सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 116 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६७
पेट को रहे हैरान तसदिया१ से मिल्यौ अहारा ।
साग मिल्यौ बिनु लोन रही तब ऐसी धारा ॥
आये हरि की सरन बहुत सुख तब से पाई ।
लुचुई२ चारो जून खाँड औ खोवा खाई ॥
लेडू पेड़ा बहुत सेंत३ कोउ खाता नाहीं ।
जलेबी चीनी कन्द भरा है घर के माहीं ॥
पलटू हरि की सरन में हाजिर सब पकवान ।
गिरहस्थी में जब रहे पेट को रहे हैरान ॥
( २४३ )
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
तब रीझैगा भेष जगत में करै बड़ाई ।
लाख भगत जो होय खाये बिनु निंदत जाई ॥
रहनि लखै नहिं कोय नाहिं टकसार बिचारै ।
भाव भक्ति ना लखै खोजत सब फिरै अहारै ॥
भेष में नाहिं बिबेक भये दस बीस बिबेकी ।
कोटिन में दस बीस सन्त तिन रहनी देखी ॥
पलटू रहै अपान में आन में मारै मेख ।
भरि भरि पेट खिलाइये तब रीझैगा भेष ॥
( २४४ )
कौड़ी गाँठि न राखई हमा-नियामत४ खाय ॥
हमा-नियामत खाय नहीं कुछ जग की आसा ।
छत्तिस ब्यंजन रहै सबर से हाजिर खासा ॥
जेकरे है सत नाम नाम की चेरी माया ।
जोरू कहवाँ जाय खसम जब कैद में आया ॥
माया आवै चली रैनि दिन मैं दुरियावों ।
सतगुरु दास कहाय नहीं मैं माँगन जावों ॥
(१) कष्ट । (२) पूरी । (३) मुफ्त । (४) छप्पन प्रकार का भोजन ।
१३