयं लघुवाराहा वाराह्यङ्गभूता ।।४१।।
'लूं वाराहि लूं उन्मत्तभैरवि पादुकाभ्यां नमः' यह लघुवाराही विद्या है।
यह वाराही माता की अङ्गभूत विद्या मानी जाती है।।४१।।
अथ वार्त्ताल्युपाङ्गविद्यामाह
वेदादिभुवनं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठद्वितयं अग्निदारा इति
वार्त्ताल्युपाङ्गं स्वप्नवार्त्ताली स्वप्ने शुभाशुभफलवक्त्री ।।४२।।
'ॐ ह्रीं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठः ठः स्वाहा' यह वार्ताली की
उपाङ्ग विद्या है। यह स्वप्न में शुभाशुभ फलों का निर्देश करती है। ऐसा
चाहने वाले इसकी स्वतन्त्र उपासना कर सकते हैं।।४२।।
तत्प्रत्यङ्गविद्यामाह
वाग्हृदयं भगवति तिरस्करिणि महामाये पशुपदाज्जनमनश्चक्षु-
स्तिरस्करणं कुरु द्वितयं वर्म फट् पावकपरिग्रह इति वार्त्ताली
प्रत्यङ्गतिरस्करिणी ।।४३।।
वाक् ऐं, हृदयं नमः। ततः पदादिति त्यक्त्वा तिरस्करणमित्यनन्तं
यथाश्रुतम्। ततः कुरु इति द्विवारम्। ततः वर्म हुम्। ततः फट् पावकपरिग्रहः
स्वाहा। इयं तिरस्करिणीविद्या प्रत्यङ्गभूता।।४३।।

२५० परशुरामकल्पसूत्रम्
'ॐ नमो भगवति तिरस्करिणि! महामाये पशुजनमनश्चक्षुस्तिरस्करणं
कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा' यह तिरस्करिणी विद्या देवी की प्रत्यङ्गविद्या
है।।४३।।
अथ वाराहीपादुकां दर्शयति
श्यामापादुका मन्त्रादित्रीबीजमपहाय वाग्ग्लौम् इति योज्यम्
एषा वार्त्तालीपादुका ।।४४।।
श्यामापादुकाया आदिबीजत्रयमपसार्य तत्स्थाने ऐं ग्लौम् इति पठित्वा
शेषम् अधिकृतं पठेत्। इयं वाराहीपादुका भवति।।४४।।
श्यामापादुका मन्त्र के आदि बीजत्रय 'ऐं ह्रीं श्रीं' को छोड़कर 'वाक् ऐं'
के साथ 'ग्लौं' जोड़ देने से वही मन्त्र वाराहीपादुका मन्त्र बन जाता है।।४४।।
विद्याभिरेताभिर्युक्तफालचक्रे परिपूज्या भगवतीयं
भूदारमुखी ।।४५।।
एताभिरुक्ताभिर्विद्याभिर्युक्ता भूदारमुखी वाराही तद्विद्येत्यर्थः। सा
फालचक्रे आज्ञायां परिपूज्या ध्येयेत्यर्थः।।४५।।
आज्ञाचक्र में अङ्गादि विद्याओं से युक्ता वाराही विद्या का ध्यान करना
चाहिये। इससे वाराही विद्या देवी प्रसन्न होती है।।४५।।
अथ वाराहीविद्यामाह
मनुरिदमीयोऽयं वाक्पुटितं ग्लौं न भ व वा र्त्ता वा हि रा
व ह खि रा मु अं अं नि मः धेधि न जं जं नि मः हे हि नस्तं
स्तं नि मः र्वष्ट दु नां वें स वा क त्त क्षु ख ति ह्ला भ कु कु
शी व शब्दाः यथाक्रमं मो ग ति र्त्ता वा लि रा वा हि रा मु व
ह खि धे धि न रुं रुं नि भः भे भि न मो मो नि मः भे भि
न सदुप्र ष्टा स षां र्व चि च मु र्ग जि स्तं नं रु रु भ्रं श्यं शब्दोपेता
वाग् ग्लौं विसृष्ट्यन्ताश्च सप्तमाश्चत्वारो वर्मास्त्राय फडिति
द्वादशोत्तरशताक्षरा ।।४६।।

सर्वसाधारणक्रमः २५१
अस्या वाराह्या अयं इदमीयः। मनुः मन्त्रः। प्रथमं ऐं, ततः ग्लौं, ततः
ऐं इति तदर्थः। ततो नेत्यारभ्य वान्ता ये वर्णास्तेषु क्रमेणैकैकवर्णोत्तरं मो
इत्यारभ्य श्यं इति वर्णान्ताः क्रमेण पूर्ववद् एकैकान् पठेत्। एवं ग्रथनपूर्वकं
वश्यंपर्यन्तं पठित्वा। ततो वाक् ऐं। ततो ग्लौं पठित्वा इति। ततश्चवर्णात्
सप्तमा ठकारा विसृष्ट्यन्ताश्चत्वारः पठित्वा। वर्म हुम्। ततो अस्त्राय फट्
इति पठेत्। इयं वाराही-विद्या। द्वादशोत्तरशताक्षरी ज्ञेया।।४६।।
पूर्वपरिपाटी अपनाकर मन्त्र की गोपनीयता का प्रदर्शन इस सूत्र में भी
है। सूत्रोक्त ग्लौं के बाद के सभी अक्षरों में 'यथाक्रमं' के बाद पठित मोसेश्यं
तक के एक-एक के साथ एक को जोड़ने से पूरा मध्यगत मन्त्र अभिव्यक्त हो
जाता है। उसके बाद च से सातवें चार ठकार विसर्ग सहित बोलने के बाद
हुं अस्त्राय फट् लगाकर मन्त्र पूरा करते हैं। यह एक सौ बारह अक्षरों का मन्त्र
है।।४६।।
अथ ब्रह्मरन्ध्रे यष्टव्यां श्रीपूर्त्तिविद्यामाह
पञ्चमैकादशबीजवर्ज्जा श्रीरेव श्रीपूर्त्तिविद्या ब्रह्मकोटरे
यष्टव्या ।।४७।।
पूर्वं मादनशक्त्यादिना दर्शिता या श्रीविद्या तस्यां यः पञ्चम एकादशश्च
वर्णो मायाबीजं तावपहाय श्रीविद्यैवोर्वरिता श्रीपूर्त्तिविद्या। सा ब्रह्मकोटरे
ब्रह्मरन्ध्रे ध्येयेति यावत् ।।४७।।
सूत्र ३४ में मूल श्रीविद्या की विद्या का कूट विधि से उल्लेख किया
गया है। वही विद्या श्रीपूर्त्तिविद्या हो जाती है। उसमें कुछ परिवर्तन भी कर देते
हैं। पाँचवें और ग्यारहवें वर्णों का परित्याग कर देने से ही यह अन्तर हो जाता
है। इसका ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिये।।४७।।
महापादुका
श्यामापादुका प्रथमत्रिकस्थाने तारत्रयं कुमारी वाक् ग्लौं इति
योज्यम्। ततः परस्तात्। शेषं समानम् ।।४८।।
स्पष्टम् ।।४८।।