पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
तृतीय भाग: अरिल्ल, साखी एवं पद संग्रह उपसंहार
५० कुंडलिया
लालच रोगिया करै बैद को दोस लगावै ।
तनिक नहीं बिस्वास आँख कहवाँ से पावै ॥
एक होय तो कहौं गाँव का गाँव बिगरा ।
दिवसै दीपक बारि पाप का सेते डगरा १॥
पलटू सब संसार के माड़ा गया है छाय ।
अंजन देय न ज्ञान का अन्धा भया बनाय ॥
( २०० )
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
धोखा रहा समाय जानै दूजा है कोई ।
भीतर बाहर एक तसल्लो २ देखे होई ॥
जो देखा सो गया रहा जो देखा नाहीं ।
चोकर लड्डू खाँड़ खाय दोऊ पछिताहीं ॥
जोई पहुँचा जाय सोई उस घर का मालिक ।
रहे नाम में डूबि ठिकाने पहुँचे सालिक ३॥
पलटू परदा टारि दे दिल का धोखा जाय ।
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
( २०१ )
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ४॥
आगे लिहिनि तकाय पाछे की मरम न जानी ।
ज्यों ज्यों आगे जाय दिनों दिन अधिक दुरानी ॥
फिरि के ताकै नाहिं बस्तु कहवाँ से पावै ।
ज्यों मिरगा कै बास भरम कै जन्म गवावै ॥
अरुझा बेद पुरान ज्ञान बिनु को सुरझावै ।
सतसंगत से बिमुख बस्तु कहवाँ से पावै ॥
पलटू छूटै कर्म ना कैसे सकै उठाय ।
(१) पाप के मारग या भाँडे को रखवाली करते हैं। (२) शांति । (३) अभ्यासी ।
(४) चल दिये ।
पलटू साहिब की बानी भाग १ 59
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ॥
( २०२ )
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
छिल छिल जाता अंग धसन भेड़ी की देखा ।
करम बड़ा परधान गड़ी पत्थर पर मेखा ॥
साच बात को मेटि झूठ कौ जाल पसारा ।
जल पषान के बीच बहै सब सुधी धारा ॥
परघट है भगवान सकल घट सूझत नाहीं ।
जीव से करते द्रोह भरमना पूजन जाहीं ॥
पलटू मैं का से कहौं कुवाँ पड़ी है भंग ।
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
( २०३ )
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
ढूँढ़त फिरै पहार नहीं घट की सुधि जानै ।
जप तप तीरथ बरत जाय के तिल तिल छानै ॥
गई आप को भूलि और की बात न मानै ।
चूल्है लड़िका रहै चतुरई अपनी ठानै ॥
भरमी फिरै भुलान जाइ कै देस देसान्तर ।
लड़िका से नहिं भेट मिलत है पानी पाथर ॥
पलटू सतसंगति करै भूल में वाही सार१ ।
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
( २०४ )
सूधी मारग में चलौं हँसै सकल संसार ॥
हँसै सकल ससार करम की राह बताई ।
लोक बेद की राह चला हम से नहिं जाई ॥
सूधी लिह्ना तकाय राह संतन की पाई ।
(१) भूल मिटाने को सतसंग ही सार जतन है।
११
८२ कुंडलिया
मन में भया अनन्द छूटि गइ सब दुचिताई ॥
उन कै इहवै हेतु¹ रह यह हमरी आवै ।
इहै बूझि कै हँसै हाथ से निबुका² जावै ॥
पलटू सब का एक मत को अब करै बिचार ।
सुधी मारग मैं चलौं हँसै सकल संसार ॥
(२०५)
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
झूठा देवा सेव नाम को दिया भुलाई ।
बाँधे जमपुर जाहिं काल चोटी घिसियाई ॥
पानी से जिन पिंड गरभ के बीच सँवारा ।
ऐसा साहिब छोड़ि जन्म औरै से हारा ।
ऐसे मूरख लोग खबर ना करैं अपानी ।
सिरजनहारा छोड़ि पूजते भूत भवानी ॥
पलटू इक गुरुदेव बिनु दूजा कोय न देव ।
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
(२०६)
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भूत बैताल ॥
पूजत भूत बैताल मुए पर भूतै होई ।
जेकर जहवाँ जीव अन्त को होवै सोई ॥
देव पितर सब झूठ सकल यह मन की भ्रमना ।
यही भरम में पड़ा लगा है जीवन मरना ॥
देई देवा सेइ परम पद केहि ने पावा ।
