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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

सर्वसाधारणक्रमः २४३
विपरीतं पठिता चेत् शाम्भवी विद्या। शुद्धज्ञानं निर्विषयं तत्स्वरूपा केवल-
ब्रह्मस्वरूपेत्यर्थः।।२६।।
१. त्रितारी—ऐं ह्रीं श्रीं। २. सप्तमी मुद्रा-हस्ख्फ्रें, ३. शिवयुक्तशक्ति ह
रूपशिव से युक्त शक्ति—सौः हसौः। ४-५ अहंयुगल, ४. अहम् ५. अहम्।
इन पाँचों अवयवों का विपरीत पाठ। जैसे अहम् अहम् हसौः हस्ख्फ्रें
श्रीं ह्रीं ऐं। यह इस तरह दश अवयवात्मक हो जाती है। इसे शाम्भवी विद्या
कहते हैं। यह शुद्ध निर्विषय ब्रह्मज्ञानमयी विद्या मानी जाती है। ब्रह्मरन्ध्र में इसका
भावन करना चाहिये।।२६।।
पञ्चममाह
भृगुत्रिशूलविसृष्टयः पराविद्या।।२७।।
भृगुः सः, त्रिशूलम् औ, विसृष्टिः विसर्गः, मिलित्वा पराविद्या
भवति।।२७।।
स् + औ + : विसर्ग। तीनों को मिलाने से 'सौः' बीजमन्त्र बनता है।
यह पाँचवाँ मन्त्र है। इसे परा विद्या कहते हैं। द्वादशान्त में इसका भावन होना
चाहिये।।२७।।
पञ्चेमा रश्मयो मूलाद्यधिष्ठानतया परिकल्पनीयाः।।२८।।
स्पष्टं पञ्च पञ्च मन्त्राः।।२८।।
मूलाधार, अनाहत, आज्ञा, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में इन पाँचों का
क्रमिक रूप से भावन करना चाहिये।।२८।।
श्रीविद्या (अङ्गोपाङ्गप्रत्यङ्गपादुकायुक्ता)
मूलाधारादिषु एकैकस्थाने एकैकविद्यायोजनमुक्त्वा इतः परं
अङ्गोपाङ्गप्रत्यङ्गपादुकायुक्तमूलविद्यायाः पञ्चविद्या समष्टिरूपेणैक-
स्थान एव विभावनं विवक्षुस्तत्रादौ श्रियोऽङ्गबालामाह
वाक्कामशक्तयोऽनुलोमविलोमाः पुनरनुलोमा इति श्रियोऽङ्ग-
बाला।।२९।।