पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
५२ कुंडलिया
अमृत दीजै ब्याल¹ नहीं वा को बिष जावै ॥
लगै न भीतर ज्ञान ताहि से मन न मिलावै ।
मारै भाल पषान धसै नहिं उलटा आवै ॥
पलट जो बूझै नहीं बोलै से रहु बाज ।
मूरखै को समुझाइये नाहक होइ अकाज ॥
( १३० )
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
बिना बिचार बिबेक भये सब एकै घानी ।
पीना² भा संसार जाठि ऊपर मर्दनी ॥
इतना दुख सब सहैं तूहू पर नाहिं डराते ।
फिर फिर पेरे जायँ कर्म में फिर लपटाते ॥
देखी देखा पड़ै आपु से आपु पेरावै ।
पेरे से जो बचै ताहि को हँसी³ लगावै ॥
पलटू मैं रोवन लगा चलता कोल्हू देख ।
तीन लोक पेरा गया बिना बिचार बिबेक ॥
( १३१ )
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
करि लो अपना काम सोच मोहिं वा दिन केरी ।
जेहि से कौल करार कौल से आपन हेरी ॥
कीन्हों भक्ति करार जन्म तब मानुष पायो ।
मोकहँ है सो चेत गर्भ के बिच करि आयो ॥
औंधे बासन मँहै नीर जिन्ह लिया उबारी ।
तेकहँ तजि कै रहौं कुसल का होय तुम्हारी ॥
जगत हँसे तो हँसन दे पलटू हँसै न राम ।
लोक लाज कुल छाड़ि कै करि लो अपना काम ॥
( १३२ )
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
(१) साँप । (२) मोटा । (३) उस को पाखंडी कह कर संसार हँसता है ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ५३
भक्ति करौ निर्धार लोक की लाज न मानौ ।
देव पितर मुख खाक डारि इक गुरु को जानौ ॥
तजि दो कुल की रीति खोलि घूँघट को नाचौ ।
बेद पुरान मत काच काछनी काछौ साचौ ॥
सुभ आसुभ दोउ काटु पाँव की अपने बेरी ।
निसि दिन रहौ अनन्द कोऊ का करिहै तेरी ॥
पलटू सतगुरु चरन पर डारि देहु सिर भार ।
तन मन लज्जा खोइ कै भक्ति करौ निर्धार ॥
( १३३ )
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
तन मन लज्जा खोय छोड़ि कै मान बड़ाई ।
जाति बरन कुल खोय पड़ौगे सरन में जाई ॥
लाख कोऊ जो हँसै जगत की लाज न मानौ ।
ज्यों हिन्दू त्यों तुरुक सकल घट साहिब जानौ ॥
नाचौ घूँघट खोलि ज्ञान की ढोल बजाओ ।
काटौ जम की फाँस भरम को दूर बहाओ ॥
पलटू बरिहौ¹ नाम को होनो होय सो होय ।
लोक लाज नहिं मानिहौ तन मन लज्जा खोय ॥
( १३४ )
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
ता को सुमिरु गंवार भला अपना जो चाहो ।
झूठा है संसार रैन सपने सा जानो ॥
माता पिता सुत बन्धु झूठ इनको सब जानो ।
सतसंगति हरि भजन सत्त दुइ इनको मानो ॥
और देव सब बृथा आस इन की ना कीजै ।
(१) ब्याहो ।
५४ कुंडलिया
सब देवन के देव हरी अन्तर भजि लीजै ॥
पलटू हरि के भजन बिन कोउ न खतरै पार ।
जेहि सुमिरे गनिका तरी ता को सुमिरु गँवार ॥
( १३५ )
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
त्यों त्यों गरुई होय सुने संतन की बानी ।
थोपै थोप अघाय ज्ञान के सागर पानी ॥
रस रस बाढ़ै प्रीति दिनों दिन लागन¹ लागी ।
लगत लगत लगि जाय भरम आपुइ से भागी ॥