भैरौ दुर्गा सीव बाँधि कै नरक पठावा ॥
पलट अंत घसीटिहै चोटी धरि धरि काल ।
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भत बैताल ॥
(१) संसार का यही अभिप्राय है । (२) निकला ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८३
( २०७ )
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
मारत अपने पाँय पूजत है देई देवा ।
सतगुरु संत बिसारि करै भूतन की सेवा ॥
चाहै कुसल गँवार अमी दै माहुर खावै ।
मने किये से लड़ै नरक में दौड़ा जावै ॥
पौंडै१ जल के बीच हाथ में बाँधे रसरी ।
परै भरम में जाइ ताहि को कैसे पकरी ॥
पलटू नर तन पाइ कै भजन मँहै अलसाय ।
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
( २०८ )
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
देखे चारो धाम सबन माँ पाथर पानी ।
करमन के बसि पड़े मुक्ति की राह भुलानी ॥
चलत चलत पग थके छीन भइ अपनी काया ।
काम क्रोध नहिं मिटे बैठ कर बहुत नहाया ॥
ऊपर डाला धोय मैल दिल बीच समाना ।
पाथर में गयो भूल संत का मरम न जाना ॥
पलटू नाहक पचि मुए सन्तन में है नाम ।
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
( २०६ )
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटी बीनन जाय ॥
टेंटी बीनन जाय जानै येही है मेवा ।
तीरथ मँहै नहाय करै मूरति की सेवा ॥
छोड़ि बोलता ब्रह्म करै पथरे की पूजा ।
खसम न आवै पास नारि जब खोजै दूजा ॥
(१) तैरै।
८४ कुंडलिया
सूखा हाड़ चबाय स्वान मुख आवै लोहू ।
है हाड़ के भोर१ भेद ना जानै वोहू ॥
पलटू आगे धरा है आप से नाहीं खाय ।
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटो बीनन जाय ॥
( २१० )
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
लगवारन से प्रीति जीव से द्रोह बढ़ावै ।
पूजत फिरै पषान नहीं जो बोलै खावै ॥
सम्मै पूरन ब्रह्म ताहि को तनिक न मानै ।
करै नटी२ को काम लोक पतिबरता जानै ॥
उदर पालना करै नाम ठाकुर को लेई ।
सर्ब जीव भगवान ताहि को तनिक न सेई ॥
पलटू सबै सराहिये जरै जगत की रीति ।
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
( २११ )
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
बिस्वा होइ गइ बाँझ जाहि के पुरुष घनेरे ।
नाहिं एक की आस फिरै घर घर बहुतेरे ॥
एक केरि होइ रहै दुसर से होइ गलानी३ ।
तुरत गरभ रहि जाइ सिवाती४ चात्रिक पानी ॥
राम पुरुष को छोड़ि करै देवतन की पूजा ।
बिस्या की यह रीति खसम तजि खोजै दूजा ॥
पलटू बिना बिचार से मूरख डूबै माँझ५ ।
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
( २१२ )
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिगराम ॥
(१) भूल । (२) हरजाई । (३) घिन । (४) स्वांति । (५) मंझधार में ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८५
मन करु सालिग्राम पूजते हाथ पिराने ।
धावत तीरथ बरत रैनि दिन गोड़ खियाने ॥
माला फेरि न जाय परे अँगुरिन में घट्टा ।
राम बोलि न जाय जीभ में लागै लट्ठा१॥
निति उठि चन्दन देत माथ कै लोहू सोखा ।
बालभोग के खात मिट्यो ना मन का धोखा ॥
जल पषान के पूजते सरा न एकौ काम ।
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिग्राम ॥
( २१३ )
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
सब को लागै टेढ़ बूझ बिनु कौन बतावै ।
आपु चलै सब टेढ़ टेढ़ हम को गोहरावै ॥
हम रहते निहकरम नाहिं करमन की आसा ।
तुम्हरे तीरथ बरत बहुरि मूरति बिस्वासा ॥
हमरे केवल राम आन को नाहीं जानों ।
तुम्हरे देवता पित्र भूत की पूजा मानो ॥
