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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६३
चिन्ता रूपी अगिन में जरै सकल संसार ॥
( २३२ )
जा को निरगुन मिला है भूला सरगुन चाल ॥
भूला सरगुन चाल बचन ना मुख से आवै ।
तसबी१ और किताब नहीं काजी को भावै ॥
पंडित पढ़ै न बेद तीरथ बैरागी त्यागा ।
कायथ कलम न लेय राज तजि राजा भागा ॥
बेस्वा तजा सिंगार रिद्ध की गइ सिद्धांई ।
रागी भूला राग जननि सुत देइ बहाई ॥
पलटू भूली गेहिनी२ कहूँ भात कहूँ दाल ।
जा को निरगुन मिला है भूला सरगुन चाल ॥
( २३३ )
अमृत को सागर भरयो देखे प्यास न जाय ॥
देखे प्यास न जाय पिये बिनु कौन बतावै ।
कल्प बृच्छ को देखि खाये बिनु भूख न जावै ॥
और की दौलत देखि दरिद्दर नाहिं नसाई ।
अन्धा पावै आँखि साच वा की बैदाई ॥
लोहा कंचन होय पारस की करै सरहना ।
क्या मलया की सिफत काठ को काठै रहना ॥
सतगुरु तुम्हरे बचन को पलटू ना पतियाय ।
अमृत को सागर भरयो देखे प्यास न जाय ॥
( २३४ )
जैसे नदी एक है बहुतेरे हैं घाट ॥
बहुतेरे हैं घाट भेद भक्तन में नाना ।
जो जेहि संगत परा ताहि के हाथ बिकाना ॥
चाहै जैसी करै भक्ति सब नामहिं केरी ।
(१) माला । २) होशियार औरत ।