रस रस चलै सो जाय गिरै जो आतुर² धावै ।
तिल तिल लागै रंग भंगि³ तब सहजै आवै ॥
भक्ति पोढ़ पलटू करै धीरज धरै जो कोय ।
ज्यों ज्यों भीजै कामरी त्यों त्यों गरुई होय ॥
( १३६ )
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
आपुइ जाते हारि कथनियाँ बाद४ न आवैं ।
घरे मसलहत करैं बटुरि कै सौ सौ धावैं ॥
आवैं हमरे पास बैठि कै गाल बजावैं ।
उलटा पुलटा कहैं बचन बिपरीत सुनावैं ॥
बोली ठोली करैं छिमा करि चुप मैं मारौं ।
भूँकि भूँकि फिरि जायँ जुगत से उनको टारौं ॥
पलटू हम से लड़न को आवै सब संसार ।
वे बोलैं मैं चुप रहौं आपुइ जाते हारि ॥
( १३७ )
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
करम न कीजै त्याग जक्त की बूझ बड़ाई ।
(१) लगन । (२) जल्दी । (३) युक्ति । (४) बाज़ ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१. ५५
ओहु ओर दारै तोरि एहर कुछ एक न पाई ॥
उत कुल से वे गये नाहिं इत मिला ठिकाना ।
केहू ओर में माहिं बीच के बीच भुलाना ॥
जेहुँ जेहुँ पावै बस्तु तेहुँ तेहुँ करम को छोड़ै ।
खातिर जमा को लेइ जगत से मुहड़ा मोड़ै ॥
पलट पग धरु निरख करि ता तें लगै न दाग ।
जौं लगि लागै हाथ ना करम न कीजै त्याग ॥
( १३८ )
दुइ पासाही फकर१ की इक दुनियाँ इक दीन ॥
इक दुनियाँ इक दीन दोऊ को राखै राजी ।
सब की मिलै मुराद गैब की नौबति बाजी ॥
हाथ जोरि मुहताज सिकन्दर रहते ठाढ़े ।
हुकुम बजावहिं भूप जबाँ२ से जो कछु काढ़े ॥
चलै फहम३ की फौज दरोग४ की कोट ढहाई ।
बेदावा तहसोल सबुर कै तलब लगाई ॥
पलट ऐसी साहिबी साहिब रहै तबीन५ ।
दुइ पासाही फकर की इक दुनियाँ इक दीन ॥
( १३६ )
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ।
मूरख पहरा देइ भोर भये आपुइ रोवै ।
साँध परोसी चोर माल धरि गाफिल सोवै ॥
सुनहु साहु धनवंत सबै सम्पति के घाती ।
नहिं कीजै बिस्वास जागत रहिये दिन राती ॥
दिन दिन बढ़ती होइ आन को चित्त न दीजै ।
सब से रहिये दूर केहू को मित्र न कीजै ॥
(१) फकीरी । (२) जुबान, जीभ । (३) बिचार । (४) झूठ । (५) ताबेदार ।
५६ कुंडलिया
पलटू जो ऐसे रहै द्रव्य कोऊ नहिं लेइ ।
चोर मूँसि घर पहुँचा मूरख पहरा देइ ॥
( १४० )
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
भरम करै संसार होइ आसन से पक्का ।
भली बुरी कोउ कहै रहै सहि सब का धक्का ॥
धीरज धै संतोष रहै दृढ़ है ठहराई ।
जो कछु आवै खाइ बचै सो देइ लुटाई ॥
लगै न माया मोह जगत की छोड़ै आसा ।
बल तजि निरबल होय सबुर से करै दिलासा ॥
काम क्रोध को मारि कै मारै नींद अहार ।
पलटू ऐसे दास को भरम करै संसार ॥
( १४१ )
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
पाछे तौ सिर खोलु बचा तुम सुनौ फकीरी ।
हेलुआ जूती एक, नाहिं आवै दिलगीरी १ ॥
रूखा सूखा खाउ मिलै जो गम का टुकड़ा ।
फीका कड़ुवा नाहिं स्वाद सब छोड़ौ झगड़ा ॥
हक हलाल वह जानु सबर से बैठे आवै ।
खाना वही हराम किसी से माँगन जावै ॥