पलटू उलटा लोग सब नाहक करते खेढ़२ ।
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
( २१४ )
मैं अपने रँग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
जरि जरि मरते लोग सोच नाहक को करते ।
पर संपति को देखि मूढ़ बिनु मारे मरते ॥
ना काहू की जाति पाँति हम बैठन जाई ।
लोग करै चौवाव३ एक को एक बुलाई ॥
चलिहौं सूधी चाल राम के मारग माहीं ।
देव पितर तजि करम मानों काहू को नाहीं ॥
(१) लासा बंध जाना । (२) रार, झगड़ा । (३) निन्दा ।
८६ कुंडलिया
पलटू हम को देखि कै लोगन के भा रोग ।
मैं अपने रंग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
॥ जीव-हिंसा ॥
( २१५ )
लहम कुल्लहुम जिसिम का नबी किया फर्मूद१ ॥
नबी किया फर्मूद हदीस की आयत माहीं ।
सब में एकै जान और कोउ दूजा नाहीं ॥
खून गोस्त है एक मौलवी जिबह न छाजै२ ।
सब में रोसन हुआ नबी का नूर बिराजै ॥
क्यों खैंचै तू रूह३ गुनहगारी में पड़ता ।
बुजरुग के फर्मूद बमोजिब नहीं डेरता ॥
पलटू जो बेदरदी सो काफिर मरदूद ।
लहम कुल्लहुम जिसिम का नबी किया फर्मूद ॥
( २१६ )
गरदन मारै खसम की लगवारन के हेत ॥
लगवारन के हेत पसू औ मेंढ़ा मारै ।
पूजै दुरगा देव देवखरी सिर दै मारै ॥
माटी देवखरि बाँधि मुए की पूजा लावै ।
जीवत जिउ को मारि आनि कै ताहि चढ़ावै ॥
सब में है भगवान और ना दूजा कोई ।
तेकर यह गति करै भला कहवाँ से होई ॥
पलट जिउ को मारि कै बल देवतन को देत ।
गरदन मारै खसम की लगवारन के हेत ॥
॥ जाति भेद ॥
( २१७ )
हरि को भजै सो बड़ा है जाति न पूछै कोय ॥
(१) नबी ने फर्माया है कि कुल माँस जानदार की देह से आता है। (२) शोभा
नहीं देता । (३) जान ।
पलटू साहिब की बानी भाग १ ८७
जाति न पूछै कोय हरी को भक्ति पियारी ।
जो कोई करै सो बड़ा जाति हरि नाहिं निहारी ॥
बधिक अजामिल रहे रहे फिर सदन कसाई ।
गनिका बिस्वा रही बिमान पै तुरत चढ़ाई ॥
नीच जाति रैदास आपु में लिया मिलाई ।
लिया गिद्ध को गोदि दिया बैकुंठ पठाई ॥
पलटू पारस के छुए लोहा कंचन होय ।
हरि को भजै सो बड़ा है जाति न पूछै कोय ॥
( २१५ )
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥
केवल भक्ति पियार साहिब भक्ती में राजी ।
तजा सकल पकवान लिया दासीसुत भाजी¹ ॥
जप तप नेम अचार करै बहुतेरा कोई ।
खाये सेवरी के बेर¹ मुए सब ऋषि मुनि रोई ॥
किया युधिष्ठिर यज्ञ बटोरा सकल समाजा ।
मरदा सब का मान सुपच बिनु घंट न बाजा ॥
पलटू ऊँची जाति कौ जनि कोउ करें हंकार ।
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥
( २१६ )
गनिका गिद्ध अजामिल सदना औ रैदास ॥
सदना औ रैदास भली इनकी बनि आई ।
निसु दिन रहें हजूर भक्ति कीन्ही अधेकाई ॥
जाति न उत्तम येह इन्हैं सम और न कोई ।
(१) श्रीकृष्ण ने राजा दुर्योधन का छप्पन प्रकार का भोजन त्याग कर बिदुर
भक्त का अलोना साग बड़ी रुचि से खाया था और सेवरी के कुतरे हुए बेर बड़े चाव
से चख कर अहंकारी ऋषियों और मुनियों के दाँत खट्टे किये ।
८८ कुंडलिया
ब्रह्म कोटि कुलीन नीच अब कहिये सोई ॥
उनसे बड़ा न कोय और सब उन के नीचे ।
उन्हें बराबर नहीं कोऊ तिलोकी के बीचे ॥
अबिनासी की गोद में पलटू करै बिलास ।
गनिका गिद्ध अजामिल सदना औ रैदास ॥
॥ निन्दक ॥
( २२० )
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी को चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगी रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
संत कँहै दृढ़ करै जगत का भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै !
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
( २२१ )
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥
हम को जोखों नाहिं गाँठि कौ साबुन लावै ।
खरचै अपनो दाम हमारी मैल छुड़ावै ॥
तन मन धन सब देहि संत की निन्दा कारन ।
लेहिं संत तेहि तार बड़े वे अधम-उधारन ॥
संत भरोसा बड़ा सदा निन्दक का करते ।
निन्दक की अति प्रीति भाव दूसर नहिं धरते ॥
पलटू वे परसवारथी निन्दक नर्क न जाहिं ।
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥
पलटू साहिब की बानी भाग - १ ८६
( २२२ )
निन्दक है परसवारथी करै भक्त का काम ॥
करै भक्त का काम जगत में निन्दा करते ।
जो वे होते नाहिं भक्त कहवाँ से तरते ॥
आप नरक में जाहिं भक्त का करें निबेरा ।
फिर भक्तन के हेतु करें चौरासी फेरा ॥
करें भक्त की सोच उन्हें कुछ और न भावै ।
देखो उनकी प्रीति लगन जब ऐसी लावै ॥
पलटू धोबी अस मिल्यौ धोवत है बिनु दाम ।
निन्दक है परसवारथी करै भक्त का काम ॥
॥ मिश्रित ॥
( २२३ )
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सत नाम ॥
जो तौलै सत नाम छिमा का टाट बिछावै ।
प्रेम तराजू करै बाट बिस्वास बनावै ॥
बिबेक की करै दुकान ज्ञान का लेना देना ।
गादी है संतोष नाम का मारै टेना ॥
लादै उलटै भजन बचन फिर मीठे बोलै ।
कुंजी लावै सुरत सबद का ताला खोलै ॥
पलटू जिसकी बन परी उसी से मेरा काम ।
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सत नाम ॥
( २२४ )
भीतर औटै तत्व को उठै सबद की खानि ॥
उठै सबद की खानि रहै अंतर लौ लागी ।
सुरति देइ उदगारि१ जोगिनी आपुइ जागी ॥
(१) जगाय ।
१२
सहज घाट हरि ध्यान ज्ञान से मन परमोथै ।
नहिं संग्रह नहिं त्याग आपनी काया सोधै ॥
० प्रेम भभूत लगाइ धरै धीरज मृगछाला ।
० तिलक उनमुनी भाल जपत है अजपा माला ॥
पलटू ऐसा होय जो सो जोगी परमान ।
भीतर औंटै तत्व को उठै सबद की खानि ॥
(२२५)
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
पलटूदास न लेइ रहै कर जोरे ठाढ़ी ।
सरनागति मैं रहौं सरन बिनु लागै गाढ़ी१ ।
गोड़ दाबि मैं देउँ चरन धै सेवा करिहौं ।
चौका देइहौं लीपि बहुरि मैं पानी भरिहौं ॥
पैंडा देउँ बुहारि सबन कै जूठ उठावौं ।
जनि दुरियावहु मोहिं रहै मैं इहवाँ पावौं ॥
मुक्ति रहै द्वारे खड़ी लट से झाड़ू देइ ।
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
(२२६)
सुरति सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
मिली सबद में जाय कन्त को बसि में कीन्हा ।
चलै न सिव कै जोर जाय जब सक्ती लीन्हा ॥
फिर सक्ती ना रही मिली जब सिव में जाई ।
सिव भी फिर ना रहे सक्ति से सीव कहाई ॥
अपने मन कै फेर और ना दूजा कोई ।
० सक्ती सिव है एक नाम कहने को दोई ॥
पलटू सक्ती सीव का भेद गया अलग़ाय ।
