परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
वाक् ऐं, कामः क्लीं, शक्तिः सौः। इमाः प्रथमं पठित्वा पश्चाद्
विपरीतं पुनः क्रमेण पठेत्। इयं नवार्णा श्रियोऽङ्गभूता बाला। त्र्यक्षरी तु
शुद्धबाला। सैव कुमारीपदवाच्या। तस्मात् श्रियोऽङ्गबाला शुद्ध-
बालातोऽन्या।।२९।।
श्रिय उपाङ्गं द्वितीयमाह
भुवना कमला सुभगा तारो नमो भगवति पूर्णे शेखरमन्न
ममाभिलषितमुक्त्वा देहि दहन जायेति श्रिय उपाङ्गमन्नपूर्णा।।३०।।
भुवना ह्रीं कमला श्रीं सुभगा क्लीं। तारः ॐ ततो नमो भगवति।
ततः पूर्णे, शेखरे अग्रभागे यस्य ईदृशं यद् अन्न इति वर्णद्वयम्, अन्नपूर्णे
इति पठितव्यम्। उत्त्वेत्यंशमपहाय देह्यन्तं समानम्। दहन जाया स्वाहा।
इयम् अन्नपूर्णा विद्या श्रिय उपाङ्गं भवति।।३०।।
'ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ नमो भगवति अन्नपूर्णे ममाभिलषितमन्नं देहि स्वाहा'
इस श्रीविद्या की उपाङ्गभूता अन्नपूर्णा मन्त्र के सूत्र में भुवना (ह्रीं), कमला (श्रीं)
सुभगा (क्लीं) तार (ॐ) दहनजाया (स्वाहा) इन कूट शब्दों के प्रयोग हैं। इस
मन्त्र से अन्नपूर्णा प्रसन्न होती है।।३०।।
श्रियः प्रत्यङ्गं तृतीयमाह
प्रणवः पाशादित्र्यर्णा एहि परमेश्वरीत्युक्त्वा वह्निवामाक्ष्युक्ति-
रिति श्रीप्रत्यङ्गमश्वारूढा।।३१।।
पाशादि त्र्यर्णा आं ह्रीं क्रों। आद्यवर्णद्वयं शिवयोः पाशः, क्रों
इत्यङ्कुशः। शेषं स्पष्टम्। इति।।३१।।
प्रणव ॐ। शिव-शक्ति के पाशबीज 'आं ह्रीं' हैं। क्रों अङ्कुश है। यही
तीन बीजाक्षर पाशादि त्र्यर्ण कहलाते हैं। इनके उच्चारण के उपरान्त एहि
परमेश्वरि बोलकर 'स्वाहा' बोलना चाहिये। स्वाहा अग्नि की वामा अर्थात् पत्नी
मानी जाती है। पूरा मन्त्र 'ओं आं ह्रीं क्रों एहि परमेश्वरि स्वाहा' बनता है। यह
अश्वारूढा प्रत्यङ्ग-विद्या है।।३१।।