पलटू वह घर राम का बच्चा तू जनि बोलु ।
बूझि समुझि ले बालके पाछे तौ सिर खोलु ॥
( १४२ )
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
नीच कहै ना कोय गये जब से सरनाई ।
( १ ) नापसंद होना, दुख मानना ।
[Page Header: पलटू साहिब की बानी भाग—१ | ५७]
नारा बहि कै मिल्यो गंग में गंग कहाई ॥
पारस के परसंग लोह से कनक कहावै ॥
आगि मँहै जो परै जरै आगै होइ जावै ॥
राम का घर है बड़ा सकल ऐगुन छिपि जाई ।
जैसे तिल को तेल फूल सँग बास बसाई ॥
भजन केरे परताप तें तन मन निरमल होय ॥
पलटू नीच से ऊँच भा नीच कहै ना कोय ॥
( १४३ )
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
करै सिंह को संग सिंह की रहनी रहना ।
अपनो मारा खाय नहीं मुरदा को गहना ॥
नहिं भोजन नहिं आस नहीं इन्द्री की तिष्टा१ ।
आठ सिद्धि नौ निधि ताहि को देखत बिष्टा२ ॥
दुष्ट मित्र सब एक लगै ना गरमी पाला ।
अस्तुति निंदा त्यागि चलत है अपनी चाला ॥
पलटू झूठा ना टिकै जब लगि लगै न रंग ।
हस्ती बिनु मारे मरै करै सिंह को संग ॥
( १४४ )
स्वाँती को जल एक है अपनी अपनी खानि ॥
अपनी अपनी खानि सीप से मोती कहियै ।
हीरा होइ हिरंज सीस गज मुक्ता लहियै ॥
केश परै कपूर बेन३ तें लोचन४ ब्याला५ ।
अहि मुख जहर समान उपल६ तें लोह कराला ॥
गौ लोचन गौ सीस मिरग मद नाभि तें जानौ ।
भिन्न भिन्न गुन होय नीर एकहि पहिचानौ ॥
(१) चाह । (२) गलोज । (३) बाँस । (४) बंसलोचन । (५) दुष्ट—यह अहि =
सांप का विशेषण है। (६) पत्थर ।
८
५८ कुंडलिया
पलटू खामिंद एक है निसचै प्रेम प्रधान ।
० उपजै बस्तु सुभाव तें अपनी अपनी खानि ॥
( १४५ )
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
निसि दिन करै बिबेक लागि तब निकरन साखा ।
डार पात बहु फूल जतन से जिन ने राखा ॥
हरि चरचा से सींचि ज्ञान कै बाँधै बेड़ा ।
पहुँचै सोर पताल खात संतन कै खेड़ा१ ॥
सोभित बृच्छ बिसाल मीठ फल लटकन लागे ।
बिस्वास सोई रखवार बैठि कै पहरा जागै ॥
पलटू यहि बिधि जोगवै उपजै ज्ञान बिसेख ॥
भक्ति बीज जब बोवै निसि दिन करै बिबेक ॥
( १४६ )
पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
मित्र न कीजै कोय चित्त दै बैर बिसाहै२ ।
निस दिन होय बिनास ओर वह नाहिं निबाहै ॥
चिन्ता बाढ़ै रोग लगा छिन छिन तन छीजै ।
कम्मर३ गरुवा होय ज्यों ज्यों पानी से भीजै ॥
जोग जुगत की हानि जहाँ चित अंतै जावै ।
भक्ति आपनी जाय एक मन कहूँ लगावै ॥
० राम मिताई ना चलै और मित्र जो होय ।
० पलटू सरबस दीजिये मित्र न कीजै कोय ॥
( १४७ )
रवा४ टूटै रवा फाटै कहिये परदा खोल ॥
कहिये परदा खोल रवा ना बाकी कीजै५ ।
(१) गाँव । (२) मोल ले । (३) कम्मल । (४) चाहे । (५) जर्रा (रवा)
भर न उठाय रक्खो ।
: yes, two slants and a dot. It is "करैं".
Wait, let's check line 8 again:
"रवा टूटै रवा फाटै कहिये परदा खोल ।"
Wait, is there a danda after बोल in line 7 and खोल in line 8?