सुरत सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
(१) गाढ़ = दुख ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६१
( २२७ )
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
घरहीं लागा रंग छुटे तीरथ ब्रत दाना ।
जल पषान सब छुटे आपु में उठि समाना ॥
काम क्रोध को छोड़ि परम सुख मिला अनन्दा ।
लोभ मोह को जारि करम का काटा फंदा ॥
लगै न भूख पियास जगत की आसा त्यागा ।
सबद मँहैं गलतान सुरति का पोहै धागा ॥
पलटू दिढ़ है लागि रहै छुटै नहीं सतसंग ।
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
( २२८ )
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
मारा गया बिबेक चोर का पहरू भेदी ।
दोऊ की मति एक सहर में करें अहेदी१ ॥
आँधर नगर के बीच भया धमधूसर२ राजा ।
करै नीच सब काम चलै दस दिसि दरवाजा ॥
अधरम आठो गाँठि न्याव बिनु धीगम सूदा३ ।
टकमि दमारि४ गुलाम आप को भयो असूदा५ ॥
जानि बूझि कूँआँ परै पलटू चलै न देख ।
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
( २२६ )
देखो जिउ की खोय को फिर फिर गोता खाय ॥
फिर फिर गोता खाय तनिक ना लज्जा आवै ।
पड़िगा वही सुभाव छुटै ना लाख छुटावै ॥
(१) एक लिपि में "अलेदी' है । "अहदी" बादशाही वक्त में बहादुर सिपाही
होते थे जो घर बैठे तनखाह पाते थे और सिर्फ भारी मुहिम पर भेजे जाते थे । इन
की जबरदस्ती और जुल्म प्रसिद्ध है । (२) मोटे । (३) धींगम धींगा, मनमाना । (४) टका
दमड़ी के लिये । (५) संतुष्ट ।
६२ कुंडलीया
निमिख भरे१ को खुसी जन्म कोटिन दुख पावै ।
चौरासी घर जाय आपु में आपु बंधावै ॥
स्वान लाख जो खाय दिया चाटै पै चाटै ।
छुटै न जिउ की खोय पकरि के पुरजे काटै ॥
पलटू भजै न नाम को मूरख नर तन पाय ।
देखो जिउ की खोय को फिर फिर गोता खाय ॥
( २३० )
मुए पार की बात है फिरै न कोऊ एक ।
फिरै न कोऊ एक मुक्ति धौं कैसी होती ।
स्याह जरद या सुरख रंग, हीरा या मोती ॥
मुक्ति के हाथ न पाँव मुक्ति को सब कोउ मानै ।
है पर्दे की बात ताहि से सब कोउ जानै ॥
सब कोउ होय खराब मुक्ति के पाछे जाई ।
जानी केहि बिधि जाय मुक्ति कहु किन ने पाई ॥
पलटू बातैं मुक्ति की खसर-फसर२ करि देख ।
मुए पार की बात है फिरै न कोऊ एक ॥
( २३१ )
चिन्ता रूपी अगिन में जरै सकल संसार ॥
जरै सकल संसार जरत निरपति को देखा ।
बादसाह उमराव जरत हैं सैयद सेखा ॥
सुर नर मुनि सब जरैं जोगी और जती सन्यासी ।
पंडित ज्ञानी चतुर जरैं कनफटा उदासी ॥
जंगम सिवरा जरैं जरैं नागा बैरागी ।
तपसी दूना जरै बचै नहिं कोऊ भागी ॥
पलटू बचते संत जन जेकरे नाम अधार ।
(१) छिन भर । (२) सरपट ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६३
चिन्ता रूपी अगिन में जरै सकल संसार ॥
( २३२ )
जा को निरगुन मिला है भूला सरगुन चाल ॥
