पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ कुंडलिया
झूठ समाधि लगाय फिरै मन अत्तै भटका ।
उहाँ न पहुँचा कोय बीच में सब कोइ अटका ॥
पलटू अठएँ लोक में पड़ा दुपट्टा तान ।
सिध चोरासी नाथ नौ बीचै सबै भुलान ॥
( २४० )
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरै न घास ॥
सिंह चरैं ना घास मारि कुंजर को खाते ।
जो मुरदा है जाय ताहि के निकट न जाते ॥
वे ना खाहिं असुद्ध रीत कुल की चलि आई ।
खाये बिनु मरि जाहिं दाग ना सक हें लगाई ॥
सन्त सभन सिरताज धरन धारी सो धारो ।
नई बात जो करें मिलत है उनको गारी ॥
भीख न माँगें सन्त जन कहि गये पलटूदास ।
हंस चुगैं ना घोंघी सिंह चरैं ना घास ॥
( २४१ )
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
वह गोकुल के घाट जाइ के गोता मारै ।
जीवन आसा त्यागि बूड़ि के ढूँढ निकारै ॥
मान बड़ाई छोड़ि चित्त हरि चरनन लावै ॥
कुंजगली के बीच जाय तब पिय को पावै ॥
देखे पिय को रूप सुन्दर बहु स्याम सलोना ।
बरै तेल की टेम आगि में बरता सोना ॥
कहि पलटू परसाद यह पावै प्रेम की बाट ।
कृस्न कन्हैया लाल है वह गोकुल के घाट ॥
( २४२ )
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