Line 7 ends with: बोल । (single danda)
Line 8 ends with: खोल । (single danda)
Wait, let's check:
Line 2 ends with: पीजै ॥ (double danda)
Line 3 ends with: अधरमी । (single danda)
Line 4 ends with: सरमी ॥ (double danda)
Line 5 ends with: करनी । (single danda)
Line 6 ends with: ब्योहरनी ॥ (double danda)
Line 7 ends with: बोल । (single danda)
Line 8 ends with: खोल । (single danda)
This is a standard Kundaliya ending structure (the last two lines are a doha or soratha, or kundaliya rhyming lines).
Heading:
॥ ज्ञान ॥
( १४८ )
Pada:
परदा अंदर का टरै देखि परै तब रूप ॥
देखि परै तब रूप मिटै सब मन का धोखा ।
परै सबद टकसार बहुत चोखे से चोखा ॥
[L1
६० कुंडलिया
पलटू सतगुरु रहनि को परखि लेय जो कोय ।
समुझाये से क्या भया जब ज्ञान आपु से होय ॥
( १५० )
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
सो क्या लावै ध्यान ध्यान दुतिया कहवावै ॥
आप भया पासाह कौन के मुजरे जावै ।
० भजनी१ से भा भजत२ कौन अब आवै जावै ।
लिहा निसाना मारि कौन अब तीर चलावै ॥
मन के संकल्प भजन रूप अपनो दरसावै ।
जो इहवाँ सो उहाँ सँकल्प को दूरि बहावैं ॥
पलटू लगी सो लगि गई कौन होय हैरान ।
ज्ञान समाधि जा को मिली सो क्या लावै ध्यान ॥
( १५१ )
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
हीरा आगे पोत ज्ञानी को मूढ़ बुझावै ।
जहवाँ आँधी चलै बेना कै बतास३ चलावै ॥
अटकर सेती अंध डिठियारे४ राह बतावै ।
जैसे पंडित चतुर संत से बाद५ न आवै ॥
सुधा क पीवनहार ताहि को छाछ दिखावै ।
जेकरे बाजै तूर तहाँ का डफ्फ बजावै ॥
पलटू दीपक का करै जहँ सूरज की जोत ।
समुझे को समुझावै हीरा आगे पोत ॥
( १५२ )
अपनी अपनी करनी अपने अपने साथ ॥
(१) भजन करने वाला । (२) जिसका भजन किया जाता है । (३) पंखे की हवा ।
(४) आँख वाले को । (५) बाज न आवै, पीछे पड़ा रहै ।
पलटू साहिब की बानी भाग - १ ६१
अपने अपने साथ करै सो आगे आवै ।
बाप कै करनी बाप पूत कै पूतै पावै ॥
जोरू कै जोरूहिं फलै खसम कै खसम कौ फलता ।
अपनी करनी सेती जीव सब पार उतरता ॥
नेकी बदी है संग और ना संगी कोई ।
देखौ बूझि बिचारि संग ये जैहैं दोई ॥
पलटू करनी और की नहीं और के माथ ।
अपनी अपनी करनी अपने अपने साथ ॥
( १५३ )
सरबंगी जो नाम कै रहनी सहित बिबेक ॥
रहनी सहित बिबेक एक करि सब कौ मानै ।
खान पियन में जुदा नहीं एकै में सानै ॥
लिये रहै मर्जाद तजै ना नेम अचारा ।
धर्म सनातन सहित असुभ सुभ करै बिचारा ॥
बोलै सब्द अघोर भजन अद्वैता अंगी ।
कारज निर्मल करै सोई पूरा सरबंगी ॥
पलट बाहर कुल धरम भीतर राखै एक ।
सरबंगी जो नाम कै रहनी सहित बिबेक ॥
॥ शरण और व्रत टेक) ॥
( १५४ )
करम धरम सब छाड़ि कै पड़े सरन में आय ॥
पड़े सरन में आय तजो बल बुधि चतुराई ।
जप तप नेम अचार नहीं जानौं कछु भाई ॥