भूला सरगुन चाल बचन ना मुख से आवै ।
तसबी१ और किताब नहीं काजी को भावै ॥
पंडित पढ़ै न बेद तीरथ बैरागी त्यागा ।
कायथ कलम न लेय राज तजि राजा भागा ॥
बेस्वा तजा सिंगार रिद्ध की गइ सिद्धांई ।
रागी भूला राग जननि सुत देइ बहाई ॥
पलटू भूली गेहिनी२ कहूँ भात कहूँ दाल ।
जा को निरगुन मिला है भूला सरगुन चाल ॥
( २३३ )
अमृत को सागर भरयो देखे प्यास न जाय ॥
देखे प्यास न जाय पिये बिनु कौन बतावै ।
कल्प बृच्छ को देखि खाये बिनु भूख न जावै ॥
और की दौलत देखि दरिद्दर नाहिं नसाई ।
अन्धा पावै आँखि साच वा की बैदाई ॥
लोहा कंचन होय पारस की करै सरहना ।
क्या मलया की सिफत काठ को काठै रहना ॥
सतगुरु तुम्हरे बचन को पलटू ना पतियाय ।
अमृत को सागर भरयो देखे प्यास न जाय ॥
( २३४ )
जैसे नदी एक है बहुतेरे हैं घाट ॥
बहुतेरे हैं घाट भेद भक्तन में नाना ।
जो जेहि संगत परा ताहि के हाथ बिकाना ॥
चाहै जैसी करै भक्ति सब नामहिं केरी ।
(१) माला । २) होशियार औरत ।
६४ कुंडलियां
जा की जैसी बूझ मारग सो तैसी हेरी ॥
फेर¹ खाय इक गये एक ठौ गये सिताबी ।
आखिर पहुँचे राह दिना दस भई खराबी ॥
पलटू एकै टेक ना जेतिक² भेष तै बाट ।
जैसे नदी एक है बहुतेरे हैं घाट ॥
( २३५ )
साध बचन साचा सदा जो दिल साचा होय ॥
जो दिल साचा होय रहै ना दुबिधा भागै ।
जो चाहै सो मिलै बात में बिलँब न लागै ॥
मन बचन कर्म लगाय संत की सेवा लावै ।
उकठा काठ बियास³ साच जो दिल में आवै ॥
जिनको है बिस्वास तेही को बचन फुरानी४ ।
हैगा उन का काम सन्त की महिमा जानी ॥
पलटू गाँठि में बाँधिये खाली पड़ै न कोय ।
साध बचन साचा सदा जो दिल साचा होय ॥
( २३६ )
महीं भुलाना फिरत हौं कि जगतै गया भुलाय ॥
जगतै गया भुलाय देखि सब हँसते हम कँह ।
उनकी करनी देखि हँसत हैं हमहूँ उन कँह ॥
बाय जोगी को जगत जगत को जोगी बाई ।
दोऊ को भौंसे आनि कहाँ अब तीसर पाई ॥
एक साहु सौ चोर चोर को साहु बनावै ।
जगत भगत से बैर अपनी दूनौ गावै ॥
पलटू तीसर है नहीं साखी भरै जो आय ।
महीं भुलाना फिरत हौं कि जगतै गया भुलाय ॥
(१) चक्कर । (२) जितने । (३) उगै । (४) सच्चा ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६५
( २३७ )
जगत भगत से बैर है चारो जुग परमान ॥
चारो जुग परमान बैर ज्यों मूस बिलाई ।
नेवर भुवंगम बैर कँवल हिम¹ कर अधिकाई ॥
हस्ती केहरि² बैर बैर है दूध खटाई ॥
भैंस घोड़ से बैर चोर पहरू से भाई ॥
पाप पुन्य से बैर अगिन औ बैरी पानी ।
संतन यही बिचार जगत की बात न मानी ॥
पलटू नाहक भँकता जोगी देखे स्वान ।
जगत भगत से बैर है चारो जुग परमान ॥
( २३८ )
लेहु परोसिनि झोपड़ा नित उठि बढ़त रार ॥
नित उठि बढ़त रार काहिको सरबरि कीजै ।
तजिये ऐसा संग देस चलि दूसर लीजै ॥
जीवन है दिन चारि काहे को कीजै रोसा ।
तजिये सब जंजाल नाम कै करौ भरोसा ॥
