सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

२४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
उच्चार्येति त्यक्त्वा स्वाहान्ता प्रथमा विद्या। हमिति नमोऽन्तां द्वितीया
विद्या। अनलबिन्दुतः फडित्यन्ता तृतीया विद्या। ततोऽग्निबिन्दुः रं, ततः
फडित्यन्ता चतुर्थी विद्या। क्रमेणोक्तासु चतसृषु विद्यासु मध्ये सृष्टिस्थिति-
संहाराख्या या आद्यास्तिस्रस्ताः प्रातिलोम्येन पठित्वा, खेचरीबीजमुक्तं पठित्वा
वाणी च इत्येतावदंशमपहाय योगेश्वर्यन्तं पठेत्। इयं पञ्चमी विद्या। एवं
पञ्चविद्यासमष्टिरूपिणी कालस्य मृत्योः सङ्कर्षिणी विनाशिनी परमायुः
शतवर्षपर्यन्तं तत्प्रदेत्यर्थः॥२५॥
इसमें पाँच विद्याओं का उल्लेख है। वे इस प्रकार हैं—
१. सं से स्वाहा पर्यन्त = सं सृष्टिनित्ये स्वाहा।
२. हं से नमः पर्यन्त = हं स्थितिपूर्णे नमः।
३. अनलबिन्दु रं से फट् पर्यन्त = रं महासंहारिणि कृशे चण्डकालि फट्।
४. अग्निबिन्दु रं से फट् पर्यन्त = चतुर्थी विद्या—रं हस्ख्फ्रें महानाख्ये
अनन्तभास्करि महाचण्डकालि फट्।
५. आदि तीन विद्याओं का प्रतिलोम भाव से उच्चारण जैसे—रं महासंहारिणि
कृशे चण्डकालि फट्, हं स्थितिपूर्णे नमः, सं सृष्टिनित्ये स्वाहा।
इसके तुरन्त बाद खेचरी बीज 'हस्ख्फ्रें' पढ़कर और 'वाणी' शब्द छोड़कर
'महाचण्डयोगेश्वरि' तक पढ़ने से एक पंचविद्यात्मिका मन्त्रविद्या पूरी होती है।
यह पञ्चविद्यासमष्टिरूपिणी कालसङ्कर्षिणी विद्या है। यह शतवर्षीया परमायु प्रदान
करती है। इसका भावन आज्ञाचक्र में होता है॥२५॥
चतुर्थमाह
त्रितारी सप्तमुद्रा शिवयुक्शक्तिरहं युगलं मे तत्पञ्चैव
लोम्यमिति शुद्धज्ञानमयी शाम्भवी विद्या ॥२६॥
त्रितारी उक्ता। अत्र सप्तममुद्रापदेन तद्बीजं शिवो हः, तेन युक्शक्तिः
सौः, हसौः। अहं युगलम्। एवं क्रमेण पञ्चावयवाः। प्रथमावयवस्त्रितारी,
हस्ख्फ्रें द्वितीयः, हसौः तृतीयः, अहंयुगलं चतुर्थपञ्चमौ। एते पञ्चावयवा