पूजा ज्ञान न ध्यान तिलक नहिं देवै जानौं ।
जोग जुगत कछु नहीं नहीं तीरथ व्रत मानौं ॥
एक भरोसा पाय दिया सिर भार लराई १ ।
(१) गिरा दिया ।
६२ कुंडलिया
पंछी को पछ¹ गया रहा इक नाम सहाई ॥
पलटू में जियतै मुवा नाम भरोसा पाय ।
करम धरम सब छाड़ि कै पड़े सरन में आय ॥
( १५५ )
पलटू सोवै मगन में साहिब चौकीदार ॥
साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन लागे ।
दूनों पाँव पसार देखि कै दुस्मन भागे ॥
जाके सिर पर राम ताहि को बार न बाँकै ।
गाफिल में मैं रहौं आपनी आपुइ ताकै ॥
हम को नाहीं सोच सोच सब उन को भारी ।
छिन भरि परै न भोर² लेत हैं खबर हमारी ॥
लाज तजा जिन राम पर डारि दिहा सिर भार ।
पलटू सोवै मगन में साहिब चौकीदार ॥
( १५६ )
कोउ कितनौ चुगुली करै सुनै न बात³ हमार ॥
सुनै न बात हमार गये जब से सरनाई ।
सब ऐगुन करि माफ लिहिन मोकँह अपनाई ॥
करत फिरौं अन्याय काम ना क्रोध बिचारा ।
कैसेउ पूत कपूत पिता को आखिर प्यारा ।
लोभी लंपट चोर कुकरमी जातिन नीचा ।
अपने सरन की लाज जानि पद दीन्हेउ ऊँचा ॥
पलटू हम से राम से ऐसो भा ब्योहार ।
कोउ कितनौ चुगुली करै सुनै न बात हमार ॥
( १५७ )
जौन काछ कौ काढिये नाच नाचिये सोय ॥
नाच साचिये सोय तबै तौ सोभा पावै ।
(१) पंख । (२) भूल । (३) शिकायत ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६३
बिना काछ कै नाच भाँड़ कै स्वाँग बनावै ॥
आदि अंत मधि माहिं जो हरि कौ बर्त निबाहै ।
जीवन ता कौ सुफल निगम दिन राति सराह्रै ॥
बात जीव के संग नाहिं जो हारि ललकरी१ ।
हरि भक्तन की रीति टेक पकरी सो पकरी ॥
पलटू काछ औ नाच से तनिक न तजविज२ होय ।
जौन काछ कौ काछिये नाच नाचिये सोय ॥
( १५८ )
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु३ अड़नि अड़ै ॥
ज्यों सिसु अड़नि अड़ै टेक अपनी नहिं टारै ।
पुरजे पुरजे कटै कोऊ कितनौ जो मारै ॥
धरन धरी सो धरी वही हरि के ब्रत धारी ।
धोये तनिक न छुटै रंग जब चढ़ा करारी ॥
धरन नीबाहै और साँच में दाग न लागै ॥
ज्यों पतिब्रता नारि डिगै ना लाख डिगावै ॥
पलटू लोह की मेख ज्यों पत्थर बीच गड़ै ।
साधु को ऐसा चाहिये ज्यों सिसु अड़नि अड़ै ॥
॥ बिनय ॥
( १५६ )
पतितपावन बाना धर्यो तुमहिं परी है लाज ॥
तुमहिं परी है लाज बात यह हम ने बूझी ।
जब तुम बाना धर्यो नाहिं तब तुम कहँ सूझी ॥
अब तो तारे बनै नहीं तो बाना उतारौ ।
फिर काहे को बड़ा बाच जो कहिकै हारौ ॥
आगहिं तुम गये चूक दोष नहिं दीजै मेरो ।
तुम यह जानत नाहिं पतित होइहैं बहुतेरे ॥
(१) हौसला । (२) तजावज = फर्क । (३) बालक ।
६४ कुंडलिया
पलटू मैं तो पतित हौं किये असुभ सब काज ।
पतितेपावन बाना धर्यो तुमहिं परी है लाज ॥
( १६० )
दीनन पर दाया करौ सुनिये दीनदयाल ॥
सुनिये दीनदयाल दीन को बहुत निवाजा ।
भया अभीखन दीन किया लंकापति राजा ॥
रिपु रावन की बधू दीन है बिनती कीन्हा ।
सिलोचना पति सीस मुक्ति सायुज्य सो दीन्हा ॥