भीख माँगि बरु खाय खटपटी नीक न लागै ।
भरी गोन गुड़ तजै तहाँ से साँझै भागै ॥
पलटू ऐसन बूझि कै डारि दिहा सिर भार ।
लेहु परोसिनि झोपड़ा नित उठि बढ़त रार ॥
( २३६ )
सिध चौरासी नाथ नौ बीचै सभै भुलान ॥
बीचै सभै भुलान भक्ति की मारग छूटी ।
हीरा दिहिन है डारि लिहिन इक कौड़ी फूटी ॥
खाँड़ माँड़ खुसी जक्त इतने में राजी ।
लोक बड़ाई तुच्छ नरक में अटकी बाजी ।
(१) पाला । (२) बाघ ।
६६ कुंडलिया
झूठ समाधि लगाय फिरै मन अत्तै भटका ।
उहाँ न पहुँचा कोय बीच में सब कोइ अटका ॥
पलटू अठएँ लोक में पड़ा दुपट्टा तान ।
सिध चोरासी नाथ नौ बीचै सबै भुलान ॥
( २४० )
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरै न घास ॥
सिंह चरैं ना घास मारि कुंजर को खाते ।
जो मुरदा है जाय ताहि के निकट न जाते ॥
वे ना खाहिं असुद्ध रीत कुल की चलि आई ।
खाये बिनु मरि जाहिं दाग ना सक हें लगाई ॥
सन्त सभन सिरताज धरन धारी सो धारो ।
नई बात जो करें मिलत है उनको गारी ॥
भीख न माँगें सन्त जन कहि गये पलटूदास ।
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरैं ना घास ॥
( २४१ )
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
वह गोकुल के घाट जाइ के गोता मारै ।
जीवन आसा त्यागि बूड़ि के ढूँढ निकारै ॥
मान बड़ाई छोड़ि चित्त हरि चरनन लावै ॥
कुंजगली के बीच जाय तब पिय को पावै ॥
देखे पिय को रूप सुन्दर बहु स्याम सलोना ।
बरै तेल की टेम आगि में बरता सोना ॥
कहि पलटू परसाद यह पावै प्रेम की बाट ।
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
( २४२ )
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६७
पेट को रहे हैरान तसदिया१ से मिल्यौ अहारा ।
साग मिल्यौ बिनु लोन रही तब ऐसी धारा ॥
आये हरि की सरन बहुत सुख तब से पाई ।
लुचुई२ चारो जून खाँड औ खोवा खाई ॥
लेडू पेड़ा बहुत सेंत३ कोउ खाता नाहीं ।
जलेबी चीनी कन्द भरा है घर के माहीं ॥
पलटू हरि की सरन में हाजिर सब पकवान ।
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥
( २४३ )
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
तब रीझैगा भेष जगत में करै बड़ाई ।
लाख भगत जो होय खाये बिनु निंदत जाई ॥
रहनि लखै नहिं कोय नाहिं टकसार बिचारै ।
भाव भक्ति ना लखै खोजत सब फिरै अहारै ॥
भेष में नाहिं बिबेक भये दस बीस बिबेकी ।
कोटिन में दस बीस सन्त तिन रहनी देखी ॥
पलटू रहै अपान में आन में मारै मेख ।
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
( २४४ )
कौड़ी गाँठि न राखई हमा-नियामत४ खाय ॥
हमा-नियामत खाय नहीं कुछ जग की आसा ।
छत्तिस ब्यंजन रहै सबर से हाजिर खासा ॥
जेकरे है सत नाम नाम की चेरी माया ।
जोरू कहवाँ जाय खसम जब कैद में आया ॥
माया आवै चली रैनि दिन मैं दुरियावों ।