ब्रह्मै कीन्हौ द्रोह गयौ बछरा हरि आनी१ ।
दीन भया जब आय मित्रता वा से मानी ॥
पलटू पावै भक्ति को लेहु जक्त जंजाल ।
दीनन पर दाया करौ सुनिये दीनदयाल ॥
( १६१ )
पलटू पूछै हंस से बिनती कै कर जोर ॥
बिनती कै कर जोर साच तुम बात बतावौ ।
भई साहिबी तोर नर्क से जीव बचावैौ ॥
अंधा पंगुल लूल सबन कौ मिलै ठिकाना ।
इक इक सब के हाथ नाम का द्यो परवाना ॥
संत रूप अवतार लियौ परस्वारथ काजां ।
चौरासी चौखान सबन के तुम हौ राजा ॥
जीव तरै जब जक्त कौ तब तुम बंदीछोर ।
पलटू पूछै हंस से बिनती कै कर जोर ॥
॥ दीनता ॥
( १६२ )
मन मिहीन करि लीजिये जब पिउ लागै हाथ ॥
( १ ) कथा है कि ब्रह्मा श्रीकृष्ण की परीक्षा के लिये उन के सब बछड़े हर कर
अपने लोक को ले गये जिस पर श्रीकृष्ण ने वैसे ही बछड़े तुर्त रच लिये । यह लीला
देख कर ब्रह्मा बहुत लज्जित हुए ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६५
जब पिउ लागै हाथ नीच ह्वै सब से रहना ।
पच्छा पच्छी त्यागि ऊँच बानी नहिं कहना ॥
मान बड़ाई खोय खाक में जीते मिलना ।
गारी कोउ दै जाय छिमा करि चुपके रहना ॥
सब की करै तारीफ आप को छोटा जानै ।
पहिले हाथ उठाय सीस पर सब को आनै १ ।
पलटू सोई सुहागिनी हीरा झलकै माथ ।
मन मिहीन करि लीजिये जब पिव लागै हाथ ॥
( १६३ )
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
गुरु दासन को दास सन्तन ने कीन्ही दाया ।
सहज बात कछु गहिनि छुड़ाइनि हरि की माया ॥
ताकिनि तनिक कटाच्छ भक्ति भूतल २ उर जागी ।
स्वस्ता ३ मन में आई जगत की भ्रमना भागी ॥
भक्ति अभय पद दीन्ह सनातन मारग वा की ।
अविरल ओकर नाम लगै ना कबहीं टाँकी ॥
पलटू ज्ञान न ध्यान तप महा पुरुष कै आस ।
जोग जुगत ना ज्ञान कछु गुरु दासन को दास ॥
( १६४ )
दूसर पलट इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
भक्ति दई तेहि जान नाम पर पकरयो मोकहँ ।
गिरा परा धन पाय छिपायों मैं ले ओकहँ ॥
लिखा रहा कुछ आन कर्म में दीन्हा आनै ॥
जानौं महीं अकेल कोऊ दूसर नहिं जानै ॥
पाछे भा फिर चेत देय पर नाहीं लीन्हा ॥
(१) प्रनाम करै । (२) पृथ्वी भर की । (३) शांति ।
६
६६ कुंडलिया
आखिर बड़े की चूक जोई निकसा सोइ कीन्हा ॥
पलटू मैं पापी बड़ा भूल गया भगवान ।
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
॥ मान ॥
( १६५ )
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
पचि मूआ संसार जती जोगी सन्यासी ।
उनहूँ को है चाह गुफा के भीतर बासी ॥
सिद्ध सिद्धई करै प्रभुता कारन जाई ।
गोड़ धरावन हेतु महंत उपदेस चलाई ॥
राजा रंक फकीर फिरै जो खाक लगाये ।
सब के मन में चाह है खुसी बड़ाई पाये ॥
पलटू हरि के भक्त से गई प्रभुता हार ।
मान बड़ाई कारने पचि मूआ संसार ॥
( १६६ )
खुदी खोय१ को खोवै सोई है दुरवेस ॥
सोई है दुरवेस रूह की करै सफाई ।
दिल अंदर दीदार नबी का दरसन पाई ॥
बिन बादल बरसात अबर बिन बरसत पानी ।
गरमी आतस बिना जबाँ बिन बोलत बानी ॥
लामकान२ बेचून३ लाहुत४ को दिल दौड़ावै ।
फना को करै कबूल सोई वह काबा पावै ॥
पलटू जारै फिकर को रहै जिकर५ में पेस ।
खुदी खोयं को खोवै सोई है दुरवेस ॥
( १६७ )
सब कोई पीवै कूप जल खारी पड़ा समुन्द ॥
(१) आदत । (२) अनंत पद । (३) अद्वितीय । (४) सून्य । (५) सुमिरन ।
पलटू साहिबु की बानी भाग—१ ६७
खारी पड़ा समुन्द बड़े सो काम के नाहीं ।
जैसे बड़ी खजूर पथिक को मिलै न छाँहीं ॥
भक्त कहावैं बड़े भेष ना खाय को पावैं ।
पूजें नाहीं साध बड़े घर ही कहवावैं ॥
खान पियन को नाहिं बचन करकसे सुनावैं ।
पर्बत बड़े कठोर नजर दूरहि से आवैं ॥
पलटू संपति सूम की खरचै ना इक बुन्द ।
सब कोइ पीवै कूप जल खारी पड़ा समुन्द ॥
( १६८ )
बढ़ते बढ़ते बढ़ि गये जैसे बढ़ी खजूर ॥
जैसे बढ़ी खजूर पथिक छाया नहिं पावै ।
त्यों त्यो कै जो फरै ताहि कैसे कोउ खावै ॥
पात में काँटा रहै छुवत कै लोहू आवै ।
पेड़ सोऊ बेकाम कुवा को धरन बनावै ॥
सम्पति में बढ़ि जाय दया बिन भला भिखारी ।
जातिहु में बढ़ि जाय भक्ति बिन भला चमारो ॥
पलटू सोभा दो
६८ कुंडलिया
ज्ञान समाधी सुनै और कोउ सुनता नाहीं ॥
पलटू जो कोई सुनै ता के पूरे भाग ।
उलटा कूंवा गगन में तिस में जरै चिराग ॥
[ १७० ]
बंसी बाजी गगन में मगन भया मन मोर ॥
मगन भया मन मोर महल अठवें पर बैठा ।
जहँ उठै सोहंगम सब्द सब्द के भीतर पैठा ॥
नाना उठै तरंग रंग कुछ कहा न जाई ।
चाँद सुरज छिपि गये सुषमना सेज बिछाई ॥
छूटि गया तन यह नेह उन्हीं से लागी ।
दसवाँ द्वारा फोड़ि जोति बाहर है जागी ॥
पलटू धारा तेल की मेलत है गया भोर ।
बंसी बाजी गगन में मगन भया मन मोर ॥
[ १७१ ]
चढ़ै चौमहले महल पर कुंजी आवै हाथ ॥
कुंजी आवै हाथ सब्द का खोलै ताला ।
सात महल के बाद मिलै अठएँ उँजियाला ॥
बिनु कर बाजै तार नाद बिनु रसना गावै ।
महा दोप इक बरै दीप में जाय समावै ॥
दिन दिन लागै रंग सफाई दिल की अपने ।
रस रस मतलब करै सिताबी¹ करै न सपने ॥
पलटू मालिक तुही है कोई न दूजा साथ ।
चढ़ै चौमहले महल पर कुंजी आवै हाथ ॥
[ १७२ ]
चाँद सुरज पानी पवन नहीं दिवस नहिं रात ॥
(१) जल्दी ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
नहीं दिवस नहि रात नाहिं उतपति संसारा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस नाहिं तब किया पसारा ॥
आदि जोति बैकुंठ सुन्न नहीं कैलासा ।
सेस कमठ दिग्पाल नाहिं धरती आकासा ॥
लोक बेद पलटू नहीं कहौं मैं तब की बात ।
चाँद सुरज पानी पवन नहीं दिवस नहिं रात ॥
( १७३ )
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
बिनु मसि से लिखि देय सोई पंडित कहवावै ।
बिनु रसना कहै बेद अकथ की कथा सुनावै ॥
छुटी बात अस्थूल सूक्ष्म में मिला ठिकाना ।
फिर पोथी क्या पढ़ै अच्छर में आप समाना ॥
निःअच्छर अब मिला अच्छर को क्या ले करना ।
हीरा लागा हाथ पोत की कौन सरहना१ ॥