सतगुरु दास कहाय नहीं मैं माँगन जावों ॥
(१) कष्ट । (२) पूरी । (३) मुफ्त । (४) छप्पन प्रकार का भोजन ।
१३
६८ कुंडलिया
राजा औ उमराव हाथ सब बाँधे आवैं।
द्वारे से फिरि जायें नहीं फिर मुजरा पावैं॥
जंगल में मंगल करै पलटू बेपरवाय।
कौड़ी गाँठि न राखई हमा-नियामत खाय॥
( २४५ )
जब देखौ तब सादी नौबत आठौ पहर॥
नौबत आठौ पहर गैब की निसु दिन झरती।
पचरँग जोड़ा खुसी दुखेस को सादी चढ़ती॥
आफताब¹ भा सूर² रोसनी दिल में आई।
फिरै गैब का छत्र जिकर³ का मुस्क⁴ लगाई॥
अन्दर भूलै फील⁵ खाब में खतरा नाहीं।
सबर है पीढ़ी पलँग सेहरा नाम इलाही॥
पलटू जलवा नूर का ज्यों दरियाव में लहर।
जब देखौ तब सादी नौबत आठौ पहर॥
( २४६ )
रन का चढ़ना सहज है मुसकिल करना जोग॥
मुसकिल करना जोग चित्त को उलटि लगावै।
बिषय बासना तजै प्रान ब्रह्मंड चढ़ावै॥
साधै वायू प्रान कुण्डली करै उथपना⁶।
अष्ट कँवल दल उलटि कँवल दल द्वादस लखना॥
इँगला पिंगला सोधि बंक के नाल चढ़ावै।
चार कला को तोड़ि चक्र षट जाय बिधावै॥
पलटू जो संजम करै करै रूप से भोग।
रन का चढ़ना सहज है मुसकिल करना जोग॥
(१) सूरज। (२) अंधा। (३) सुमिरन। (४) कस्तूरी। (५) हाथी। (६) कुण्डलिन
नाड़ी का मुँह ऊपर करै।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
( २४७ )
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
कागद जरै न कोय कागद है बहुत पुराना ।
अक्खर¹ आवै जाय अखर को नाहिं ठिकाना ॥
वो भी जरै बनाय अखर का लिखनेहारा ।
बाँचै सो जरि जाय जरै जो करै बिचारा ॥
कोटिन अक्खर बाद अन्त कागद भी जरता ।
कागद जरै के बाद रहै कागद का करता ॥
पलटू जब कागद जरै वा दिन मेरा होय ।
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
( २४८ )
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
अस्थल बे दरियाव अर्श कुर्सी खुद दीदन ।
तूबा दरखत अज् हद शीरीं मेवा खुर्दन ॥
नूर तजल्ली रूह लाहूत रसीदा नादिर ।
रौशन-जमीर बेचूँ सीना-साफ़ काजी क़ादिर ॥
हूहू गुफ़्तन फ़ना रूह की सोई बातिन ।
पाक अल्लाह मकान तहाँ को भी वो साकिन ॥
पलटू आरिफ़ से कहै तू भी चाहो जाव ।
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
(१) अक्षर। (२) कुण्डलिया नं० २४८ चौदहवें भुवन में बिना पानी के धरती
है जहाँ खुदा का तख्त [अर्श व कुर्सी] दीख पड़ता है और कल्प बृक्ष [तूबा दरख्त]
का अत्यन्त स्वादिष्ट फल खाने को मिलता है [खुर्दन]। उस शून्य लोक [लाहूत]
में पहुँची हुई [रसीदा] सूरत का प्रकाश विचित्र हो जाता है और वह अंतर-यामी,
अद्वितीय [बेचूँ] निर्मल हृदय [रौशन जमीर] अधिष्ठाता [काजी] और सर्ब
शक्तिमान [क़ादिर] हो जाती है। वहो पावन स्थान अल्लाह का है जहाँ ॐ ॐ का
शब्द गाजता है [हूहू गुफ़्तन और सुरत विदेह होने पर वहीं बासा पाती है
[साकिन]।