पलटू पंडित सोई है कमल हाथ नहिं लेय ।
बिनु कागद बिनु अच्छरे बिनु मसि से लिखि देय ॥
( १७४ )
झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
हद बेहद के पार तूर जहँ अनहद बाजै ॥
जगमग जोति जड़ाव सीस पर छत्र बिराजै ॥
मन बुधि चित रहे हार नहीं कोउ वह घर पावै ।
सुरत सब्द रहै पार बीच से सब फिरि आवै ॥
बेद पुरान की गम्म सकै ना उहवाँ जाई ।
तीन लोक के पार तहाँ रोसन रोसनाई ॥
पलटू ज्ञान के परे है तकिया तहाँ हमार ।
(१) क़दर, तारीफ़।
७० | कुंडलिया
झंडा गड़ा है जाय के हद बेहद के पार ॥
( १७५ )
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
मोहिं पड़ा है देख नदो इक बड़ी है गहिरी ।
ता में धारा तीन बीच में सहर बिलौरी ॥
महल एक अँधियार बरै तहँ गैब की बाती ।
पुरुष एक तहँ रहै देखि छबि वा की माती ॥
पुरुष अलापै तान सुना मैं एक ठो जाई ।
वाहि तान के सुनत तान में गई समाई ॥
पलटू पुरुष पुरान वह रंग रूप नहिं रेख ।
जागत में एक सूपना मोहिं पड़ा है देख ॥
॥ अद्वैत ॥
( १७६ )
जल से उठत तरंग है जल हो माहिं समाय ॥
जल ही माहिं समाय सोई हरि सोई माया ।
अरुझा बेद पुरान नहीं काहू सुरझाया ॥
फूल मँहै ज्यौं बास काठ में आग छिपानी ।
दूध मँहै घिउ रहै नीर घट माहिं लुकानी ॥
जो निर्गुन सो सगुन आर न दूजा कोई ।
दूजा जो कोइ कहै ताहि को पातक होई ॥
पलटू जीव और ब्रह्म से भेद नहीं अलगाय ।
जल से उठत तरंग है जल ही माहिं समाय ॥
( १७७ )
कोटिन जुग परलय गई हमहों करनेहार ।
हमहीं करनेहार हमहि करता के करता ।
जेकर करता नाम आदि में हम हों रहता ॥
मरिहैं ब्रह्मा बिस्नु मृत्यु ना होय हमारी ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७१
मरिहैं सिय१ के लाल मरैगी सिव की नारी ॥
धरती अगिन अकास मुवा है पवन और पानी ।
आदि जोति मरि गई रही देवतन की नानी ॥
पलटू हम मरते नहीं ज्ञानी लेहु विचार ।
कोटिन जुग परलय गई हम हीं करनेहार ॥
( १७८ )
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
सब में मेरो बास और ना दूजा कोई ।
ब्रह्मा बिस्नु महेस रूप सब हमरै होई ।
हमहीं उतपति करैं करैं हमहीं संहारा ।
घट घट में हम रहें रहें हम सब से न्यारा ॥०
पारब्रह्म भगवान अंस हमरै कहवाये ।०
हमहीं सोहं सब्द जोति है सुन्न में आये ॥
पलटू देह के धरे से वे साहिब हम दास ।
आदि अंत हम हीं रहे सब में मेरो बास ॥
॥ उलटावती ॥
( १७९ )
गंगा पाछे को बही मछरी चढ़ी पहार ॥
मछरी चढ़ी पहार चूल्ह में फन्दा लाया ।
पुखरा भीटे बाँधि नीर में आग छिपाया ॥
अहिरिन फेकै जाल कुहारिन भैंसि चरावै ।
तेली कै मरिगा बैल बैठि के धुबइन गावै ॥
महुवा में लागा दाख२ भाँग में भया लुबाना३ ।
साँप के बिल के बीच जाय के मूस लुकाना ॥
पलटू संत बिबेकी बुझिहैं सबद सम्हार ।
(१) सिया नाम सीताजी का है—एक पाठ में "सिव" हैं। (२) मुनक्का ।
(३) एक प्रकार की गोंद जो सुगन्धि के लिए जलाई जाती है ।